॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १०

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १०

वेदव्यास

🎵 गीता

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने ऐश्वर्य, योग-शक्ति और सम्पूर्ण चराचर जगत् में अपनी प्रधान दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं, जिससे अर्जुन के हृदय में विश्वेश्वर के प्रति परम श्रद्धा और विस्मय का प्राकट्य होता है।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १०

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने ऐश्वर्य, योग-शक्ति और सम्पूर्ण चराचर जगत् में अपनी प्रधान दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं, जिससे अर्जुन के हृदय में विश्वेश्वर के प्रति परम श्रद्धा और विस्मय का प्राकट्य होता है।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ दशमोऽध्यायः — विभूतियोगः
भगवान श्रीकृष्ण का सर्वकारणत्व, प्रीतिपूर्वक भजने वाले भक्तों को बुद्धियोग और ज्ञानदीपक की कृपा, अर्जुन द्वारा भगवान के परब्रह्म रूप की स्तुति, तथा सृष्टि के श्रेष्ठ पदार्थों व जीवों में भगवान की प्रधान दिव्य विभूतियों का साक्षात् दर्शन।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १ ॥
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तुम फिर सुनो, जिसे मैं तुमसे अतिशय प्रेम रखने वाले के हित की कामना से कहूँगा।
॥ २ ॥
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
अर्थ : मैं सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का मूल कारण हूँ और मुझसे ही सब प्रवृत्त होता है — ऐसा मानकर बुद्धिमान् भक्तजन परम श्रद्धा और भाव से युक्त होकर मुझे भजते हैं।
॥ ३ ॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
अर्थ : मुझमें चित्त वाले, मुझमें ही अपने प्राणों को अर्पण करने वाले मेरे भक्तजन निरन्तर आपस में मेरे प्रभाव की चर्चा करते हुए और मेरा गुणगान करते हुए ही सन्तुष्ट रहते हैं और आनन्द में मग्न रहते हैं।
॥ ४ ॥
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥
अर्थ : उन नित्य मुझमें लगे हुए तथा प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को मैं वह बुद्धियोग (दिव्य ज्ञान) प्रदान करता हूँ, जिससे वे साक्षात् मुझको ही प्राप्त हो जाते हैं।
॥ ५ ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
अर्थ : उन पर अनुग्रह (कृपा) करने के लिए ही उनके अन्तःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमान ज्ञानरूपी दीपक द्वारा पूर्णतया नष्ट कर देता हूँ।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ ६ ॥
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥
अर्थ : अर्जुन बोले — आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं; सम्पूर्ण ऋषिगण आपको सनातन दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी विभु कहते हैं।
॥ ७ ॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥
अर्थ : इसलिए आप ही अपनी उन दिव्य विभूतियों को सम्पूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन समस्त लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ ८ ॥
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं अपनी दिव्य विभूतियों में से प्रधान-प्रधान विभूतियों को तुमसे कहता हूँ; क्योंकि मेरे विस्तार का कोई अन्त नहीं है।
॥ ९ ॥
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥
अर्थ : हे निद्राजयी अर्जुन! मैं सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ; तथा सम्पूर्ण प्राणियों का आदि (उत्पत्ति), मध्य (स्थिति) और अन्त (प्रलय) भी मैं ही हूँ।
॥ १० ॥
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥
अर्थ : मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ; मरुद्गणों में मरीचि और नक्षत्रों (तारों) का अधिपति चन्द्रमा मैं हूँ।
॥ ११ ॥
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥
अर्थ : मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवताओं में देवराज इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और प्राणियों में उनकी चेतना (जीवन-शक्ति) हूँ।
॥ १२ ॥
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥
अर्थ : ग्यारह रुद्रों में शङ्कर हूँ, यक्ष और राक्षसों में कुबेर हूँ, आठ वसुओं में अग्नि हूँ और पर्वतों में सुमेरु पर्वत मैं हूँ।
॥ १३ ॥
महर्षीणां भृगुरहमक्षराणामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥
अर्थ : महर्षियों में भृगु हूँ, शब्दों में एकाक्षर ॐकार (ॐ) हूँ, सब यज्ञों में जपयज्ञ हूँ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पर्वत मैं हूँ।
॥ १४ ॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः।
गन्धर्वानां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥
अर्थ : सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि मैं हूँ।
॥ १५ ॥
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥
अर्थ : दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल (समय) मैं हूँ; पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ मैं हूँ।
॥ १६ ॥
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥
अर्थ : पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम मैं हूँ; मत्स्यों में मगर और नदियों में श्रीगंगा जी मैं हूँ।
॥ १७ ॥
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥
अर्थ : संसार में जो-जो भी ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु या प्राणी है, उस-उस को तुम मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न हुआ जानो।
॥ १८ ॥
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥
अर्थ : अथवा हे अर्जुन! तुम्हें इस बहुत जानने से क्या प्रयोजन? तुम इतना समझ लो कि मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक ही अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥