॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ३

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ३

वेदव्यास

🎵 गीता

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग की गहन व्याख्या की है। उन्होंने बताया कि प्रकृति के चक्र में लोकसंग्रह और यज्ञ-भावना से किए गए कर्म ही मोक्षप्रद हैं, तथा कामना और क्रोध ही मनुष्य के प्रधान आत्म-शत्रु हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ३

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग की गहन व्याख्या की है। उन्होंने बताया कि प्रकृति के चक्र में लोकसंग्रह और यज्ञ-भावना से किए गए कर्म ही मोक्षप्रद हैं, तथा कामना और क्रोध ही मनुष्य के प्रधान आत्म-शत्रु हैं।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः — कर्मयोगः
ज्ञान और कर्म की श्रेष्ठता के विषय में अर्जुन का प्रश्न, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा निष्काम कर्मयोग का विवेचन, सृष्टि-चक्र की रक्षा हेतु कर्म की अनिवार्यता, श्रेष्ठ पुरुषों का लोकसंग्रह, तथा कामरूपी महाशत्रु के संहार की विधि।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ १ ॥
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे जनार्दन! यदि कर्म की अपेक्षा ज्ञान आपके मत में श्रेष्ठ है, तो फिर हे केशव! मुझे इस घोर (हिंसात्मक) कर्म में क्यों लगाते हैं?
॥ २ ॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥
अर्थ : आप अपने मिले हुए से वचनों द्वारा मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं; इसलिए उस एक निश्चित मार्ग को कहिए, जिससे मैं परम कल्याण को प्राप्त कर सकूँ।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ ३ ॥
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे निष्पाप अर्जुन! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा (साधन-मार्ग) मेरे द्वारा पहले कही गई है — ज्ञानियों के लिए 'ज्ञानयोग' (सांख्य) और योगियों के लिए 'कर्मयोग'।
॥ ४ ॥
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥
अर्थ : मनुष्य न तो कर्मों का आरम्भ किए बिना निष्कर्मता (कर्मयोग की सिद्धि) को प्राप्त होता है, और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से संन्यास-सिद्धि को प्राप्त होता है।
॥ ५ ॥
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
अर्थ : कोई भी मनुष्य किसी काल में एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों द्वारा सब प्राणी विवश होकर कर्म में लगाए जाते हैं।
॥ ६ ॥
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥
अर्थ : जो मूढ़बुद्धि मनुष्य कर्मेन्द्रियों को हठपूर्वक रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का स्मरण करता रहता है, वह मिथ्याचारी (ढोंगी) कहलाता है।
॥ ७ ॥
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥
अर्थ : किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके आसक्तिरहित होकर कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।
॥ ८ ॥
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्ये कर्मणः॥
अर्थ : तुम शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म करो; क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। तथा कर्म न करने से तुम्हारा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
॥ ९ ॥
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥
अर्थ : यज्ञ (ईश्वरार्पण भाव) के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्मों में लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे कुन्तीपुत्र! तुम आसक्तिरहित होकर उस यज्ञ के लिए ही भली-भाँति कर्म करो।
॥ १० ॥
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
अर्थ : यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूट जाते हैं; परन्तु जो पापी लोग केवल अपने ही शरीर-पोषण के लिए पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।
॥ ११ ॥
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
अर्थ : अन्न से सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है, और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होता है।
॥ १२ ॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥
अर्थ : हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से चलाए हुए सृष्टि-चक्र के अनुकूल नहीं चलता (कर्तव्य पालन नहीं करता), वह इन्द्रियों के सुखों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।
॥ १३ ॥
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥
अर्थ : इसलिए तुम निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्म का भली-भाँति आचरण करो; क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परम पद (परमात्मा) को प्राप्त हो जाता है।
॥ १४ ॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥
अर्थ : राजा जनक आदि ज्ञानी जन भी कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे; इसलिए लोकसंग्रह (संसार को सन्मार्ग पर चलाना) को देखते हुए भी तुम कर्म करने के ही योग्य हो।
॥ १५ ॥
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
अर्थ : श्रेष्ठ पुरुष जैसा-जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण बना देता है, समस्त संसार उसी के अनुसार चलने लगता है।
॥ १६ ॥
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
अर्थ : सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं; तो भी अहंकार से मोहित चित्त वाला मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' — ऐसा मानता है।
॥ १७ ॥
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥
अर्थ : इसलिए अध्यात्म-बुद्धि द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके, आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर तुम युद्ध करो।
॥ १८ ॥
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
अर्थ : अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म की अपेक्षा गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है, और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ १९ ॥
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे वार्ष्णेय! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर बलपूर्वक लगाए हुए की भाँति पाप का आचरण करता है?
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ २० ॥
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है; यह बहुत खाने वाला (कभी तृप्त न होने वाला) और महापापी है। इस संसार में तुम इसको ही वैरी जानो।
॥ २१ ॥
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥
अर्थ : जैसे धुएँ से अग्नि, मैल से दर्पण और जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस काम के द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है।
॥ २२ ॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥
अर्थ : इन्द्रियों को शरीर से श्रेष्ठ कहते हैं, इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी अत्यन्त श्रेष्ठ (परे) है, वह आत्मा है।
॥ २३ ॥
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥
अर्थ : इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके, हे महाबाहो! तुम इस कामरूपी दुर्जय शत्रु को मार डालो।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥