॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १८

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १८

वेदव्यास

🎵 गीता

यह अध्याय सम्पूर्ण गीता और वेदान्त दर्शन का महासार है। इसमें त्याग और संन्यास का रहस्य, स्वधर्म-पालन, अठारह पुराणों एवं वेदों का निष्कर्षदत्त शरणागति-मन्त्र तथा श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद की परम फलश्रुति निरूपित है।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १८

यह अध्याय सम्पूर्ण गीता और वेदान्त दर्शन का महासार है। इसमें त्याग और संन्यास का रहस्य, स्वधर्म-पालन, अठारह पुराणों एवं वेदों का निष्कर्षदत्त शरणागति-मन्त्र तथा श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद की परम फलश्रुति निरूपित है।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ अष्टादशोऽध्यायः — मोक्षसंन्यासयोगः
अर्जुन द्वारा संन्यास और त्याग के तत्त्व का प्रश्न; भगवान् द्वारा त्याग के तीन भेदों का विवेचन; यज्ञ, दान और तपरूपी कर्मों की अवर्जिनीयता; कर्म-सिद्धि के पाँच कारण (अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा, दैव); ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञाता एवं कर्म, करण, कर्ता; सात्त्विक, राजसिक, तामसिक ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख का समग्र विभाग; चारों वर्णों के स्वाभाविक कर्म और स्वधर्म-पालन द्वारा सिद्धि; ज्ञाननिष्ठा और नैष्कर्म्यसिद्धि; अनन्य भगवद्भक्ति, शरणागति का परम गुह्य उपदेश (सर्वधर्मान्परित्यज्य...); अर्जुन का मोह-नाश; तथा संजय द्वारा धृतराष्ट्र के सम्मुख भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का दिव्य माहात्म्य व विजय-घोष।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ १ ॥
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिसूदन॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे महाबाहो! हे अन्तर्यामी हृषीकेश! हे केशि-निशूदन! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ २ ॥
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — कितने ही पण्डितजन सकाम कर्मों के त्याग को 'संन्यास' समझते हैं; और दूसरे विचारशील विद्वान् सम्पूर्ण कर्मों के फल के त्याग को 'त्याग' कहते हैं। कई मनीषी कहते हैं कि कर्म मात्र दोषयुक्त होने के कारण त्यागने योग्य हैं; और अन्य विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूपी कर्म कभी नहीं त्यागने चाहिए।
॥ ३ ॥
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः॥
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥
अर्थ : हे भरतश्रेष्ठ! संन्यास और त्याग के विषय में मेरा निश्चित मत सुनो; क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकार का कहा गया है। यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि वे अवश्य करने चाहिए; क्योंकि यज्ञ, दान और तप बुद्धिमान् पुरुषों को भी पवित्र करने वाले हैं। इसलिए हे पार्थ! इन कर्मों को तथा अन्य समस्त श्रेष्ठ कर्मों को भी आसक्ति और फलों की इच्छा का त्याग करके ही करना चाहिए — यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
॥ ४ ॥
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥
अर्थ : नियत (शास्त्रविहित) कर्म का त्याग करना उचित नहीं है; मोहवश उसका त्याग कर देना 'तामसिक त्याग' कहा गया है। जो कोई कर्म को शारीरिक क्लेश के भय से दुःखदायक समझकर छोड़ देता है, वह ऐसा 'राजसिक त्याग' करके त्याग के यथार्थ फल को कदापि नहीं पाता। हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म केवल 'करना कर्तव्य है' — इसी भाव से आसक्ति और फल की कामना त्यागकर किया जाता है, वही 'सात्त्विक त्याग' माना गया है।
॥ ५ ॥
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥
अर्थ : जो मनुष्य अकुशल (अप्रिय) कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल (प्रिय) कर्म में आसक्त नहीं होता, वह सत्त्वगुण से युक्त, शुद्ध बुद्धि वाला और संशयरहित सच्चा त्यागी है। क्योंकि देहधारी जीव द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का सर्वथा त्याग किया जाना सम्भव नहीं है; इसलिए जो कर्मफल का त्यागी है, वही वास्तव में त्यागी कहा जाता है।
॥ ६ ॥
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥
अर्थ : कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों को कर्मों का अनिष्ट (नरक-पशु आदि), इष्ट (स्वर्ग-देवता आदि) और मिश्र (मनुष्य-योनि) — यह तीन प्रकार का फल मरने के बाद मिलता है; किन्तु कर्मफल-त्यागी संन्यासियों को कभी कोई फल नहीं भोगना पड़ता।
॥ ७ ॥
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
अर्थ : हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिए सांख्य-सिद्धान्त में कहे गए इन पाँच कारणों को तुम मुझसे भली-भाँति जानो — अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (जीवात्मा), पृथक्-पृथक् इन्द्रियाँ (करण), अनेक प्रकार की चेष्टाएँ (प्राणों की क्रियाएँ), और पाँचवाँ कारण दैव (पूर्वकृत संस्कारों का प्रभाव व ईश्वरीय विधान) है। मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो कोई भी शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत कर्म आरम्भ करता है, उसके ये ही पाँच कारण होते हैं।
॥ ८ ॥
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
अर्थ : ऐसी स्थिति में जो अज्ञानी पुरुष अशुद्ध बुद्धि होने के कारण केवल विशुद्ध आत्मा को ही कर्ता समझता है, वह दुर्मति यथार्थ नहीं देखता। जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा अहंकृत भाव नहीं है, तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों और कर्मों में लिप्त नहीं होती — वह इन सब लोकों को मार कर भी वास्तव में न तो किसी को मारता है और न पाप से बँधता है।
॥ ९ ॥
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥
गुणसंख्याने गुणभेदतः प्रोच्यते शृणु।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः॥
अर्थ : ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय — यह तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा है; तथा कर्ता, करण और कर्म — यह तीन प्रकार का कर्म-संग्रह है। गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं, उनको भी तुम मुझसे सुनो।
॥ १० ॥
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
यत्तत्कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥
अर्थ : जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक्-पृथक् विभक्त सम्पूर्ण प्राणियों में एक अविनाशी अखण्ड परमात्मभाव को देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्त्विक जानो। और जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक भावों को अलग-अलग देखता है, उस ज्ञान को तुम राजसिक जानो। तथा जो ज्ञान किसी एक ही कार्य (देह, मूर्ति आदि) में सम्पूर्ण के समान आसक्त रहता है, जो युक्तिरहित, तत्त्वज्ञान से हीन और तुच्छ है — वह तामसिक ज्ञान कहा गया है।
॥ ११ ॥
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
अर्थ : जो कर्म शास्त्रविधि से नियत, आसक्तिरहित और बिना राग-द्वेष के फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक कहा जाता है। किन्तु जो कर्म फल की इच्छा रखने वाले अथवा अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा बहुत परिश्रम के साथ किया जाता है, वह राजसिक कहा गया है। और जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश आरम्भ किया जाता है, वह तामसिक कहा जाता है।
॥ १२ ॥
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
अर्थ : जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचनों से रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य की सिद्धि और असिद्धि में निर्विकार रहता है — वह 'सात्त्विक कर्ता' कहा जाता है। जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मफल का आकांक्षी, लोभी, दूसरों को कष्ट देने वाला, अपवित्र और हर्ष-शोक में लीन रहने वाला है — वह 'राजसिक कर्ता' कहा गया है। और जो कर्ता चंचल, असभ्य, घमण्डी, धूर्त, दूसरों का अनिष्ट करने वाला, आलसी, विषादग्रस्त और दीर्घसूत्री (काम को टालने वाला) है — वह 'तामसिक कर्ता' कहा जाता है।
॥ १३ ॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥
अर्थ : हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को, तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ जानती है — वह 'सात्त्विकी बुद्धि' है। हे पार्थ! जिसके द्वारा धर्म और अधर्म का तथा कर्तव्य और अकर्तव्य का यथार्थ निर्णय नहीं हो पाता — वह 'राजसी बुद्धि' है। और हे पार्थ! जो तमोगुण से ढकी हुई बुद्धि अधर्म को ही 'धर्म' मान लेती है तथा सब वस्तुओं को सर्वथा विपरीत देखती है — वह 'तामसी बुद्धि' है।
॥ १४ ॥
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
अर्थ : हे पार्थ! अव्यभिचारिणी योग-साधना द्वारा जिस धारण-शक्ति (धृति) से मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखता है — वह 'सात्त्विकी धृति' है। परन्तु हे अर्जुन! जिस धृति द्वारा मनुष्य फल की इच्छा से धर्म, अर्थ और काम को आसक्तिपूर्वक धारण करता है — वह 'राजसी धृति' है। और हे पार्थ! दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धृति द्वारा निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता — वह 'तामसी धृति' है।
॥ १५ ॥
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
अर्थ : हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी मुझसे सुनो। जिस सुख में मनुष्य अभ्यास से रमण करता है और दुःखों के अन्त को प्राप्त हो जाता है; जो आरम्भ में विष के समान प्रतीत होता है किन्तु परिणाम में अमृत के समान आनन्ददायक है — वह आत्मविषयक बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होने वाला सुख 'सात्त्विक' कहा गया है। जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से आरम्भ में तो अमृत के समान भासता है किन्तु परिणाम में विष के समान दुःखदायी सिद्ध होता है — वह सुख 'राजसिक' कहा गया है। और जो सुख आरम्भ में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, जो निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है — वह सुख 'तामसिक' कहा गया है।
॥ १६ ॥
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
अर्थ : पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग में देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से मुक्त हो। हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभक्त किए गए हैं।
॥ १७ ॥
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
अर्थ : अन्तःकरण का निग्रह (शम), इन्द्रियों का दमन (दम), स्वधर्म-पालन रूप तप, बाह्य व आन्तरिक पवित्रता (शौच), क्षमाभाव, सरलता, शास्त्रज्ञान, परमात्मा का अनुभव और आस्तिकता — ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता, युद्ध में पीठ न दिखाना, दान देना और स्वामीभाव (प्रजा-रक्षण की सामर्थ्य) — ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। खेती, गोपालन और व्यापार — ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं; तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।
॥ १८ ॥
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
अर्थ : अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है; अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि पाता है, उस रहस्य को सुनो — जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।
॥ १९ ॥
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
अर्थ : अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना स्वाभाविक धर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता। हे कुन्तीपुत्र! सहज (स्वाभाविक) कर्म दोषयुक्त होने पर भी नहीं त्यागना चाहिए; क्योंकि जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है, वैसे ही सम्पूर्ण कर्म किसी न किसी दोष से आवृत हैं।
॥ २० ॥
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥
अर्थ : सर्वत्र अनासक्त बुद्धि वाला, मन को जीते हुए तथा सर्वथा स्पृहारहित पुरुष संन्यास (कर्मफल-त्याग) द्वारा उस परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त होता है। उस परम सिद्धि को प्राप्त होकर पुरुष जिस प्रकार उस ब्रह्म को प्राप्त होता है — जो कि ज्ञान की पराकाष्ठा है, उस स्थिति को हे कुन्तीपुत्र! संक्षेप में मुझसे सुनो।
॥ २१ ॥
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
अर्थ : विशुद्ध बुद्धि से युक्त, सात्त्विक धृति द्वारा मन को वश में करके, शब्दादि विषयों का त्याग करके, राग और द्वेष को समूल नष्ट करके; एकान्त और पवित्र स्थान का सेवन करने वाला, अल्पाहारी, मन-वाणी-शरीर को वश में रखने वाला, निरन्तर ध्यानयोग में तत्पर रहने वाला, दृढ़ वैराग्य का आश्रय लिए हुए; अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और संग्रह का सर्वथा त्याग करके, ममतारहित और परम शान्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में लीन होने का पात्र बन जाता है।
॥ २२ ॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
अर्थ : ब्रह्मभाव को प्राप्त, प्रसन्नचित्त पुरुष न किसी के लिए शोक करता है और न किसी वस्तु की आकांक्षा करता है; सम्पूर्ण प्राणियों में समभाव रखता हुआ वह मेरी परम पराभक्ति को प्राप्त होता है। उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को ठीक-ठीक जान लेता है कि मैं प्रभाव और स्वरूप से जो और जितना हूँ; और इस प्रकार मुझे तत्त्व से जानकर वह तत्काल मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है।
॥ २३ ॥
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
अर्थ : सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी जो मेरे आश्रित है, वह मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त होता है। इसलिए सब कर्मों को मन से मुझे अर्पण करके, मेरे परायण होकर, समत्व-बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरन्तर मेरे में ही चित्त वाला हो। मुझमें चित्त लगाने से तुम मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश मेरी बात न सुनोगे, तो तुम्हारा सर्वथा पतन हो जाएगा।
॥ २४ ॥
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
अर्थ : यदि अहंकार का आश्रय लेकर तुम यह मानते हो कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा', तो तुम्हारा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तुम्हारी क्षत्रिय प्रकृति तुम्हें युद्ध में प्रवृत्त कर ही देगी। हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तुम मोहवश नहीं करना चाहते, अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधे हुए विवश होकर भी तुम्हें वही करना पड़ेगा।
॥ २५ ॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
अर्थ : हे अर्जुन! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय-देश में स्थित है, और अपनी माया से समस्त जीवों को यन्त्र पर चढ़े हुए पुतलों की भाँति भरमा रहा है। हे भारत! तुम सब प्रकार से केवल उस सर्वसमर्थ परमेश्वर की ही शरण में जाओ; उसकी कृपा से ही तुम परम शान्ति को तथा शाश्वत परम धाम को प्राप्त होओगे।
॥ २६ ॥
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥
अर्थ : इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कहा; अब तुम इस पर पूर्ण रूप से भली-भाँति विचार करके, जैसा उचित समझो वैसा ही करो।
॥ २७ ॥
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
अर्थ : सम्पूर्ण गोपनीयों में अति परम गोपनीय मेरे परम वचन को तुम फिर सुनो; तुम मेरे अत्यन्त प्रिय सखा हो, इसलिए यह परम हितकारी वचन मैं तुमसे कहता हूँ। तुम केवल मुझमें मन वाले होओ, मेरे अनन्य भक्त बनो, मेरा ही पूजन करो और मुझे ही नमस्कार करो; ऐसा करने से तुम मुझे ही प्राप्त होओगे — यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे परम प्रिय हो।
॥ २८ ॥
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थ : सम्पूर्ण धर्मों (विधियों, आश्रयों और कर्तव्याकर्तव्यों) का परित्याग करके तुम केवल मुझ एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर की शरण में आ जाओ; मैं तुम्हें समस्त पापों और बन्धनों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो!
॥ २९ ॥
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविष्यति च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
अर्थ : यह गीतारूपी परम गुह्य उपदेश तुम्हें कभी भी तपरहित पुरुष से, भक्तिहीन से, न सुनने की इच्छा वाले से और मुझमें दोष दृष्टि रखने वाले से कभी नहीं कहना चाहिए। जो पुरुष मुझमें परम पराभक्ति करके इस परम गोपनीय संवाद को मेरे भक्तों में कहेगा (प्रचार करेगा), वह निःसंशय मुझको ही प्राप्त होगा। मनुष्यों में उसके समान मेरा अति प्रिय कार्य करने वाला न तो कोई है और न इस पृथ्वी पर उससे अधिक कोई दूसरा मुझे कभी प्रिय होगा।
॥ ३० ॥
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥
अर्थ : जो मनुष्य हम दोनों के इस धर्ममय पवित्र संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और ईर्ष्यारहित होकर केवल इस गीता का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के पवित्र लोकों को प्राप्त होगा। हे पार्थ! क्या तुमने इस गीता-ज्ञान को एकाग्रचित्त होकर सुना? और हे धनञ्जय! क्या तुम्हारा अज्ञानजनित मोह सर्वथा नष्ट हो गया?
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ ३१ ॥
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा अज्ञानरूपी मोह नष्ट हो गया और मुझे अपने यथार्थ स्वरूप की स्मृति प्राप्त हो गई है। अब मैं सर्वथा संशयरहित होकर स्थित हूँ; और आपकी आज्ञा का पालन करूँगा (युद्ध करूँगा)!
॥ सञ्जय उवाच ॥
॥ ३२ ॥
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥
राजन्संसमृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥
अर्थ : सञ्जय बोले — इस प्रकार मैंने भगवान् वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस परम अद्भुत और रोमाञ्चकारी संवाद को सुना। महर्षि वेदव्यास की कृपा से (दिव्य दृष्टि द्वारा) मैंने स्वयं योगेश्वर साक्षात् श्रीकृष्ण के मुख से कहे जाते हुए इस परम गोपनीय योगशास्त्र को प्रत्यक्ष सुना। हे राजन् धृतराष्ट्र! भगवान् केशव और अर्जुन के इस परम पवित्र और अद्भुत संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं प्रतिक्षण आनन्दित हो रहा हूँ। और हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यन्त विस्मयकारी विश्वरूप को बार-बार स्मरण करके मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है और मैं बारम्बार हर्षित हो रहा हूँ।
॥ ३३ ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
अर्थ : जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं पर श्री (लक्ष्मी), विजय, विभूति (अलौकिक ऐश्वर्य) और अचल नीति है — ऐसा मेरा दृढ़ निश्चय है!
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः॥ १८ ॥