श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १६
वेदव्यास
इसमें मनुष्य के अभ्युदय और पतन का कारण बनने वाली दैवी (अभय, सत्य, अहिंसा आदि) और आसुरी (दम्भ, दर्प, क्रोध, अज्ञान आदि) सम्पदाओं का स्पष्ट विभाजन है। काम, क्रोध और लोभ को आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन द्वार बताया गया है।
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ षोडशोऽध्यायः — दैवासुरसम्पद्विभागयोगः
अथ षोडशोऽध्यायः — दैवासुरसम्पद्विभागयोगः
परम कल्याणकारी दैवी सम्पदा के २६ सद्गुणों (अभय, सत्त्वसंशुद्धि, ज्ञानयोग, दान, दम, यज्ञ आदि) का निरूपण; दुर्गति देने वाले आसुरी सम्पदा के दुर्गुणों का वर्णन; दोनों सम्पदाओं के फल (मुक्ति और बन्धन); आसुरी स्वभाव वाले व्यक्तियों की अनीश्वरवादी विचारधारा, दम्भ, काम-भोग, परपीड़ा और पतन का विस्तार; काम, क्रोध और लोभ रूपी नरक के तीन द्वारों का त्याग; तथा कर्तव्य-अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र को प्रमाण मानने की आज्ञा।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १ ॥
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
अर्थ :
श्रीभगवान् बोले — हे भारत! सर्वथा भयरहित होना, अन्तःकरण की शुद्धता, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय (वेदों और सद्ग्रन्थों का पाठ), स्वधर्म-पालन रूपी तप, सरलता; अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, मन की शान्ति, चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, विषयों में लोलुपता न होना, कोमलता, लज्जा (अनुचित कर्म से संकोच), चंचलता का अभाव; तेज, क्षमा, धैर्य, बाह्य और आन्तरिक शुद्धि, किसी में भी शत्रुभाव न रखना, और अपने में पूज्यता का अभिमान न होना — ये छब्बीस लक्षण दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के होते हैं।
॥ २ ॥
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम्॥
अर्थ :
हे पार्थ! दम्भ (पाखण्ड), घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान — ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए मनुष्य के लक्षण हैं।
॥ ३ ॥
दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु॥
अर्थ :
दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गई है। इसलिए हे पाण्डव! तुम शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए हो। इस लोक में प्राणियों की सृष्टि दो ही प्रकार की है — दैवी और आसुरी। उनमें से दैवी सम्पदा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया जा चुका है; अब हे पार्थ! आसुरी सम्पदा का वर्णन मुझसे सुनो।
॥ ४ ॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥
अर्थ :
आसुर स्वभाव वाले मनुष्य यह नहीं जानते कि किस कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए और किस पाप-कर्म से निवृत्त होना चाहिए; इसलिए उनमें न तो शुद्धि होती है, न श्रेष्ठ आचरण होता है और न सत्य ही होता है। वे कहा करते हैं कि यह जगत् असत्य, बिना किसी आधार के और बिना ईश्वर का है; केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से स्वतः उत्पन्न हुआ है, काम के सिवा इसकी उत्पत्ति का और क्या कारण हो सकता है?
॥ ५ ॥
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥
अर्थ :
इस नास्तिक दृष्टि का आश्रय लेकर, नष्ट आत्मा वाले और मन्द बुद्धि वाले वे क्रूरकर्मी मनुष्य केवल संसार का अनिष्ट और विनाश करने के लिए ही उत्पन्न होते हैं। वे कभी न तृप्त होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर पाखण्ड, मान और मद से उन्मत्त रहते हैं, तथा मोहवश मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके अपवित्र आचरणों में प्रवृत्त रहते हैं।
॥ ६ ॥
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥
अर्थ :
वे मृत्युपर्यन्त रहने वाली अनन्त चिन्ताओं में डूबे रहते हैं, केवल विषय-भोगों को ही जीवन का परम ध्येय मानते हैं और उनका दृढ़ निश्चय होता है कि बस इतना ही जीवन है। वे आशा के सैकड़ों पाशों (रस्सियों) में बँधे हुए, काम और क्रोध के परायण होकर, विषय-भोगों की तृप्ति के लिए अन्यायपूर्वक धन का सञ्चय करने की चेष्टा करते हैं।
॥ ७ ॥
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥
अर्थ :
वे अज्ञानी सोचा करते हैं — 'आज मैंने यह प्राप्त कर लिया, अब इस मनोरथ को भी पूरा करूँगा; मेरे पास इतना धन है और आगे भी यह धन और बढ़ जाएगा। उस शत्रु को मैंने मार दिया, अन्य शत्रुओं को भी मार डालूँगा; मैं ही सबका स्वामी (ईश्वर) हूँ, मैं ही भोगी हूँ, मैं ही सिद्ध, बलवान् और सुखी हूँ। मैं बड़ा धनी और कुलीन हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और मौज मनाऊँगा' — इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।
॥ ८ ॥
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥
अर्थ :
अनेक प्रकार से भटके हुए चित्त वाले, मोह के जाल में फँसे हुए और विषय-भोगों में अत्यन्त आसक्त वे दुराचारी मनुष्य अपवित्र घोर नरकों में गिरते हैं। अपने-आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले, घमण्डी, धन और मान के मद में चूर वे लोग केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्डपूर्वक शास्त्रविधि से रहित दिखावटी पूजन करते हैं। वे अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर अपने और दूसरों के शरीरों में अन्तर्यामी रूप से स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं और दूसरों के गुणों में दोष निकालते हैं।
॥ ९ ॥
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥
अर्थ :
उन द्वेष करने वाले, क्रूरकर्मी, पापी और संसार के नराधमों को मैं निरन्तर आसुरी योनियों (साँप, बिच्छू, व्याघ्र आदि क्रूर जीवों) में ही गिराता हूँ। हे कुन्तीपुत्र! वे मूढ़ मनुष्य जन्म-जन्मान्तर में आसुरी योनियों को ही प्राप्त होकर, मुझे न पाकर उससे भी अति अधम गति (घोर नरक) को प्राप्त होते हैं।
॥ १० ॥
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥
अर्थ :
काम, क्रोध तथा लोभ — ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले (पतन करने वाले) हैं; इसलिए इन तीनों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। हे कुन्तीपुत्र! नरक के इन तीनों तमोद्वारों से छूटा हुआ मनुष्य अपने आत्मा का कल्याण आचरण करता है और उससे वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
॥ ११ ॥
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
अर्थ :
जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है, न सुख को और न परम गति को ही प्राप्त होता है। इसलिए तुम्हारे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है; ऐसा जानकर तुम्हें शास्त्रविधि से नियत किए गए कर्म को ही इस लोक में करना चाहिए।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६ ॥