॥ श्रीहरिः ॥
दामोदराष्टकम्

दामोदराष्टकम्

सत्यव्रत मुनि

🌸 स्तोत्र

पद्म पुराण में महर्षि सत्यव्रत द्वारा उक्त यह अष्टक कार्तिक (दामोदर) मास में वैष्णव परम्परा में नित्य गाया जाता है। इसमें माता यशोदा द्वारा उखल से बांधे गए दामोदर श्रीकृष्ण की बाल-माधुरी एवं शरणागति का अनूठा गान है।

दामोदराष्टकम्

पद्म पुराण में महर्षि सत्यव्रत द्वारा उक्त यह अष्टक कार्तिक (दामोदर) मास में वैष्णव परम्परा में नित्य गाया जाता है। इसमें माता यशोदा द्वारा उखल से बांधे गए दामोदर श्रीकृष्ण की बाल-माधुरी एवं शरणागति का अनूठा गान है।

॥ श्रीदामोदराष्टकम् ॥
॥ पद्मपुराणान्तर्गतम् — श्रीसत्यव्रतमुनि-विरचितम् ॥
ॐ अस्य श्रीदामोदराष्टकस्तोत्रमन्त्रस्य सत्यव्रत ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीदामोदरो देवता, श्रीदामोदरप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
॥ ध्यानम् ॥
विचित्र-रत्न-घटितं मुकुटं शिरसि न्यसेत्।
कर्णयोः कुण्डलं दीप्तं मौक्तिकं च गले वहेत्॥
पीताम्बरधरं सौम्यं नवनीत-करं विभुम्।
यशोदानन्ददं देवं दामोदरमहं भजे॥
॥ १ ॥
नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या॥१॥
अर्थ : जिनका स्वरूप सच्चिदानन्द (सत्, चित् और आनन्दमय) है, जिनके कपोलों पर मकराकृत कुण्डल हिल-डुलकर शोभा पा रहे हैं, जो गोकुल धाम में नित्य देदीप्यमान हैं, जो माता यशोदा के भय से ओखल से कूदकर तीव्र गति से भाग रहे हैं और जिन्हें माता यशोदा ने उनसे भी अधिक तीव्र दौड़कर पीछे से पकड़ लिया है — ऐसे परमेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को मैं सादर प्रणाम करता हूँ।
॥ २ ॥
रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं
कराम्भोजयुग्मेन सातङ्कनेत्रम्।
मुहुः श्वासकम्पत्रिरेखाङ्ककण्ठ-
स्थितग्रैवं दामोदरं भक्तिबद्धम्॥२॥
अर्थ : जो पकड़ लिए जाने पर रो रहे हैं और बारम्बार दोनों कमलसदृश हाथों से अपने दोनों नेत्रों को मल रहे हैं, जिनके दोनों नेत्र भय से चञ्चल हो रहे हैं, रोने के कारण जिनके श्वास के वेग से कण्ठ कम्पायमान हो रहा है और गले में पहनी हुई मोतियों की माला हिल रही है, तथा जिनका उदर रस्सी से (माता के वात्सल्य प्रेम की डोरी से) बाँध दिया गया है — उन प्रेमभक्ति से बँधने वाले दामोदर भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ ३ ॥
इतीदृक् स्वलीलाभिर्आनन्दकुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम्।
तदीयेशितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं
पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे॥३॥
अर्थ : इस प्रकार की अपनी बाल्य-लीलाओं द्वारा जो समस्त गोकुलवासियों को आनन्द के सरोवर में मग्न कर देते हैं, और जो अपने ऐश्वर्य एवं ज्ञान के अभिमानी पण्डितों के समक्ष यह सिद्ध करते हैं कि वे केवल अपने अनन्य निष्काम भक्तों द्वारा ही जीते जा सकते हैं — उन परात्पर प्रभु दामोदर की मैं प्रेमपूर्वक शत-शत वन्दना करता हूँ।
॥ ४ ॥
वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह।
इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं
सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः॥४॥
अर्थ : हे देव! आप सभी वरदानों को देने में समर्थ हैं, फिर भी मैं आपसे न तो मोक्ष चाहता हूँ, न मोक्ष की पराकाष्ठा वैकुण्ठ-प्राप्ति की अभिलाषा करता हूँ, और न ही किसी अन्य लौकिक अथवा अलौकिक वर की याचना करता हूँ। हे नाथ! मेरी केवल यही प्रार्थना है कि आपका यह वृन्दावन-विहारी बाल-गोपाल रूप सदा-सर्वदा मेरे हृदय में प्रकाशित रहे; इसके अतिरिक्त मुझे किसी अन्य वरदान की कोई आवश्यकता नहीं है।
॥ ५ ॥
इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलैर्-
वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश्च गोप्यैः।
मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्ताधरं मे
मनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः॥५॥
अर्थ : हे प्रभु! आपका यह मुख-कमल, जो अत्यन्त श्याम और घुंघराली तथा लाल आभा वाली अलकों से आवृत है, जिसे माता यशोदा बार-बार वात्सल्य भाव से चूमती हैं, और जिसके लाल-लाल होंठ पके हुए बिम्बफल के समान शोभायमान हैं — वह मुखकमल सदा मेरे अन्तःकरण में विराजमान रहे। मुझे लाखों अन्य लाभों से क्या प्रयोजन!
॥ ६ ॥
नमो देव दामोदरानन्त विष्णो
प्रसीद प्रभो दुःखजालाब्धिमग्नम्।
कृपादृष्टिवृष्ट्यातिदीनं बतेश
गृहाणेश मामज्ञमेध्यक्षिदृश्यः॥६॥
अर्थ : हे देव! हे दामोदर! हे अनन्त! हे सर्वव्यापक विष्णो! हे प्रभो! मुझ पर प्रसन्न होइए। मैं इस भव-बन्धन रूपी अगाध दुःख-सागर में डूबा जा रहा हूँ। हे ईश! मुझ अति दीन-हीन पर अपनी अमृतमयी कृपादृष्टि की वर्षा कीजिए और मेरा उद्धार कर मुझे प्रत्यक्ष अपने नयनों के सम्मुख दर्शन दीजिए।
॥ ७ ॥
कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्
त्वया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च।
तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ
न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह॥७॥
अर्थ : हे दामोदर! जिस प्रकार आपने ओखल से बँधे होने पर भी कुबेर के शापग्रस्त पुत्रों (नलकूबर और मणिग्रीव) का वृक्ष-योनि से उद्धार कर उन्हें अपनी परम भक्ति प्रदान की थी, उसी प्रकार आप मुझे भी अपनी अनन्य प्रेमाभक्ति प्रदान कीजिए। इस संसार में मुझे केवल आपकी भक्ति चाहिए, मोक्ष प्राप्ति का कोई आग्रह नहीं है।
॥ ८ ॥
नमस्तेऽस्तु दाम्ने स्फुरद्दीप्तिधाम्ने
त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने।
नमो राधिकायै त्वदीयप्रियायै
नमोऽनन्तलीलाय देवाय तुभ्यम्॥८॥
अर्थ : हे प्रभु! आपके उदर को बाँधने वाली उस दिव्य, देदीप्यमान रज्जु (दाम) को मेरा बारम्बार प्रणाम है। आपके उस उदर को प्रणाम है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आश्रय है। आपकी परम प्रिया श्रीराधिका जी को प्रणाम है, और अनन्त लीलाओं के सागर आप परमेश्वर श्रीकृष्ण को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम है।
॥ फलश्रुति ॥
॥ ९ ॥
इति दामोदराष्टकं यः पठेत् कार्त्तिके तु यः।
दीपदानं हरेः कुर्यान्मुच्यते सर्वपातकैः॥
अर्थ : जो भक्त कार्तिक मास में प्रतिदिन इस दामोदराष्टक का पाठ करता है और भगवान श्रीहरि को दीपदान अर्पित करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेमाभक्ति प्राप्त करता है।
॥ इति श्रीपद्मपुराणे सत्यव्रतमुनि-भाषितं दामोदराष्टकं सम्पूर्णम् ॥