अष्टावक्र गीता
महर्षि अष्टावक्र
महर्षि अष्टावक्र एवं राजा जनक के मध्य का यह संवाद विशुद्ध अद्वैत वेदान्त का सर्वोच्च शिखर ग्रन्थ है। इसमें बिना किसी कर्मकाण्ड के साक्षात् आत्म-ज्ञान, साक्षी-भाव, मुक्ति एवं संसार के मिथ्यात्व का निर्भीक एवं स्पष्ट प्रतिपादन है।
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
॥ अथ अष्टावक्रगीता ॥
॥ प्रथमं प्रकरणम् — आत्म-साक्षात्कार की विधि ॥
॥ अथ अष्टावक्रगीता ॥
॥ प्रथमं प्रकरणम् — आत्म-साक्षात्कार की विधि ॥
॥ जनक उवाच ॥
॥ १ ॥
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद्ब्रूहि मम प्रभो॥
अर्थ :
राजा जनक ने पूछा — 'हे प्रभो! मनुष्य को यथार्थ आत्म-ज्ञान कैसे प्राप्त होता है? मुक्ति कैसे सिद्ध होती है? और सच्चा वैराग्य किस प्रकार प्राप्त किया जाता है? यह सब कृपा करके मुझे बतलाइए।'
॥ अष्टावक्र उवाच ॥
॥ २ ॥
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान्विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज॥
अर्थ :
महर्षि अष्टावक्र बोले — 'हे तात! यदि तुम वास्तव में मुक्ति की अभिलाषा रखते हो, तो सांसारिक विषयों (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द) को विष के समान त्याग दो; और क्षमा, सरलता, दया, सन्तोष तथा सत्य का अमृत के समान नित्य सेवन करो।'
॥ ३ ॥
न पृथिवी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥
अर्थ :
'तुम न पृथ्वी हो, न जल हो, न अग्नि हो, न वायु हो और न आकाश ही हो। मुक्ति के लिए तुम इन पाँचों भूतों और देह के साक्षी, ज्ञानस्वरूप चैतन्य आत्मा को ही अपना वास्तविक स्वरूप जानो।'
॥ ४ ॥
यदि देहं पृथक् कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि।
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि॥
अर्थ :
'यदि तुम इस नश्वर शरीर से अपने आत्म-भाव को पृथक् करके, केवल विशुद्ध चैतन्य में विश्रामपूर्वक स्थित हो जाओ, तो इसी क्षण तुम परम सुखी, परम शान्त और समस्त बन्धनों से सर्वथा मुक्त हो जाओगे।'
॥ ५ ॥
न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः।
असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव॥
अर्थ :
'तुम न ब्राह्मण आदि कोई वर्ण हो, न ब्रह्मचर्य आदि कोई आश्रम हो, और न चर्म-चक्षुओं से दिखाई देने वाले कोई पदार्थ हो। तुम सर्वथा असंग, निराकार और सम्पूर्ण विश्व के साक्षी हो; अतः अपने इस स्वरूप को जानकर सदा सुखी रहो।'
॥ ६ ॥
धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो।
न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा॥
अर्थ :
'हे सर्वव्यापक आत्मन्! धर्म और अधर्म, सुख और दुःख — ये सब केवल मन की वृत्तियाँ हैं, तुम्हारी नहीं। तुम न किसी कर्म के कर्ता हो और न किसी फल के भोक्ता हो; तुम तो सदा से ही सर्वथा मुक्त स्वरूप हो।'
॥ ७ ॥
एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥
अर्थ :
'तुम इस सम्पूर्ण चराचर जगत के एकमात्र द्रष्टा (साक्षी) हो और सदा ही मुक्त हो। तुम्हारा बन्धन केवल इतना ही है कि तुम अपने को द्रष्टा न मानकर किसी अन्य दृश्य वस्तु को अपना स्वरूप मान बैठते हो।'
॥ ८ ॥
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव॥
अर्थ :
'"मैं कर्ता हूँ" — इस अहंकार रूपी काले विषधर सर्प ने तुम्हें डंस लिया है। "मैं कर्ता नहीं हूँ, केवल साक्षी हूँ" — इस अटल विश्वास रूपी अमृत का पान करके परम सुखी हो जाओ।'
॥ ९ ॥
एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव॥
अर्थ :
'"मैं एक विशुद्ध ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ" — इस दृढ़ निश्चय रूपी अग्नि से अपने अज्ञान के घोर वन को भस्म करके, शोकरहित और परम आनन्दमय हो जाओ।'
॥ १० ॥
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्।
आनन्दपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं चर॥
अर्थ :
'जिस आत्म-तत्त्व में यह सम्पूर्ण विश्व रस्सी में साँप के समान भ्रमवश कल्पित होकर प्रतीत हो रहा है — तुम साक्षात् वही परमानन्द-स्वरूप चैतन्य हो; अतः संसार में निःशंक और स्वच्छन्द विचरण करो।'
॥ ११ ॥
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किम्वदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥
अर्थ :
'जो स्वयं को मुक्त मानता है, वह वास्तव में मुक्त ही है; और जो स्वयं को बन्धन में बँधा मानता है, वह बँध जाता है। इस संसार में यह कहावत अक्षरशः सत्य है — "जैसी मति होती है, वैसी ही गति होती है।"'
॥ १२ ॥
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव॥
अर्थ :
'आत्मा साक्षात् साक्षी है, सर्वव्यापक है, पूर्ण है, एक है, नित्य मुक्त है, ज्ञानस्वरूप और अक्रिय है। वह असंग, निष्काम और शान्त है; केवल अज्ञान के भ्रम के कारण ही वह संसार-चक्र में पड़ा हुआ प्रतीत होता है।'
॥ द्वितीयं प्रकरणम् — जनक का अद्भुत आत्म-साक्षात्कार ॥
॥ जनक उवाच ॥
॥ १३ ॥
अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः॥
अर्थ :
राजा जनक ने आनन्दविभोर होकर कहा — 'अहो! मैं तो समस्त दोषों से रहित, परम शान्त, प्रकृति से सर्वथा परे विशुद्ध चैतन्य हूँ! इतने लम्बे समय तक मैं केवल अज्ञान के मोह में ही व्यर्थ भटकता रहा!'
॥ १४ ॥
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत्।
अतो विश्वमिदं सर्वं मम वा न च किञ्चन॥
अर्थ :
'जैसे अकेला मैं ही इस भौतिक देह को अपनी चेतना से प्रकाशित करता हूँ, वैसे ही इस सम्पूर्ण जगत को भी मैं ही प्रकाशित करता हूँ। अतः यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मेरा ही स्वरूप है, अथवा मेरा इसमें कुछ भी नहीं है!'
॥ १५ ॥
सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाऽधुना।
कुतश्चित्कौशलादेव परमात्मा विलोकितः॥
अर्थ :
'अहो! शरीर सहित इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च को अब मैंने त्याग दिया है, और आपके उपदेश-रूपी परम कौशल से ही मैंने अपने अन्तरात्मा में साक्षात् परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन कर लिया है!'
॥ १६ ॥
आश्चर्यं तन्ममोपपन्नं मह्यमेव नमो नमः।
क्षीणेऽपि देहे जीवन्तो यः समर्थः स्वलीलया॥
अर्थ :
'कैसा अद्भुत आश्चर्य है! मुझ विशुद्ध आत्म-स्वरूप को मेरा ही बारम्बार नमस्कार है! देह के नष्ट हो जाने पर भी जो अपने दिव्य स्वरूप में सदा नित्य और अविनाशी रहता है, उस अपने ही आत्मा को मेरा प्रणाम है!'
॥ इति श्रीमदष्टावक्रगीतायां जनक-आत्मसाक्षात्कारः सम्पूर्णः ॥