॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २

वेदव्यास

🎵 गीता

यह अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता का हृदय माना जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता (सांख्य-दर्शन), स्वधर्म-पालन तथा आसक्ति-रहित निष्काम कर्मयोग का सार्वकालिक उपदेश दिया है और स्थितप्रज्ञ मुनि के दिव्य लक्षण निरूपित किए हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय २

यह अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता का हृदय माना जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अमरता (सांख्य-दर्शन), स्वधर्म-पालन तथा आसक्ति-रहित निष्काम कर्मयोग का सार्वकालिक उपदेश दिया है और स्थितप्रज्ञ मुनि के दिव्य लक्षण निरूपित किए हैं।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः — सांख्ययोगः
अर्जुन की कातरता और शरणागति, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आत्मा की नित्यता व अमरता का प्रतिपादन, स्वधर्म-पालन का निर्देश, निष्काम कर्मयोग का रहस्य तथा स्थितप्रज्ञ पुरुष के दिव्य लक्षण।
॥ सञ्जय उवाच ॥
॥ १ ॥
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥
अर्थ : सञ्जय बोले — उस प्रकार करुणा से व्याप्त, आँसुओं से भरे हुए व्याकुल नेत्रों वाले तथा शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहे।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ २ ॥
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे अर्जुन! इस विषम अवसर पर तुम्हें यह कायरता (मोह) कहाँ से प्राप्त हुई? यह न तो श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाली है और न कीर्ति करने वाली ही है।
॥ ३ ॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
अर्थ : हे पार्थ! नपुंसकता (कायरता) को मत प्राप्त होओ; तुम्हारे में यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परन्तप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ ४ ॥
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में पितामह भीष्म और द्रोणाचार्य के विरुद्ध बाणों से कैसे युद्ध करूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही परम पूजनीय हैं।
॥ ५ ॥
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
अर्थ : कायरतारूपी दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित रूप से परम कल्याणकारी हो, वही मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ; आपके शरणागत हुए मुझे शिक्षा दीजिए।
॥ सञ्जय उवाच ॥
॥ ६ ॥
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥
अर्थ : सञ्जय बोले — हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! दोनों सेनाओं के मध्य शोक करते हुए उस अर्जुन के प्रति हृषीकेश श्रीकृष्ण ने हँसते हुए से यह वचन कहे।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ ७ ॥
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे अर्जुन! तुम न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करते हो और पण्डितों के से वचन कहते हो; परन्तु पण्डित (ज्ञानी) जन जिनके प्राण चले गए हैं उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी शोक नहीं करते।
॥ ८ ॥
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥
अर्थ : न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, अथवा तुम नहीं थे, अथवा ये राजा लोग नहीं थे; और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।
॥ ९ ॥
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥
अर्थ : जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है; उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।
॥ १० ॥
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
अर्थ : हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और विषयों के संयोग तो शीत-उष्ण और सुख-दुःख को देने वाले, उत्पत्ति-विनाशशील तथा अनित्य हैं; इसलिए हे भरत! तुम उनको सहन करो।
॥ ११ ॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥
अर्थ : हे पुरुषश्रेष्ठ! सुख-दुःख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय-विषय व्यथित नहीं करते, वह मोक्ष (अमृतत्व) के योग्य होता है।
॥ १२ ॥
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥
अर्थ : असत् (विनाशशील शरीर) की तो सत्ता नहीं है और सत् (अविनाशी आत्मा) का कभी अभाव नहीं होता। तत्त्वज्ञानी महापुरुषों द्वारा इन दोनों का ही तत्त्व देखा गया है।
॥ १३ ॥
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥
अर्थ : जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उसे तुम अविनाशी जानो। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।
॥ १४ ॥
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥
अर्थ : इस नित्य, अविनाशी और अप्रमेय (अज्ञेय) आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गए हैं; इसलिए हे भारत! तुम युद्ध करो।
॥ १५ ॥
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
अर्थ : जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह न किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।
॥ १६ ॥
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थ : यह आत्मा किसी काल में न तो जन्म लेता है और न मरता ही है; तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है। यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
॥ १७ ॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
अर्थ : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को छोड़कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।
॥ १८ ॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
अर्थ : इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, इसको अग्नि जला नहीं सकती, इसको जल गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।
॥ १९ ॥
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
अर्थ : क्योंकि उत्पन्न हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है; इसलिए इस बिना उपाय वाले विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
॥ २० ॥
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
अर्थ : यदि तुम युद्ध में मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे और जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे; इसलिए हे कुन्तीपुत्र! तुम युद्ध का निश्चय करके खड़े हो जाओ।
॥ २१ ॥
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
अर्थ : सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होगे।
॥ २२ ॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ : तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में ही है, फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और न ही तुम्हारी अकर्मण्यता (कर्म न करने) में आसक्ति हो।
॥ २३ ॥
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
अर्थ : हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुआ कर्म करो; यह समत्व-भाव ही 'योग' कहलाता है।
॥ २४ ॥
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥
अर्थ : हे धनञ्जय! इस समत्व-बुद्धियोग की अपेक्षा सकाम कर्म अत्यन्त ही निकृष्ट है। इसलिए तुम समबुद्धि की शरण ग्रहण करो; फल के हेतु बनने वाले लोग कृपण (अति दीन) हैं।
॥ २५ ॥
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
अर्थ : समबुद्धि से युक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को यहीं त्याग देता है; इसलिए तुम योग में लग जाओ। कर्मों में कुशलता (अनासक्ति) ही योग है।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ २६ ॥
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे केशव! समाधि में स्थित स्थिरबुद्धि (स्थितप्रज्ञ) पुरुष का क्या लक्षण है? स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ २७ ॥
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे पार्थ! जब मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भली-भाँति त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, तब वह 'स्थितप्रज्ञ' कहलाता है।
॥ २८ ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
अर्थ : दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निष्पृह है, तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं — ऐसा मुनि 'स्थिरबुद्धि' कहा जाता है।
॥ २९ ॥
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
अर्थ : विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है; आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
॥ ३० ॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
अर्थ : क्रोध से मूढ़भाव (संमोह) उत्पन्न होता है, संमोह से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि (विवेक) का नाश हो जाता है, और बुद्धि का नाश होने से मनुष्य अपनी स्थिति से गिर जाता है (नष्ट हो जाता है)।
॥ ३१ ॥
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयान्निन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
अर्थ : परन्तु अपने वश में किए हुए मन वाला स्वाधीन साधक राग और द्वेष से रहित अपनी वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरता हुआ भी अन्तःकरण की प्रसन्नता (निर्मलता) को प्राप्त होता है।
॥ ३२ ॥
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥
अर्थ : हे पार्थ! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति (ब्राह्मी स्थिति) है; इसको प्राप्त होकर मनुष्य कभी मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस स्थिति में स्थित होकर वह ब्रह्मानन्द (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥