॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १७

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १७

वेदव्यास

🎵 गीता

इस अध्याय में मनुष्यों के स्वभाव के अनुसार श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान के त्रिविध (सात्त्विक, राजसिक, तामसिक) भेदों का सूक्ष्म विश्लेषण है। अध्याय के अन्त में परम ब्रह्म के वाचक ॐ तत् सत् के रहस्यमयी विनियोग का उपदेश है।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १७

इस अध्याय में मनुष्यों के स्वभाव के अनुसार श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान के त्रिविध (सात्त्विक, राजसिक, तामसिक) भेदों का सूक्ष्म विश्लेषण है। अध्याय के अन्त में परम ब्रह्म के वाचक ॐ तत् सत् के रहस्यमयी विनियोग का उपदेश है।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ सप्तदशोऽध्यायः — श्रद्धात्रयविभागयोगः
अर्जुन का प्रश्न — शास्त्रविधि त्यागकर श्रद्धा से पूजन करने वालों की निष्ठा क्या है? भगवान् द्वारा स्वभावजा त्रिविध श्रद्धा (सात्त्विकी, राजसी, तामसी) का निरूपण; तीन प्रकार के आहार का स्वास्थ्य व स्वभाव पर प्रभाव; सात्त्विक, राजसिक और तामसिक यज्ञों का स्वरूप; शरीर, वाणी और मन के सात्त्विक, राजसिक, तामसिक तपों का विशद विश्लेषण; तीन प्रकार के दान; तथा 'ॐ तत् सत्' इन तीन भगवन्नामों का अर्थ, प्रयोग और महिमा।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ १ ॥
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर केवल श्रद्धा से युक्त होकर देवताओं आदि का पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा कैसी होती है? सात्त्विकी, राजसी अथवा तामसी?
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ २ ॥
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे अर्जुन! मनुष्यों की वह पूर्वजन्मों के संस्कारों से उत्पन्न स्वभाविक श्रद्धा तीन प्रकार की होती है — सात्त्विकी, राजसी और तामसी; उसको तुम मुझसे सुनो। हे भारत! सब मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है; यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वैसा ही है।
॥ ३ ॥
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥
अर्थ : सात्त्विक मनुष्य देवों को पूजते हैं, राजसिक मनुष्य यक्ष और राक्षसों को पूजते हैं, तथा अन्य जो तामसिक मनुष्य हैं, वे भूत-प्रेतों को पूजते हैं। जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनमाने घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त हैं एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भरे हैं; जो शरीर में स्थित पञ्चमहाभूतों को तथा हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित मुझ परमात्मा को भी कष्ट देते हैं, उन अज्ञानियों को तुम आसुरी निश्चय वाले जानो।
॥ ४ ॥
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
अर्थ : भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है; इसी प्रकार यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं, उनके इस भेद को सुनो। आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने, स्थिर रहने वाले तथा मन को प्रिय लगने वाले आहार सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होते हैं।
॥ ५ ॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥
अर्थ : अति कड़वे, खट्टे, खारे, अति गरम, तीखे, रूखे और दाह उत्पन्न करने वाले भोजन राजसिक मनुष्य को प्रिय होते हैं; वे दुःख, शोक और रोगों को उत्पन्न करने वाले हैं। जो भोजन आधा पका हो, रसरहित हो, दुर्गन्धयुक्त हो, बासी हो, जूठा हो और अपवित्र हो — वह भोजन तामसिक मनुष्यों को प्रिय होता है।
॥ ६ ॥
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥
अर्थ : जो यज्ञ शास्त्रविधि के अनुसार, फल की इच्छा न रखने वाले पुरुषों द्वारा 'यज्ञ करना कर्तव्य है' — ऐसा मन को समाधान करके किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है। हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल को ध्यान में रखकर अथवा पाखण्ड व दिखावे के लिए किया जाता है, उस यज्ञ को तुम राजसिक जानो। और जो यज्ञ शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, मन्त्रहीन, दक्षिणाहीन और श्रद्धा से शून्य होता है, वह तामसिक यज्ञ कहा जाता है।
॥ ७ ॥
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
अर्थ : देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — यह शरीर का तप कहा जाता है। जो उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारक वचन है, तथा जो वेदों और शास्त्रों के अध्ययन का अभ्यास है — वह वाणी का तप कहा जाता है। मन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की शुद्धि — यह मन का तप कहा जाता है।
॥ ८ ॥
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥
अर्थ : फल की इच्छा न रखने वाले एकाग्रचित्त पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को 'सात्त्विक' कहते हैं। जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए तथा पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित और नाशवान् फल देने वाला तप 'राजसिक' कहा गया है। और जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, अपने शरीर को कष्ट देकर अथवा दूसरों का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है, वह तप 'तामसिक' कहा गया है।
॥ ९ ॥
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥
अर्थ : 'दान देना कर्तव्य है' — ऐसे भाव से जो दान देश, काल और योग्य पात्र को देखकर, प्रत्युपकार (बदले) की भावना के बिना दिया जाता है, वह दान 'सात्त्विक' माना गया है। किन्तु जो दान बदले में उपकार पाने की आशा से अथवा फल को ध्यान में रखकर और क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान 'राजसिक' कहा गया है। और जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक, अयोग्य देश-काल में और कुपात्र को दिया जाता है, वह दान 'तामसिक' कहा गया है।
॥ १० ॥
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥
अर्थ : 'ॐ', 'तत्' और 'सत्' — यह तीन प्रकार का नाम सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का स्मरण कराने वाला कहा गया है; उसी से सृष्टि के आदि में वेद, ब्राह्मण और यज्ञ रचे गए। इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूपी क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस नाम का उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।
॥ ११ ॥
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥
अर्थ : 'तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा के लिए ही सब कुछ है — ऐसा मानकर फल की इच्छा न रखकर मोक्ष चाहने वाले पुरुषों द्वारा विविध प्रकार के यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ की जाती हैं। 'सत्' यह भगवन्नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है; तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्' शब्द का प्रयोग होता है। यज्ञ, तप और दान में जो दृढ़ स्थिति है, वह भी 'सत्' कही जाती है; और परमात्मा के निमित्त किया गया कर्म भी निश्चय ही 'सत्' कहा जाता है।
॥ १२ ॥
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥
अर्थ : हे पार्थ! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तपा हुआ तप और जो कुछ भी शुभ कर्म किया जाता है, वह सब 'असत्' (मिथ्या) कहा जाता है; वह न तो इस लोक में फलदायी होता है और न परलोक में ही।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७ ॥