चाणक्य नीति
आचार्य चाणक्य
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त) द्वारा रचित यह नीति-शास्त्र व्यावहारिक जीवन, राजनीति, अर्थनीति, धर्म और समाज-व्यवहार का कालजयी दर्पण है। इसके संक्षिप्त सूत्र मनुष्य को बुद्धिमान, सतर्क और सफल बनाने की व्यावहारिक शिक्षा देते हैं।
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ अथ चाणक्यनीतिदर्पणम् ॥
॥ अथ चाणक्यनीतिदर्पणम् ॥
प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम्।
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम्॥
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम्॥
अर्थ :
तीनों लोकों के स्वामी सर्वव्यापक भगवान श्रीविष्णु को शीश झुकाकर प्रणाम करते हुए, मैं अनेक प्रामाणिक धर्मशास्त्रों से संकलित इस परम उपयोगी 'राजनीति एवं व्यावहारिक नीति समुच्चय' का प्रतिपादन करता हूँ।
॥ प्रथमः अध्यायः — मङ्गलाचरण एवं व्यावहारिक ज्ञान ॥
॥ १ ॥
अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः।
धर्मोपदेशविख्यातं कार्याकार्यं शुभाशुभम्॥
अर्थ :
इस नीति-शास्त्र का विधिपूर्वक अध्ययन करके बुद्धिमान श्रेष्ठ पुरुष धर्मोपदेश के अनुसार यह भली-भाँति जान लेता है कि क्या करने योग्य (कर्तव्य) है और क्या नहीं करने योग्य (अकर्तव्य) है, तथा क्या कल्याणकारी है और क्या अकल्याणकारी।
॥ २ ॥
कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्कस्यचिद्रिपुः।
व्यवहारेण जायन्ते मित्राणि रिपवस्तथा॥
अर्थ :
संसार में न कोई जन्म से किसी का मित्र होता है और न कोई किसी का शत्रु। मनुष्य के अपने व्यवहार और आचरण से ही उसके मित्र और शत्रु बनते हैं।
॥ ३ ॥
वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारागणैरपि॥
अर्थ :
गुणवान एक ही पुत्र श्रेष्ठ होता है, मूर्ख सैकड़ों पुत्र किसी काम के नहीं होते। जैसे आकाश में अकेला चन्द्रमा सम्पूर्ण अन्धकार का नाश कर देता है, जबकि असंख्य तारों का समूह मिलकर भी वैसा प्रकाश नहीं कर पाता।
॥ ४ ॥
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥
अर्थ :
वे माता-पिता अपनी ही सन्तान के लिए शत्रु के समान हैं जिन्होंने अपने बालक को बाल्यावस्था में विद्या नहीं पढ़ाई। ऐसा विद्याहीन मनुष्य विद्वानों की सभा में उसी प्रकार लज्जित होता है जैसे हंसों के समूह के बीच बगुला।
॥ ५ ॥
लालनाद् बहवो दोषास्ताडनाद् बहवो गुणाः।
तस्मात्पुत्रं च शिष्यं च ताडयेन्न तु लालयेत्॥
अर्थ :
अत्यधिक लाड़-प्यार करने से सन्तान और शिष्य में अनेक दुर्गुण उत्पन्न होते हैं, और यथोचित अनुशासन व ताड़ना से सद्गुणों का विकास होता है। अतः माता-पिता और गुरु को चाहिए कि वे पुत्र और शिष्य को अनुशासित रखें, केवल अनुचित लाड़ न करें।
॥ द्वितीयः अध्यायः — विवेक, चरित्र एवं मित्रता ॥
॥ ६ ॥
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥
अर्थ :
जो पीठ पीछे कार्य को बिगाड़ता हो और सामने मीठी-मीठी बातें करता हो, ऐसे कपटी मित्र का उसी प्रकार तुरन्त परित्याग कर देना चाहिए, जैसे ऊपर से दूध से भरे हुए किन्तु भीतर से विष से युक्त घड़े को फेंक दिया जाता है।
॥ ७ ॥
सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सर्पात्क्रूरतरः खलः।
सर्पः शाम्यति मन्त्रैश्च दुर्जनः केन शाम्यति॥
अर्थ :
साँप भी क्रूर होता है और दुर्जन भी क्रूर होता है, किन्तु साँप की अपेक्षा दुर्जन कहीं अधिक क्रूर होता है; क्योंकि साँप तो मन्त्र और जड़ी-बूटी से शान्त हो जाता है, किन्तु दुर्जन किसी भी उपाय से शान्त नहीं होता।
॥ ८ ॥
दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।
सर्पो दशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे॥
अर्थ :
दुर्जन और विषैले सर्प में से सर्प ही श्रेष्ठ है, दुर्जन कदापि नहीं; क्योंकि सर्प तो केवल काल आने पर या छेड़े जाने पर ही डंसता है, किन्तु दुर्जन पग-पग पर मनुष्य को कष्ट पहुँचाता है।
॥ ९ ॥
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥
अर्थ :
परदेस में विद्या ही मनुष्य की सच्ची मित्र होती है, घर में गुणवती पत्नी मित्र होती है, रोगी के लिए औषधि मित्र होती है, और मृत्यु के पश्चात् परलोक में केवल धर्म ही मनुष्य का सच्चा संगी-मित्र होता है।
॥ १० ॥
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥
अर्थ :
मनुष्य चाहे कितना भी रूपवान और यौवन से सम्पन्न क्यों न हो, और चाहे कितने ही बड़े राजकुल में क्यों न जन्मा हो, यदि वह विद्या से हीन है तो वह उसी प्रकार आदर नहीं पाता जैसे गन्ध-रहित पलाश (ढाक) के लाल फूल शोभा नहीं पाते।
॥ तृतीयः अध्यायः — धर्म, संतोष एवं जीवन-सार ॥
॥ ११ ॥
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसञ्चयः।
आरोग्यं प्रियसंवासो बुद्धस्तत्र न मुह्यति॥
अर्थ :
यौवन, शारीरिक सौन्दर्य, जीवन, धन का संचय, नीरोगता और प्रियजनों का साथ — ये सब अनित्य और नाशवान हैं। विवेकी बुद्धिमान पुरुष इन नश्वर पदार्थों में कभी मोहग्रस्त नहीं होता।
॥ १२ ॥
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥
अर्थ :
सन्तोष रूपी अमृत से तृप्त और शान्त चित्त वाले महापुरुषों को जो सच्चा आत्मिक सुख प्राप्त होता है, वह सुख धन के लोभ में इधर-उधर भटकने वाले चंचल चित्त मनुष्यों को कभी प्राप्त नहीं हो सकता।
॥ १३ ॥
यथा हि केनचित्पूर्वं कर्मणा फलमाप्यते।
तथैव भुज्यते जन्तोस्तत्र शोको न युज्यते॥
अर्थ :
मनुष्य पूर्वजन्म अथवा पूर्वकाल में किए गए अपने ही शुभ-अशुभ कर्मों का फल यहाँ भोगता है; अतः जीवन में सुख-दुःख की प्राप्ति होने पर विवेकवान को शोक या विषाद नहीं करना चाहिए।
॥ १४ ॥
दातव्यं भोक्तव्यं सति विभवे नातिसङ्ग्रहो कार्यः।
पश्येह मधुकरीणां सञ्चितमर्थं हरन्त्यन्ये॥
अर्थ :
धन-सम्पदा होने पर उसका सदुपयोग दान देने और स्वयं धर्मपूर्वक उपभोग करने में करना चाहिए; अत्यधिक संग्रह (कृपणता) नहीं करना चाहिए। देखो! मधुमक्खियों द्वारा बूंद-बूंद संचित किए गए मधु को अन्य लोग छीनकर ले जाते हैं।
॥ १५ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते।
अजागलस्तनस्यैव तस्य जन्म निरर्थकम्॥
अर्थ :
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — मानव जीवन के इन चार पुरुषार्थों में से जिसने एक भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं किया, उसका मनुष्य-जन्म बकरी के गले में लटकने वाले निष्प्रयोजन स्तनों के समान सर्वथा व्यर्थ है।
॥ इति चाणक्यनीतिसारः समाप्तः ॥