॥ श्रीहरिः ॥
श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ८

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ८

वेदव्यास

🎵 गीता

इस अध्याय में ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के रहस्यों के साथ अन्तकाल में ॐकार एवं प्रभु के स्मरण से परम गति प्राप्त करने की योग-साधना तथा शुक्ल व कृष्ण गति का निरूपण किया गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ८

इस अध्याय में ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के रहस्यों के साथ अन्तकाल में ॐकार एवं प्रभु के स्मरण से परम गति प्राप्त करने की योग-साधना तथा शुक्ल व कृष्ण गति का निरूपण किया गया है।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ अष्टमोऽध्यायः — अक्षरब्रह्मयोगः
ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ का स्वरूप; अन्तकाल में परमात्मा के स्मरण का अमोघ फल; एकाक्षर ॐकार द्वारा प्राण-प्रयाण की योगविधि; तथा शुक्ल और कृष्ण गति का रहस्य।
॥ अर्जुन उवाच ॥
॥ १ ॥
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥
अर्थ : अर्जुन बोले — हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है? और अधिदैव किसको कहते हैं? तथा हे मधुसूदन! यहाँ इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और वह कैसे है? एवं युक्तचित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्तकाल में आप किस प्रकार जानने में आते हैं?
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ २ ॥
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥
अर्थ : श्रीभगवान् बोले — परम अविनाशी तत्त्व 'ब्रह्म' है; अपना शुद्ध स्वरूप (जीवात्मा) 'अध्यात्म' कहलाता है; तथा भूतों की उत्पत्ति और वृद्धि करने वाला त्याग 'कर्म' नाम से कहा गया है।
॥ ३ ॥
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥
अर्थ : जो पुरुष अन्तकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है — इसमें कोई संशय नहीं है।
॥ ४ ॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
अर्थ : हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह उस-उस को ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है।
॥ ५ ॥
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
अर्थ : इसलिए तुम सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तुम निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होओगे।
॥ ६ ॥
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्त्यन्॥
अर्थ : हे पार्थ! अभ्यासयोग से युक्त और अन्य किसी ओर न जाने वाले एकाग्र चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ साधक परम दिव्य पुरुष (परमात्मा) को ही प्राप्त होता है।
॥ ७ ॥
कविं पुराणमनुशासितार-
मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-
मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥
अर्थ : जो पुरुष सर्वज्ञ, पुरातन (अनादि), सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके पोषक, अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के समान प्रकाशमान और अज्ञानमय अंधकार से सर्वथा परे उस परमेश्वर का स्मरण करता है;
॥ ८ ॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
अर्थ : वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकाल में भी अचल मन से तथा योगबल के द्वारा दोनों भौंहों के मध्य में प्राण को भली-भाँति स्थापित करके, उस दिव्य परम पुरुष को ही प्राप्त होता है।
॥ ९ ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
अर्थ : सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय-देश में स्थिर करके, अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योगधारणा में स्थित हुआ — जो पुरुष 'ॐ' इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर त्यागकर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
॥ १० ॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥
अर्थ : हे पार्थ! जो अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस नित्य-युक्त योगी के लिए मैं सुलभ (सुगमता से प्राप्त होने योग्य) हूँ।
॥ ११ ॥
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥
अर्थ : परम सिद्धि को प्राप्त हुए वे महात्मा मुझे पाकर दुःखों के घर तथा क्षणभंगुर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते।
॥ १२ ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥
अर्थ : हे अर्जुन! ब्रह्मलोक से लेकर सम्पूर्ण लोक पुनरावर्ती (बारम्बार जन्म-मरण वाले) हैं; किन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।
॥ १३ ॥
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥
अर्थ : उस अव्यक्त (प्रकृति) से परे दूसरा परम श्रेष्ठ सनातन अव्यक्त भाव (परमेश्वर) है; वह सम्पूर्ण चराचर प्राणियों के नष्ट होने पर भी कभी नष्ट नहीं होता।
॥ १४ ॥
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
अर्थ : जो 'अव्यक्त' और 'अक्षर' कहा गया है, उसी को परम गति कहते हैं; तथा जिसको प्राप्त होकर जीव वापस नहीं लौटते, वही मेरा परम धाम है।
॥ १५ ॥
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥
अर्थ : जगत् के ये शुक्ल (देवयान) और कृष्ण (पितृयान) दो मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें से एक (शुक्ल) मार्ग द्वारा जाने वाला वापस न आने वाली परम गति को प्राप्त होता है, और दूसरे द्वारा जाने वाला पुनः लौटता है।
॥ १६ ॥
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥
अर्थ : योगी पुरुष इस रहस्य को जानकर वेदों के अध्ययन में, यज्ञों में, तपों में और दानों में जो पुण्यफल कहा गया है, उन सबको लाँघ जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥