॥ श्रीहरिः ॥
गणेश चालीसा

गणेश चालीसा

परम्परागत

🪔 चालीसा

प्रथम-पूज्य विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश जी की स्तुति में रचित यह चालीसा रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति और सकल अमंगलों के विनाश हेतु नित्य पठनीय है। इसमें गजानन के गजमुख, एकदन्त, मूषक-सवारी तथा परशु-पाश धारण का वर्णन है।

गणेश चालीसा

प्रथम-पूज्य विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश जी की स्तुति में रचित यह चालीसा रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति और सकल अमंगलों के विनाश हेतु नित्य पठनीय है। इसमें गजानन के गजमुख, एकदन्त, मूषक-सवारी तथा परशु-पाश धारण का वर्णन है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥
॥ १ ॥
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
॥ २ ॥
जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥
॥ ३ ॥
जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
॥ ४ ॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
॥ ५ ॥
राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
॥ ६ ॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
॥ ७ ॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥
॥ ८ ॥
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व विख्याता॥
॥ ९ ॥
ऋद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
॥ १० ॥
कहहुं जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति विचित्र अति पावनकारी॥
॥ ११ ॥
एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥
॥ १२ ॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुँच्यो प्रभु धरि शिशु रूपा॥
॥ १३ ॥
अति आनन्द मगन महतारी। लखि सुत मुख सुख पायो भारी॥
॥ १४ ॥
नाम गणेश राखि सुख पायो। देव सकल मिलि हर्ष बढ़ायो॥
॥ १५ ॥
शनि लखि भयो शीश विहीना। सुरपति लखि अति दुःखित कीना॥
॥ १६ ॥
गिरिजा बिलखि विलाप अपारा। सुर नर मुनि सब रोवन हारा॥
॥ १७ ॥
तब हरि गरुड़ चढ़ि तहं आये। गज मुख आनि शीश बैठाये॥
॥ १८ ॥
प्राण प्रतिष्ठा कीन्ही भारी। भयो सुखी सब भवन पुरारी॥
॥ १९ ॥
देवन प्रथम पूज्य वर दीन्हा। बुद्धि विनायक सब सुख कीन्हा॥
॥ २० ॥
प्रथमहि नाम लेत सब काजा। सकल मनोरथ सिद्ध समाजा॥
॥ २१ ॥
विघ्न विनाशन मंगल दाता। संकट हरन सुखद वरदाता॥
॥ २२ ॥
जय जय जय संकटनाशन स्वामी। घट घट वासी अंतरयामी॥
॥ २३ ॥
एकदन्त चतुरानन प्यारे। भक्तन के संकट सब टारे॥
॥ २४ ॥
चार भुजा तनु अति विकराला। भाल चन्द्र सोहत मणिमाला॥
॥ २५ ॥
मोदक प्रिय मुद मंगल दाता। जग वन्दन सब विघ्न विधाता॥
॥ २६ ॥
अनाथ जन पर कृपा तुम्हारी। आय हरहु मम विपद अपारी॥
॥ २७ ॥
जो ध्यावै मन इच्छा पावै। सकल पदारथ घर चलि आवै॥
॥ २८ ॥
अंधहि आंख कोढ़िहि काया। बांझहि पुत्र निर्धनहि माया॥
॥ २९ ॥
चढ़त सिन्दूर लाल बलिहारी। लडुआ भोग लगत सुखकारी॥
॥ ३० ॥
जय गणेश जय जय गिरिजापति। राखहु लाज देहु शुभ सुमति॥
॥ ३१ ॥
मात पिता तुम ही जग त्राता। तुम्हरे चरण शरण सुखदाता॥
॥ ३२ ॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। अति मन्दमति बुद्धि हमारी॥
॥ ३३ ॥
क्षमहु नाथ अपराध हमारा। देहु भक्ति वरदान उदारा॥
॥ ३४ ॥
संवत सहस्र दसहु के माहीं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी आहीं॥
॥ ३५ ॥
पूजत जन मनवांछित पावैं। अंत समय सुरपुर सिधरावैं॥
॥ ३६ ॥
जो यह पाठ करै नित नेमा। ता पर कृपा करहिं हरि प्रेमा॥
॥ ३७ ॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै गजबदन गम्भीरा॥
॥ ३८ ॥
निश्चय यह चालीसा जो ध्यावै। ऋद्धि सिद्धि सब सुख संपति पावै॥
॥ ३९ ॥
देहु विमल मति बुद्धि विधाता। जय जय जय सुर मुनि सुखदाता॥
॥ ४० ॥
दास शरण आयो गणराया। राखहु लाज देहु निज छाया॥
॥ ४१ ॥
जय गणेश गिरिजा सुत देवा। सफल मनोरथ करहु कलेवा॥
॥ ४२ ॥
निशदिन चरण सरोज पर, बलिहारी गणराज।
दीन जानि निज दास को, राखहु मेरी लाज॥