श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय ९
वेदव्यास
गीता का यह अध्याय परम गोपनीय प्रत्यक्षानुभव ज्ञान को प्रकट करता है। इसमें अनन्य शरणागति की महिमा, ईश्वर की सर्वव्यापकता तथा प्रेमपूर्वक अर्पण किए गए पत्र, पुष्प, फल और जल को प्रभु द्वारा स्वीकार करने का भावपूर्ण उपदेश है।
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ नवमोऽध्यायः — राजविद्याराजगुह्ययोगः
अथ नवमोऽध्यायः — राजविद्याराजगुह्ययोगः
सम्पूर्ण विद्याओं और रहस्यों का राजा — प्रत्यक्ष फल देने वाला परम पवित्र ज्ञान; जगत् की उत्पत्ति और प्रलय में भगवान की सर्वव्यापकता; निष्काम अनन्य भक्ति का अलौकिक फल तथा 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' की दिव्य प्रतिज्ञा।
॥ श्रीभगवानुवाच ॥
॥ १ ॥
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥
अर्थ :
श्रीभगवान् बोले — दोष-दृष्टिरहित तुम जैसे प्रिय भक्त के लिए मैं इस परम गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञान को पुनः कहूँगा, जिसको जानकर तुम संसाररूपी अशुभ (जन्म-मरण के बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।
॥ २ ॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥
अर्थ :
यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब रहस्यों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल देने वाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है।
॥ ३ ॥
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥
अर्थ :
मुझ निराकार परमात्मा द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् जल से बर्फ की भाँति व्याप्त है; सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं, किन्तु मैं (संसारी पुरुषों की भाँति) उनमें स्थित नहीं हूँ।
॥ ४ ॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥
अर्थ :
और वे सम्पूर्ण प्राणी भी वास्तव में मुझमें स्थित नहीं हैं; मेरे इस ईश्वरीय योग की महिमा को देखो! भूतों को उत्पन्न करने वाला और उनका पोषण करने वाला मेरा स्वरूप उन भूतों में स्थित नहीं है।
॥ ५ ॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥
अर्थ :
जैसे सब जगह विचरने वाली महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित रहती है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें ही स्थित हैं — ऐसा तुम जानो।
॥ ६ ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥
अर्थ :
हे कुन्तीपुत्र! मेरी अध्यक्षता में प्रकृति सम्पूर्ण चराचर जगत् को रचती है; और इसी कारण से यह संसार-चक्र घूमता रहता है।
॥ ७ ॥
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥
अर्थ :
परन्तु हे पार्थ! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे सम्पूर्ण भूतों का सनातन आदि-कारण और अविनाशी जानकर अनन्य मन से निरन्तर भजते हैं।
॥ ८ ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥
अर्थ :
वे दृढ़व्रती भक्त निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए, मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझे बारम्बार भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हुए सदा मुझमें युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं।
॥ ९ ॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च॥
अर्थ :
इस सम्पूर्ण जगत् का पिता, माता, धारण करने वाला (धाता) और पितामह मैं ही हूँ। जानने योग्य, पवित्र ओंकार (ॐ) तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।
॥ १० ॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
अर्थ :
परम गति, भरण-पोषण करने वाला, स्वामी, साक्षी, निवास-स्थान, शरण लेने योग्य, परम हितैषी (सुहृद्), उत्पत्ति-प्रलय, स्थिति का आधार, निधान (लय-स्थान) और अविनाशी बीज — सब कुछ मैं ही हूँ।
॥ ११ ॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
अर्थ :
जो अनन्य भक्तजन निष्काम भाव से निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य मुझमें युक्त पुरुषों के योग (अप्राप्त की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त की रक्षा) का वहन मैं स्वयं करता हूँ।
॥ १२ ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
अर्थ :
जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेमपूर्वक पत्ता, फूल, फल अथवा जल भी भेंट करता है, उस शुद्धचित्त निष्काम भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह उपहार मैं साक्षात् प्रकट होकर स्वीकार करता हूँ।
॥ १३ ॥
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
अर्थ :
हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो — वह सब मुझे ही अर्पण करो।
॥ १४ ॥
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
अर्थ :
मैं सब प्राणियों में समभाव से व्यापक हूँ; न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय। परन्तु जो पुरुष भक्तिपूर्वक मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।
॥ १५ ॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥
अर्थ :
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि उसने भली-भाँति उत्तम निश्चय कर लिया है।
॥ १६ ॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
अर्थ :
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और परम नित्य शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र! तुम डंके की चोट पर प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्त का कभी पतन (विनाश) नहीं होता।
॥ १७ ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
अर्थ :
मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको ही प्रणाम कर। इस प्रकार आत्मा को मुझमें लगाकर मेरे ही परायण होकर तुम मुझको ही प्राप्त होओगे।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥