आरती जय अम्बे गौरी
सनातन परम्परा
भगवती दुर्गा भवानी की यह परम प्रसिद्ध आरती नवरात्रि एवं शुक्रवार के पूजन की मुख्य शोभा है। इसमें सिंह-वाहिनी, असुर-विनाशिनी, अष्टभुजा माँ जगदम्बा के दिव्य आयुधों और भक्त-वत्सल स्वरूप का भावपूर्ण स्तवन है।
॥ श्रीदुर्गायै नमः ॥
॥ आरती श्री अम्बे गौरी ॥
॥ आरती श्री अम्बे गौरी ॥
॥ १ ॥
जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निसिदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिवरी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
हे माँ जगदम्बा! हे माँ अम्बे गौरी! हे श्यामा गौरी! आपकी जय हो। श्रीहरि विष्णु, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा और देवाधिदेव महादेव शिव नित्य-प्रतिदिन आपका ध्यान व स्तवन करते हैं।
॥ २ ॥
मांग सिन्दूर विराजत,
टीको मृगमद को। मैया टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना,
चन्द्रबदन नीको॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
माँ की मांग में दिव्य सिन्दूर सुशोभित है और ललाट पर कस्तूरी (मृगमद) का मनोहर तिलक शोभा पा रहा है। आपके दोनों नेत्र परम तेजस्वी और उज्ज्वल हैं, तथा मुखमण्डल पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान परम सुन्दर व शीतल है।
॥ ३ ॥
कनक समान कलेवर,
रक्ताम्बर राजे। मैया रक्ताम्बर राजे।
रक्तपुष्प गल माला,
कण्ठन पर साजे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
माँ का श्रीअंग स्वर्ण के समान देदीप्यमान है और उस पर लाल रंग के दिव्य वस्त्र सुशोभित हैं। गले में लाल गुड़हल व कमल-पुष्पों की सुन्दर माला विराज रही है।
॥ ४ ॥
केहरि वाहन राजत,
खड्ग खप्पर धारी। मैया खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत,
तिनके दुखहारी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
माँ सिंह (केहरि) पर सवार होकर विराजती हैं और हाथों में खड्ग तथा खप्पर धारण किए हुए हैं। देवता, मनुष्य और मुनिजन नित्य आपकी सेवा-आराधना करते हैं और आप उनके समस्त दुःखों को हर लेती हैं।
॥ ५ ॥
कानन कुण्डल शोभित,
नासाग्रे मोती। मैया नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर,
सम राजत ज्योती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
माँ के कानों में मणियुक्त कुण्डल झिलमिला रहे हैं और नासिका में दिव्य गजमुक्ता मोती सुशोभित है। आपकी दिव्य आभा और तेज के समक्ष करोड़ों सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश भी मन्द प्रतीत होता है।
॥ ६ ॥
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे,
महिषासुर घाती। मैया महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना,
निशदिन मदमाती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
आपने ही दुष्ट दैत्य शुम्भ और निशुम्भ का वध किया और महाबली महिषासुर का मर्दन किया। आपके नेत्र धूम्रलोचन आदि असुरों का संहार करने में सदा सजग और ब्रह्मानन्द के रस में मग्न रहते हैं।
॥ ७ ॥
चण्ड-मुण्ड संहारे,
शोणित बीज हरे। मैया शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे,
सुर भयहीन करे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
आपने चण्ड और मुण्ड का संहार कर चामुण्डा नाम धारण किया, रक्तबीज के रक्त की एक बूँद भी भूमि पर न गिरने देकर उसका नाश किया, और मधु-कैटभ का संहार कर समस्त देवगणों को भयमुक्त किया।
॥ ८ ॥
ब्रह्माणी,
रुद्राणी, तुम कमला रानी। मैया तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी,
तुम शिव पटरानी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
आप ही ब्रह्माणी हैं, आप ही रुद्राणी हैं, और आप ही महालक्ष्मी कमला रानी हैं। वेद, पुराण और तन्त्र-शास्त्र आपकी ही महिमा का गान करते हैं; आप ही भगवान सदाशिव की पटरानी हैं।
॥ ९ ॥
चौंसठ योगिनी गावत,
नृत्य करत भैंरू। मैया नृत्य करत भैंरू।
बाजत ताल मृदंगा,
अरु बाजत डमरू॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
चौंसठ योगिनियाँ आपके सम्मुख मंगल गान करती हैं और कालभैरव आनन्दमग्न होकर नृत्य करते हैं। करताल, मृदंग, भेरी और डमरू के दिव्य वाद्य बज रहे हैं।
॥ १० ॥
कंचन थाल विराजत,
अगर कपूर बाती। मैया अगर कपूर बाती।
श्री मालकेतु में राजत,
कोटि रतन ज्योती॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
स्वर्ण-थाल में अगर-चन्दन और कर्पूर की पावन ज्योति जल रही है। आपके मुकुट और आभूषणों में जड़े करोड़ों रत्नों से अलौकिक प्रकाशपुंज प्रस्फुटित हो रहा है।
॥ ११ ॥
श्री अम्बे जी की आरती,
जो कोई नर गावे। मैया जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी,
सुख-सम्पत्ति पावे॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
अर्थ :
माँ भगवती अम्बे जी की यह मंगल आरती जो कोई श्रद्धा और प्रेम से गाता है, वह इस लोक में समस्त सुख-सम्पदा, आरोग्य व शान्ति प्राप्त कर अन्त में भगवती के परम धाम को प्राप्त करता है।
॥ १२ ॥
जय अम्बे गौरी,
मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निसिदिन ध्यावत,
हरि ब्रह्मा शिवरी॥
ॐ जय अम्बे गौरी॥
॥ इति श्री अम्बे गौरी की आरती सम्पूर्णा ॥