॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ६

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ६

वेदव्यास

🎵 गीता

इस अध्याय में मन के निग्रह, अष्टाङ्ग योग की साधना, ध्यान-विधि तथा समत्व बुद्धि का गहन विवेचन है। श्रीकृष्ण मन को अभ्यास और वैराग्य से वश में करने का मार्ग बताते हुए योगी को तपस्वी और ज्ञानी से भी श्रेष्ठ घोषित करते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ६

इस अध्याय में मन के निग्रह, अष्टाङ्ग योग की साधना, ध्यान-विधि तथा समत्व बुद्धि का गहन विवेचन है। श्रीकृष्ण मन को अभ्यास और वैराग्य से वश में करने का मार्ग बताते हुए योगी को तपस्वी और ज्ञानी से भी श्रेष्ठ घोषित करते हैं।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ षष्ठोऽध्यायः — आत्मसंयमयोगः
कर्मयोगी और संन्यासी की एकता, आत्मोद्धार की प्रेरणा, मन को मित्र और शत्रु बनाने का रहस्य, ध्यानयोग के लिए आसन व आहार-विहार के नियम, चञ्चल मन के निग्रह की युक्ति (अभ्यास व वैराग्य), तथा योगभ्रष्ट साधक की सद्गति।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १ ॥
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है; केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है और न केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला ही योगी है।
॥ २ ॥
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥
अर्थ : योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील साधक के लिए निष्काम कर्म करना ही कारण (साधन) कहा जाता है; और योगारूढ़ हो जाने पर उस पुरुष के लिए सर्वसंकल्पों का उपशम (शान्ति) ही कारण कहा जाता है।
॥ ३ ॥
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थ : मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न होने दे; क्योंकि यह जीवात्मा स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।
॥ ४ ॥
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
अर्थ : जिस पुरुष द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीत लिया गया है, उसका जीवात्मा स्वयं ही उसका मित्र है; किन्तु जिसके द्वारा मन-इन्द्रियों को नहीं जीता गया है, उसका अपना आपा ही शत्रु की भाँति शत्रुता में बर्तता है।
॥ ५ ॥
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
अर्थ : पवित्र स्थान में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हों, जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा — ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापित करके;
॥ ६ ॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥
अर्थ : उस आसन पर बैठकर, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योगाभ्यास करे।
॥ ७ ॥
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥
अर्थ : काया, सिर और गले को समान एवं सीधा अचल धारण करके, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ;
॥ ८ ॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥
अर्थ : भली-भाँति शान्त अन्तःकरण वाला, भयरहित, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित, मन को रोककर, मुझमें ही चित्त वाला और मुझे ही परम प्राप्य मानकर एकाग्र होकर बैठे।
॥ ९ ॥
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
अर्थ : हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का, न बहुत अधिक सोने वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
॥ १० ॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
अर्थ : यथायोग्य आहार और विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का तथा यथायोग्य सोने और जागने वाले पुरुष का ही योग सब दुःखों का नाश करने वाला होता है।
॥ ११ ॥
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
अर्थ : वायु-रहित स्थान में स्थित दीपक जैसे चलायमान नहीं होता, परमात्मा के ध्यान में लगे हुए वशीभूत चित्त वाले योगी के चित्त की वही उपमा कही गई है।
॥ १२ ॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
अर्थ : यह चञ्चल और अस्थिर मन जिन-जिन विषयों के निमित्त से बाहर भटकता है, उन-उन विषयों से इसको रोककर बारम्बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ १३ ॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे कृष्ण! यह मन बड़ा चञ्चल, प्रमथनशील (इन्द्रियों को मथ डालने वाला), बलवान् और अत्यन्त दृढ़ है; इसलिए इसका वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १४ ॥
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! इसमें कोई सन्देह नहीं कि मन बड़ा चञ्चल और कठिनता से वश में होने वाला है; किन्तु हे कुन्तीपुत्र! यह निरन्तर 'अभ्यास' और 'वैराग्य' द्वारा वश में हो जाता है।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ १५ ॥
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे कृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है — ऐसा साधक योग की सिद्धि (परमात्मा) को न पाकर किस गति को प्राप्त होता है?
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १६ ॥
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही; क्योंकि हे प्यारे! शुभ कर्म (भगवत्प्राप्ति का साधन) करने वाला कोई भी मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
॥ १७ ॥
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
अर्थ : योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर, वहाँ बहुत वर्षों तक रहकर, फिर यहाँ पवित्र आचरण वाले श्रीमानों (धनी एवं पुण्यात्मा पुरुषों) के घर में जन्म लेता है।
॥ १८ ॥
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥
अर्थ : हे कुरुनन्दन! वहाँ उस पहले शरीर में संचित किए हुए बुद्धि-संस्कारों को वह अनायास ही प्राप्त कर लेता है, और उसके प्रभाव से वह पुनः भगवत्प्राप्ति की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है।
॥ १९ ॥
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
अर्थ : सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान् भक्त मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझे निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥