॥ श्रीहरिः ॥
दुर्गा सूक्तम्

दुर्गा सूक्तम्

महानारायण उपनिषद् / ऋग्वेद खिलभाग

🔥 वेद

कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक के महानारायणोपनिषद् का यह सूक्त अग्नि-स्वरूपा भगवती दुर्गा की प्रार्थना है। इसमें भवसागर के संकटनाशक, पापनाशक तथा ज्योतिर्मय शक्ति के रूप में देवी के मन्त्रों का गान है।

दुर्गा सूक्तम्

कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक के महानारायणोपनिषद् का यह सूक्त अग्नि-स्वरूपा भगवती दुर्गा की प्रार्थना है। इसमें भवसागर के संकटनाशक, पापनाशक तथा ज्योतिर्मय शक्ति के रूप में देवी के मन्त्रों का गान है।

॥ श्रीदुर्गायै नमः ॥
॥ अथ दुर्गा सूक्तम् ॥
ॐ जातवेदसे इत्यस्य मन्त्रस्य कश्यप ऋषिः, दुर्गाग्निरुच्यते देवता, त्रिष्टुप् छन्दः, भगवत्याः श्रीदुर्गादेव्याः प्रसादेन सर्वारिष्ट-निवारणार्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ १ ॥
जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः।
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः॥ १ ॥
अर्थ : हम सर्वज्ञ अग्निदेव (जातवेदा) के निमित्त सोमरस का निष्पीडन (यज्ञ) करते हैं; वे हमारे शत्रुओं के अनिष्टकारी धन व पापों को भस्म कर दें। जैसे नौका समुद्र को पार करा देती है, वैसे ही वे अग्निदेव (दुर्गाग्नि) हमें सम्पूर्ण संकटों, दुर्गम स्थानों तथा समस्त पापों से पार लगा दें।
॥ २ ॥
तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम्।
दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसि तरसे नमः॥ २ ॥
अर्थ : जो अग्नि के समान देदीप्यमान वर्ण वाली हैं, अपने तपोबल से प्रकाशमान हैं, सूर्य के समान परम तेजस्विनी हैं, और शुभ कर्मों के फल की प्रदात्री हैं — उन परम कल्याणकारिणी भगवती दुर्गा देवी की मैं अनन्य भाव से शरण ग्रहण करता हूँ। हे संसार-सागर को सुखपूर्वक पार कराने वाली समर्थ देवि! आपके वेगवान् तारण-सामर्थ्य को हमारा बारम्बार नमस्कार है।
॥ ३ ॥
अग्ने त्वं पारया नव्यो अस्मान्त्स्वस्तिभिरति दुर्गाणि विश्वा।
पूश्च पृथ्वी बहुला न उर्वी भवा तोकाय तनयाय शं योः॥ ३ ॥
अर्थ : हे स्तुत्य पावक अग्निदेव! आप नवीन-नवीन कल्याणकारी साधनों द्वारा हमें सब प्रकार की विपत्तियों और कठिन संकटों से पार ले चलिए। हमारे नगर और हमारी यह विशाल पृथ्वी सुख-शान्ति से परिपूर्ण हों; तथा हमारे पुत्रों एवं पौत्रों के लिए आप परम सुख और रोग-भय से मुक्ति प्रदान करने वाले बनिए।
॥ ४ ॥
विश्वानि नो दुर्गहा जातवेदः सिन्धुं न नावा दुरितातिपर्षि।
अग्ने अत्रिवन्मनसा गृणानोऽस्माकं बोध्यविता तनूनाम्॥ ४ ॥
अर्थ : सम्पूर्ण संकटों और दुःखों का नाश करने वाले हे जातवेदा अग्निदेव! जैसे नाविक नौका द्वारा अथाह समुद्र को पार करा देता है, वैसे ही आप हमारे समस्त पापों व संकटों को पार कराइए। हे अग्निदेव! जैसे अत्रि ऋषि ने आपकी स्तुति की थी, वैसे ही हमारे मन की स्तुति को सुनकर आप हमारे शरीरों के परम रक्षक बनिए।
॥ ५ ॥
पृतनाजितं सहमानमुग्रमग्निं हुवेम परमात्सधस्थात्।
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा क्षामद्देवो अति दुरितात्यग्निः॥ ५ ॥
अर्थ : शत्रु-सेनाओं को जीतने वाले, समस्त विघ्नों को सहन करने वाले तथा अत्यन्त उग्र तेज वाले अग्निदेव को हम परम दिव्य स्थान से यहाँ बुलाते हैं। वह प्रकाशमान पावक देव हमारे समस्त पापों को भस्म करते हुए हमें सम्पूर्ण संकटों और दुर्गम बाधाओं से पार उतारे।
॥ ६ ॥
प्रत्नोषि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सत्सि।
स्वां चाग्ने तनुवं पिप्रयस्वास्मभ्यं च सौभगमायजस्व॥ ६ ॥
अर्थ : हे अग्निदेव! आप यज्ञों में अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, आप पुरातन काल से ही प्रधान होता हैं और नित्य नवीन होकर यज्ञ-वेदी पर विराजते हैं। हे पावक! आप अपने दिव्य स्वरूप को हविष्य द्वारा तृप्त कीजिए और हमारे लिए विपुल सौभाग्य, आरोग्य तथा कल्याण का विस्तार कीजिए।
॥ ७ ॥
गोभिर्जुष्टमयुजो निषिक्तं तवेन्द्र विष्णोरनुसञ्चरेम।
नाकस्य पृष्ठमभिसंवसानो वैष्णवीं लोक इह मादयन्ताम्॥ ७ ॥
अर्थ : गौओं, वेदमन्त्रों और पावन किरणों से सेवित, निष्पाप एवं परमात्मा द्वारा सिंचित उस परम पद का — जो इन्द्र और विष्णु का परम धाम है — हम अनुगमन करें। उस परमानन्दमय द्युलोक के शिखर पर निवास करते हुए, इस लोक के भक्तजन श्रीविष्णु की परम पावन वैष्णवी शक्ति (भगवती दुर्गा) के सान्निध्य में नित्य आनन्दित रहें।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
इति महानारायणोपनिषदि दुर्गासूक्तं सम्पूर्णम्॥