श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १५
वेदव्यास
वेदों के सारभूत इस अध्याय में संसार को ऊर्ध्वमूल और अधःशाखा वाले अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूप में निरूपित कर वैराग्य-रूपी शस्त्र से काटने का उपदेश है। क्षर, अक्षर से परे सनातन पुरुषोत्तम तत्त्व का साक्षात् उद्घाटन यहाँ हुआ है।
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ पञ्चदशोऽध्यायः — पुरुषोत्तमयोगः
अथ पञ्चदशोऽध्यायः — पुरुषोत्तमयोगः
ऊर्ध्वमूल और अधःशाखा वाले संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष का सांगोपांग वर्णन; वैराग्यरूपी दृढ़ शस्त्र द्वारा उस वृक्ष को काटकर परमपद की खोज; परमात्मा के परम धाम का स्वरूप; जीवात्मा का शरीरान्तर-गमन; परमात्मा का सर्वव्यापक प्रभाव (सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, पृथ्वी, अन्न-पाचन); क्षर (नाशवान्) और अक्षर (जीवात्मा) तथा दोनों से परे सर्वोत्तम 'पुरुषोत्तम' तत्त्व का उद्घाटन।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १ ॥
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
अर्थ :
श्रीभगवान् बोले — ऊपर की ओर मूल (परमेश्वर) वाले और नीचे की ओर शाखा (ब्रह्मा आदि) वाले जिस संसाररूपी अश्वत्थ (पीपल के) वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते कहे गए हैं; उस संसार-वृक्ष को जो तत्त्व से जानता है, वही वेदों के रहस्य को जानने वाला है।
॥ २ ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥
अर्थ :
उस संसार-वृक्ष की तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) द्वारा बढ़ी हुई और विषय-भोगरूपी कोपलों वाली शाखाएँ नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं; तथा मनुष्य-लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली वासणारूपी जड़ें नीचे पाताल से लेकर ऊपर तक सब दिशाओं में फैली हुई हैं।
॥ ३ ॥
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं
यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये
यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥
अर्थ :
इस संसार-वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा गया है, वैसा यहाँ विचार करने पर नहीं मिलता; क्योंकि न तो इसका आदि है, न अन्त है और न अच्छी स्थिति ही है। इसलिए इस अति दृढ़ मूलों वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ वैराग्यरूप शस्त्र द्वारा काटकर; उसके पश्चात् उस परमपद परमात्मा की भली-भाँति खोज करनी चाहिए, जिसमें पहुँचे हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते। और यह निश्चय करना चाहिए कि — जिस आदि पुरुष परमेश्वर से यह अनादि संसार-प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी की मैं शरण हूँ।
॥ ४ ॥
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै-
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥
अर्थ :
जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो निरन्तर परमात्मा के ध्यान में मग्न रहते हैं, जिनकी समस्त कामनाएँ पूर्णतः निवृत्त हो चुकी हैं, और जो सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से सर्वथा मुक्त हैं — ऐसे ज्ञानी अमूढ़ जन उस अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं।
॥ ५ ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
अर्थ :
जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य संसार में लौटकर नहीं आते, उस मेरे परम धाम को न तो सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही; वही मेरा परम धाम है।
॥ ६ ॥
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
अर्थ :
इस देह में यह सनातन जीवात्मा वास्तव में मेरा ही अंश है; वही प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है (अपने साथ खींचता है)। वायु जैसे पुष्प आदि स्थानों से गन्ध को ग्रहण करके ले जाती है, वैसे ही देहाभिमानी जीवात्मा भी जिस शरीर को त्यागता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है।
॥ ७ ॥
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥
अर्थ :
यह जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, रसना और नासिका — इन पाँचों इन्द्रियों तथा मन का आश्रय लेकर ही विषयों का उपभोग करता है। शरीर छोड़ते समय, शरीर में रहते समय अथवा विषयों को भोगते समय और तीनों गुणों से युक्त होने पर भी अज्ञानी मनुष्य इस आत्मा को नहीं देख पाते; केवल ज्ञानरूपी नेत्रों वाले विवेकशील जन ही इसे तत्त्व से देखते हैं।
॥ ८ ॥
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥
अर्थ :
यत्न करने वाले योगी जन अपने हृदय में स्थित इस आत्मतत्त्व को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं; किन्तु जिन्होंने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानी मनुष्य यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं देख पाते।
॥ ९ ॥
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥
अर्थ :
सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, तथा जो तेज चन्द्रमा में और अग्नि में है — उस तेज को तुम मेरा ही जानो। और पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से मैं ही सब प्राणियों को धारण करता हूँ, तथा अमृतमय रसस्वरूप चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण वनस्पतियों और औषधियों को पुष्ट करता हूँ।
॥ १० ॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥
अर्थ :
मैं ही सब प्राणियों के शरीर में रहने वाला जठराग्नि (वैश्वानर) होकर प्राण और अपान से युक्त हुआ चार प्रकार के (चबाने, चूसने, चाटने और पीने योग्य) अन्न को पचाता हूँ। मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ; मुझ से ही स्मृति, ज्ञान और संशय का नाश होता है। समस्त वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ; वेदान्त का कर्ता और वेदों का यथार्थ ज्ञाता भी मैं ही हूँ।
॥ ११ ॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥
अर्थ :
इस संसार में दो प्रकार के पुरुष (चेतन सत्ताएँ) हैं — क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी)। सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के शरीर तो क्षर हैं और जीवात्मा अक्षर (कूटस्थ) कहा जाता है। किन्तु इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो 'परमात्मा' नाम से कहा गया है; जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका भरण-पोषण करता है, वह अविनाशी परमेश्वर है।
॥ १२ ॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥
अर्थ :
क्योंकि मैं नाशवान् जड़-प्रकृति (क्षर) से सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा (अक्षर) से भी उत्तम हूँ; इसलिए संसार में और वेद में भी 'पुरुषोत्तम' नाम से प्रसिद्ध हूँ। हे भारत! जो संशयरहित ज्ञानी पुरुष मुझे इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष मुझ परमेश्वर को ही सब प्रकार से निरन्तर भजता है।
॥ १३ ॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥
अर्थ :
हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया; इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य परम बुद्धिमान् और कृतकृत्य (जिसका सब कर्तव्य पूर्ण हो गया हो) हो जाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५ ॥