॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १३

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १३

वेदव्यास

🎵 गीता

यहाँ से गीता के ज्ञान-प्रधान अन्तिम षटक का आरम्भ होता है। इसमें शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ), प्रकृति और पुरुष का दार्शनिक विवेक तथा २४ तत्वों और आत्म-साक्षात्कार के बीस दिव्य सद्गुणों का गम्भीर विवेचन है।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १३

यहाँ से गीता के ज्ञान-प्रधान अन्तिम षटक का आरम्भ होता है। इसमें शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ), प्रकृति और पुरुष का दार्शनिक विवेक तथा २४ तत्वों और आत्म-साक्षात्कार के बीस दिव्य सद्गुणों का गम्भीर विवेचन है।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः
शरीररूपी क्षेत्र और जीवात्मारूपी क्षेत्रज्ञ का विवेक; विकारसहित २४ तत्त्वों वाले क्षेत्र का निरूपण; ज्ञान के २० अमूल्य साधन (अमानित्व, अहिंसा आदि); ज्ञेय परब्रह्म का स्वरूप; तथा प्रकृति-पुरुष विवेक द्वारा मोक्ष-प्राप्ति।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १ ॥
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर 'क्षेत्र' (खेत) नाम से कहा जाता है; और जो इसको जानता है, उसको तत्त्व को जानने वाले ज्ञानीजन 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा) कहते हैं।
॥ २ ॥
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥
अर्थ : हे भारत! सम्पूर्ण क्षेत्रों (शरीरों) में क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) भी तुम वास्तव में मुझे ही जानो; और क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ को जो तत्त्व से जानना है, वही मेरे मत में यथार्थ ज्ञान है।
॥ ३ ॥
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥
अर्थ : पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश), अहंकार, बुद्धि, मूल प्रकृति, दस इन्द्रियाँ, एक मन, पाँच इन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध); तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देह का पिण्ड (संघात), चेतना और धृति (धैर्य) — इस प्रकार विकारों सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया है।
॥ ४ ॥
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥
अर्थ : श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी की सरलता, श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों का पूर्ण निग्रह;
॥ ५ ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥
अर्थ : इन्द्रियों के भोगों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगों में दुःखों एवं दोषों का बारम्बार विचार करना;
॥ ६ ॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥
अर्थ : पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव तथा ममता का न होना, एवं प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना;
॥ ७ ॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥
अर्थ : मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी (एकान्त) भक्ति, एकान्त और पवित्र स्थान में रहने का स्वभाव, विषयी मनुष्यों के समुदाय में अनुराग न होना, अध्यात्मज्ञान में नित्य स्थिति, और तत्त्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा का ही निरन्तर दर्शन — यह सब 'ज्ञान' कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह 'अज्ञान' है।
॥ ८ ॥
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥
अर्थ : जो जानने योग्य है और जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द (अमृतत्व) को प्राप्त होता है, उसको मैं भली-भाँति कहूँगा। वह अनादि परम ब्रह्म न सत् कहा जाता है और न असत् ही।
॥ ९ ॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
अर्थ : वह सब ओर हाथ और पैरों वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला, तथा सब ओर कान वाला है; क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है।
॥ १० ॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥
अर्थ : वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, किन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है; तथा आसक्तिरहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों का भोक्ता है।
॥ ११ ॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥
अर्थ : जो पुरुष सम्पूर्ण विनाशशील चराचर प्राणियों में अविनाशी परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही वास्तव में सही देखता है।
॥ १२ ॥
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥
अर्थ : हे भारत! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा (क्षेत्री) सम्पूर्ण शरीर (क्षेत्र) को प्रकाशित (चेतन) करता है।
॥ १३ ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥
अर्थ : इस प्रकार क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के भेद को तथा कार्यसहित प्रकृति से मुक्त होने के उपाय को जो पुरुष ज्ञानरूपी नेत्रों द्वारा तत्त्व से जान लेते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥