॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ७

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ७

वेदव्यास

🎵 गीता

यहाँ से गीता के भक्ति-प्रधान मध्य-षटक का आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण अपनी परा और अपरा प्रकृति, दैवी त्रिगुणमयी माया के प्रभाव तथा चार प्रकार के भक्तों (आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी) का निरूपण करते हुए ज्ञानी भक्त को अपनी आत्मा बताते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ७

यहाँ से गीता के भक्ति-प्रधान मध्य-षटक का आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण अपनी परा और अपरा प्रकृति, दैवी त्रिगुणमयी माया के प्रभाव तथा चार प्रकार के भक्तों (आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी) का निरूपण करते हुए ज्ञानी भक्त को अपनी आत्मा बताते हैं।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः — ज्ञानविज्ञानयोगः
भगवान श्रीकृष्ण का समग्र रूप, अष्टधा अपरा प्रकृति और चेतन परा प्रकृति, संसार में परमात्मा की सूत्र में मणियों जैसी व्यापकता, त्रिगुणमयी दैवी माया, चार प्रकार के भक्त तथा अनन्य ज्ञानी भक्त की महिमा।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १ ॥
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — हे पार्थ! मुझमें अनन्य प्रेमपूर्वक आसक्त मन वाला और मेरे ही आश्रय होकर योग में लगा हुआ तुम मुझको समग्र (सम्पूर्ण विभूति, बल और ऐश्वर्य सहित) संशयरहित जैसे जानोगे, वह सुनो।
॥ २ ॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
अर्थ : मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को पूरी तरह कहूँगा, जिसको जानकर इस संसार में फिर और कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता।
॥ ३ ॥
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥
अर्थ : हजारों मनुष्यों में कोई एक मनुष्य मेरी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है; और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक ही मुझे तत्त्व से जान पाता है।
॥ ४ ॥
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
अर्थ : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — इस प्रकार यह आठ भेदों वाली मेरी अपरा (जड़) प्रकृति है।
॥ ५ ॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥
अर्थ : हे महाबाहो! यह आठ प्रकार की तो मेरी अपरा प्रकृति है; इससे भिन्न मेरी जीवरूपा परा (चेतन) प्रकृति को जानो, जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् धारण किया जाता है।
॥ ६ ॥
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
अर्थ : हे धनञ्जय! मुझसे परे अन्य कुछ भी (परम तत्त्व) नहीं है। जैसे सूत के धागे में मणियाँ पिरोई होती हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मुझमें ही ओत-प्रोत है।
॥ ७ ॥
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥
अर्थ : हे कुन्तीपुत्र! मैं जलों में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रभा (प्रकाश) हूँ, सम्पूर्ण वेदों में प्रणव (ॐकार) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और मनुष्यों में पौरुष (सामर्थ्य) हूँ।
॥ ८ ॥
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥
अर्थ : मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ, अग्नि में तेज हूँ, सब प्राणियों में उनका जीवन (आयु/चेतना) हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।
॥ ९ ॥
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥
अर्थ : क्योंकि यह अलौकिक अर्थात् त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; परन्तु जो पुरुष केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को सुगमता से पार कर जाते हैं।
॥ १० ॥
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥
अर्थ : माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे असुर-स्वभाव को धारण किए हुए, पापकर्म करने वाले, मनुष्यों में अधम मूढ़ लोग मुझे नहीं भजते।
॥ ११ ॥
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
अर्थ : हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले चार प्रकार के पुण्यात्मा भक्त मुझे भजते हैं — आर्त (संकटग्रस्त), जिज्ञासु (ईश्वर को जानने की इच्छा वाला), अर्थार्थी (सांसारिक सुख चाहने वाला) और ज्ञानी।
॥ १२ ॥
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥
अर्थ : उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है; क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है।
॥ १३ ॥
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥
अर्थ : ये सभी भक्त उदार (श्रेष्ठ) हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा साक्षात् स्वरूप ही है — ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मुझमें ही मन-बुद्धि वाला ज्ञानी मुझ सर्वोत्तम गतिरूप को ही अपना अन्तिम लक्ष्य मानकर स्थित है।
॥ १४ ॥
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
अर्थ : बहुत जन्मों के अन्त में तत्त्वज्ञान को प्राप्त हुआ पुरुष 'सब कुछ वासुदेव ही हैं' — ऐसा जानकर मेरी शरण होता है; ऐसा महात्मा परम दुर्लभ है।
॥ १५ ॥
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥
अर्थ : जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर कर देता हूँ।
॥ १६ ॥
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥
अर्थ : हे अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हो चुके, वर्तमान में स्थित तथा भविष्य में होने वाले सब प्राणियों को मैं जानता हूँ; किन्तु मुझे कोई भी भक्तिहीन मनुष्य नहीं जानता।
॥ १७ ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥
अर्थ : परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्म करने वाले जिन मनुष्यों के पाप नष्ट हो चुके हैं, वे राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों के मोह से मुक्त होकर दृढ़निश्चयी होकर मुझे भजते हैं।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥