दुर्गा सप्तशती मुख्य स्तोत्र (कवच, अर्गला, कीलक)
महर्षि मार्कण्डेय
मार्कण्डेय पुराणोक्त देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के अनिवार्य अंगभूत कवच, अर्गला और कीलक का यह त्रय पाठ साधक के कायिक, वाचिक एवं मानसिक रक्षण, जय-प्राप्ति और मन्त्र-सिद्धि हेतु दुर्गा-पाठ से पूर्व किया जाता है।
॥ श्रीदुर्गायै नमः ॥
॥ अथ श्रीदुर्गासप्तशती — त्रयाङ्ग स्तोत्राणि ॥
॥ प्रथमतः — श्रीदेव्याः कवचम् ॥
॥ अथ श्रीदुर्गासप्तशती — त्रयाङ्ग स्तोत्राणि ॥
॥ प्रथमतः — श्रीदेव्याः कवचम् ॥
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।
॥ मार्कण्डेय उवाच ॥
॥ १ ॥
यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥
अर्थ :
महर्षि मार्कण्डेय ने पूछा — 'हे पितामह ब्रह्मा जी! संसार में जो परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला साधन हो, और जो आपने अब तक किसी से न कहा हो, वह कृपा करके मुझे बतलाइए।'
॥ ब्रह्मोवाच ॥
॥ २ ॥
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
अर्थ :
ब्रह्मा जी बोले — 'हे महामुने! समस्त प्राणियों का उपकार करने वाला एक परम पावन और गोपनीय साधन है, वह है भगवती का दिव्य "देवी कवच"। महात्मा ब्रह्मा द्वारा प्रतिपादित भगवती दुर्गा के ये नौ पावन स्वरूप "नवदुर्गा" के नाम से विख्यात हैं — १. शैलपुत्री, २. ब्रह्मचारिणी, ३. चन्द्रघण्टा, ४. कूष्माण्डा, ५. स्कन्दमाता, ६. कात्यायनी, ७. कालरात्रि, ८. महागौरी और ९. सिद्धिदात्री।'
॥ ३ ॥
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे संकटे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥
न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥
अर्थ :
'जो मनुष्य दावानल में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, अथवा किसी विषम संकट और भय में पड़कर भगवती की शरण में आ जाता है, उसका कभी कोई अनिष्ट नहीं होता। रणक्षेत्र के संकट में भी उसे कोई विपत्ति, शोक, दुःख या भय छू नहीं सकता।'
॥ ४ ॥
पूर्वे रक्षतु वाराही आग्नेय्यामम्बिका स्वयम्।
दक्षिणे चावतु चामुण्डा नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी॥
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी।
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेत् अधस्ताद् वैष्णवी तथा॥
अर्थ :
'पूर्व दिशा में वाराही देवी, अग्निकोण में अम्बिका, दक्षिण में चामुण्डा, नैर्ऋत्य कोण में खड्गधारिणी, पश्चिम में वारुणी, वायव्य कोण में मृगवाहिनी, उत्तर दिशा में कौमारी, ईशान कोण में शूलधारिणी, ऊपर की ओर ब्रह्माणी और नीचे की ओर वैष्णवी देवी सदा मेरी रक्षा करें।'
॥ द्वितीयतः — श्रीमदर्गलास्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये जपे विनियोगः।
॥ ५ ॥
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
अर्थ :
जयन्ती (सब पर विजय पाने वाली), मङ्गला (परम कल्याणकारिणी), काली (सृष्टि का संहार करने वाली), भद्रकाली (सुख-शान्ति देने वाली), कपालिनी, दुर्गा (संकट-हारिणी), क्षमा, शिवा (परम पावन), धात्री (सबका भरण-पोषण करने वाली), स्वाहा और स्वधा — इन सभी स्वरूपों वाली हे भगवती जगदम्बा! आपको हमारा कोटि-कोटि नमस्कार है।
॥ ६ ॥
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥
अर्थ :
हे देवी चामुण्डा! आपकी जय हो! सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली माता! आपकी जय हो! सर्वत्र व्याप्त रहने वाली देवि! आपकी जय हो! हे कालरात्रि! आपको हमारा बारम्बार प्रणाम है।
॥ ७ ॥
मधुकैटभविध्वंसि विधातृवरदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अर्थ :
मधु और कैटभ नामक महादैत्यों का संहार करने वाली तथा ब्रह्मा जी को मनोवांछित वर देने वाली हे देवि! आपको नमस्कार है। आप मुझे दिव्य आत्म-स्वरूप प्रदान कीजिए, विजय प्रदान कीजिए, यश प्रदान कीजिए और काम-क्रोधादि शत्रुओं का नाश कीजिए।
॥ ८ ॥
महिषासुरनिबर्हणि भक्तानां सुखदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अर्थ :
असुर महिषासुर का मर्दन करने वाली और अपने अनन्य भक्तों को परम सुख प्रदान करने वाली हे भगवती! आपको नमस्कार है। आप मुझे आत्म-ज्ञान, विजय और यश प्रदान कीजिए तथा मेरे समस्त आन्तरिक शत्रुओं का संहार कीजिए।
॥ ९ ॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अर्थ :
दुष्ट रक्तबीज का वध करने वाली तथा चण्ड और मुण्ड का विनाश करने वाली हे जगदम्बा! आपको नमस्कार है। आप मुझे दिव्य स्वरूप, विजय और कीर्ति दीजिए तथा मेरे समस्त विघ्नों को नष्ट कीजिए।
॥ १० ॥
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अर्थ :
महाबली शुम्भ, निशुम्भ और धूम्राक्ष का वध करने वाली हे पराशम्भा देवि! आपको नमस्कार है। आप मुझे आत्म-बल, विजय और यश प्रदान कीजिए तथा मेरे शत्रुओं का दलन कीजिए।
॥ ११ ॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अर्थ :
हे करुणामयी माता! मुझे उत्तम सौभाग्य और पूर्ण नीरोगता (आरोग्य) प्रदान कीजिए, मुझे परम आत्मिक सुख दीजिए, मुझे दिव्य आध्यात्मिक तेज और विजय दीजिए तथा मेरे समस्त पाप-शत्रुओं को नष्ट कीजिए।
॥ तृतीयतः — श्रीकीलकमन्त्रस्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीकीलकस्तोत्रमन्त्रस्य शिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
॥ १२ ॥
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥
अर्थ :
विशुद्ध ज्ञान ही जिनका दिव्य शरीर है, तीनों वेद (ऋक्, यजुः, साम) ही जिनके तीन दिव्य नेत्र हैं, जो भक्तों को परम श्रेय (मोक्ष) की प्राप्ति कराने वाले हैं तथा जिन्होंने अपने मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण किया हुआ है — उन भगवान शिव को हमारा बारम्बार नमस्कार है।
॥ १३ ॥
सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम्।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति स्तुवंस्तोत्रेण भक्तिमान्॥
अर्थ :
इस सम्पूर्ण सप्तशती स्तोत्र को मन्त्रों का परम 'कीलक' (रहस्योद्घाटक) समझना चाहिए। जो भक्त इस रहस्य को जानकर निष्काम भक्तिभाव से भगवती की स्तुति करता है, वह सब प्रकार से परम कल्याण और भगवत्कृपा को प्राप्त कर लेता है।
॥ १४ ॥
यत्किञ्चिज्जगतीमध्ये दैवतं विद्यते परम्।
सर्वं चण्डीप्रसादेन सिद्धं भवति निश्चितम्॥
अर्थ :
इस सम्पूर्ण संसार में जो कुछ भी परम कल्याणकारी देव-कृपा अथवा आध्यात्मिक फल है, वह सब केवल भगवती चण्डी के पावन अनुग्रह से ही निश्चित रूप से सिद्ध हो जाता है।
॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे देवीकवच-अर्गला-कीलकस्तोत्राणि समाप्तानि ॥