॥ श्रीहरिः ॥
आरती कुंजबिहारी की

आरती कुंजबिहारी की

श्री स्वामी हरिदास परम्परा

🪔 आरती

ब्रज-संस्कृति एवं श्री बांकेबिहारी जी के मन्दिरों में गाई जाने वाली यह परम मधुर आरती भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के युगल प्रेम, बंसी-नाद तथा वनमाला से सुशोभित श्यामसुन्दर के नयनाभिराम रूप को समर्पित है।

आरती कुंजबिहारी की

ब्रज-संस्कृति एवं श्री बांकेबिहारी जी के मन्दिरों में गाई जाने वाली यह परम मधुर आरती भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के युगल प्रेम, बंसी-नाद तथा वनमाला से सुशोभित श्यामसुन्दर के नयनाभिराम रूप को समर्पित है।

॥ श्रीराधाकृष्णाय नमः ॥
॥ आरती श्री कुंजबिहारी जी की ॥
॥ १ ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
॥ २ ॥
गले में बैजन्ती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नन्द के आनन्द नन्दलाला।
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
अर्थ : जिनके गले में दिव्य बैजन्ती-माला सुशोभित है, जो बाल-रूप में मधुर वंशी बजा रहे हैं, जिनके कानों में स्वर्ण-कुण्डल चमक रहे हैं, जो नन्दबाबा को आनन्दित करने वाले लाड़ले नन्दलाल हैं — उन गिरिधर कृष्ण मुरारी की हम मंगल आरती करते हैं।
॥ ३ ॥
गगन सम अंग कान्ति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चन्द्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
अर्थ : जिनके श्रीअंगों की श्यामल कान्ति मेघमय आकाश के सदृश है, जिनके वामभाग में सखियों सहित परम रूपवती श्रीराधिका जी आलोकित हो रही हैं, और लताओं के मध्य वनमाली श्रीकृष्ण विराजमान हैं। भँवरों जैसी काली-घुंघराली अलकें, ललाट पर कस्तूरी का तिलक, और चन्द्रमा के समान मुखमण्डल का दिव्य प्रकाश — श्यामा प्यारी एवं श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की इस मनोहारी छवि की हम आरती करते हैं।
॥ ४ ॥
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन बहु बरसहिं;
बजत मुरचंग, मधुर मृदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
अर्थ : जिनके शीश पर स्वर्ण-जड़ित मोर-मुकुट शोभायमान है, जिनके दर्शनों के लिए समस्त देवता तरसते हैं और आकाश से पुष्पों की वर्षा करते हैं। जहाँ मुरचंग और मधुर मृदंग की दिव्य ध्वनियाँ गूँज रही हैं और गोपियों के संग प्रभु रास-रस में निमग्न हैं — ब्रजगोपियों के अतुल्य अनन्य प्रेम के आधार श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की हम आरती करते हैं।
॥ ५ ॥
जहाँ ते प्रगट भई गंगा, कलुष कलि-हारिणी श्रीगंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा;
बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरण छवि श्रीबनवारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
अर्थ : जिनके पावन चरण-कमलों से कलियुग के समस्त पापों को हरने वाली पतित-पावनि श्रीगंगा जी प्रकट हुईं, जिनके स्मरण मात्र से मोह का नाश हो जाता है, और जो भगवान शिव के शीश तथा जटाओं के मध्य विराजकर संसार के समस्त पाप-तापों को धो डालती हैं — उन परम पावन चरण-युगल वाले श्री बनवारी गिरिधर कृष्ण मुरारी की हम आरती करते हैं।
॥ ६ ॥
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृन्दावन बेनू।
चरावे गोपी-सुत धेनू;
हँसत मृदु मन्द, चाँदनी चन्द, कटत भव फन्द;
टेर सुनु दीन भिखारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
अर्थ : जमुना जी के तट की उज्ज्वल बालू चमक रही है, वृन्दावन की कुंज-गलियों में प्रभु की मधुर वंशी गूँज रही है, और यशोदानन्दन गऊओं को चरा रहे हैं। मन्द-मन्द मुस्कान से पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसी शीतल अमृत-वर्षा हो रही है, जिससे संसार के भव-बन्धन कट जाते हैं। हे गिरिधर! मुझ दीन याचक की पुकार सुनिए — हम सब मिलकर आपकी मंगल आरती उतारते हैं।
॥ ७ ॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की।
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
॥ इति श्री कुंजबिहारी जी की आरती सम्पूर्णा ॥