॥ श्रीहरिः ॥
आरती ॐ जय जगदीश हरे

आरती ॐ जय जगदीश हरे

पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी

🪔 आरती

पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा रचित यह मंगल आरती भारतवर्ष एवं विश्वभर के हिन्दू परिवारों में नित्य सन्ध्या एवं उत्सवों पर गाई जाने वाली सार्वभौमिक देव-स्तुति है। इसमें समस्त दुःखों के निवारण एवं प्रभु-शरण का आर्त भाव है।

आरती ॐ जय जगदीश हरे

पण्डित श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा रचित यह मंगल आरती भारतवर्ष एवं विश्वभर के हिन्दू परिवारों में नित्य सन्ध्या एवं उत्सवों पर गाई जाने वाली सार्वभौमिक देव-स्तुति है। इसमें समस्त दुःखों के निवारण एवं प्रभु-शरण का आर्त भाव है।

॥ श्रीलक्ष्मीनारायणाय नमः ॥
॥ जगत्प्रसिद्धा श्री जगदीश आरती ॥
॥ १ ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : हे सम्पूर्ण जगत् के स्वामी जगदीश! आपकी जय हो, हे प्रभु! आपकी जय हो। आप अपने अनन्य भक्तों और सेवकों के समस्त कष्टों और संकटों को क्षण मात्र में दूर करने वाले हैं। हे जगदीश हरे, आपकी सदा जय हो।
॥ २ ॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : जो प्राणी आपका निष्ठापूर्वक ध्यान करता है, वह अभीष्ट फल प्राप्त करता है और उसके मन के समस्त शोक-संताप नष्ट हो जाते हैं। उसके घर में सुख, शान्ति और दिव्य सम्पत्ति का वास होता है तथा तन के सारे व्याधि-रोग मिट जाते हैं।
॥ ३ ॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। स्वामी शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा,
आस करूं जिसकी। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : हे प्रभु! आप ही मेरे सच्चे माता और पिता हैं; आपके अतिरिक्त मैं किसकी शरण ग्रहण करूँ? आपके सिवा इस संसार में मेरा दूसरा कोई अपना नहीं है, जिससे मैं कोई आशा या अपेक्षा रख सकूँ।
॥ ४ ॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : आप परिपूर्ण परमात्मा हैं, घट-घट में वास करने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही सृष्टि के आदि-कारण सच्चिदानन्द पारब्रह्म परमेश्वर हैं और चराचर जगत् के एकमात्र स्वामी हैं।
॥ ५ ॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : आप अहैतुकी दया एवं करुणा के असीम सागर हैं, और समस्त प्राणियों के पालन-पोषणकर्ता हैं। मैं अज्ञानी और विकारों से ग्रसित हूँ; मैं आपका नित्य सेवक हूँ और आप मेरे स्वामी हैं — हे जगत्पालक प्रभु! मुझ पर अपनी कृपादृष्टि कीजिए।
॥ ६ ॥
तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति। स्वामी सब के प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : आप इन्द्रियातीत (अगोचर) हैं और सम्पूर्ण जीवों के प्राणों के स्वामी हैं। हे दयानिधान! मुझ जैसी मन्दबुद्धि और अज्ञानी आत्मा भला किस साधन या युक्ति से आपके दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार कर सके? आप स्वयं ही मुझ पर दया करें।
॥ ७ ॥
दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ,
द्वार पड़ा तेरे। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : आप दीनों के सच्चे बन्धु और समस्त दुःखों को हरने वाले हैं, आप ही मेरे एकमात्र रक्षक व स्वामी हैं। हे कृपालु! अपना अभय-हस्त मेरे शीश पर धरिए, मुझे अपने पावन चरणों की शरण में ले लीजिए; मैं सदा आपके द्वार पर पड़ा हुआ हूँ।
॥ ८ ॥
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : हे देव! मेरे अन्तःकरण से काम-क्रोध-लोभादि विषय-विकारों को मिटा दीजिए और मेरे समस्त पापों का नाश कीजिए। मेरे हृदय में आपके प्रति अनन्य श्रद्धा-भक्ति तथा संत-महापुरुषों की निस्वार्थ सेवा का भाव निरंतर बढ़ाते रहिए।
॥ ९ ॥
तन मन धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण,
क्या लागे मेरा। ॐ जय जगदीश हरे॥
अर्थ : हे प्रभु! यह शरीर, मन, प्राण और समस्त धन-सम्पदा केवल आपकी ही दी हुई है। आपका ही दिया हुआ सब कुछ मैं आपके श्रीचरणों में सादर समर्पित करता हूँ; इसमें मेरा कुछ भी नहीं है, सब कुछ आपका ही है।
॥ १० ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे। ॐ जय जगदीश हरे॥
॥ इति श्री जगदीश आरती सम्पूर्णा ॥