गायत्री चालीसा
परम्परागत
समस्त वेदों की जननी वेदमाता भगवती गायत्री के पावन चौबीस अक्षरों के सार को व्यक्त करने वाली यह चालीसा साधकों में सद्बुद्धि, आत्म-तेज और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करती है।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
॥ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
॥ १ ॥
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा,
जीवन ज्योति प्रचण्ड।
शान्ति क्रान्ति मन्दाकिनी,
विपुल विवेक अखण्ड॥
॥ २ ॥
जगत जननि मंगल करनि,
गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री सुभग,
हो विभव निष्काम॥
॥ ३ ॥
भुर्भुवः स्वः ॐ युत गंगा।
गायत्री नित कलिमल भंगा॥
॥ ४ ॥
जय जगवन्द्य आदि भवानी।
ज्ञान बुद्धि की तुम ही खानी॥
॥ ५ ॥
श्वेत वसन तन माहिं सुहावे।
हंस बाहन अति सुख पावे॥
॥ ६ ॥
चार भुजा मुनि मन मोहावे।
वेद पुस्तक माला कर गावे॥
॥ ७ ॥
ज्ञान ध्यान की तुम सुखदाता।
सब जग की माता विधाता॥
॥ ८ ॥
चौबीस अक्षर मन्त्र सुहावन।
जपें जो नर सो होत सुपावन॥
॥ ९ ॥
ब्रह्म रूप तुम आदि अनादि।
काटहु माता सकल उपाधि॥
॥ १० ॥
वेद उपनिषद तुम्हरे नामा।
सकल शास्त्र हैं तुम्हरे धामा॥
॥ ११ ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश मनावे।
सुर मुनि सब नित शीश नवावे॥
॥ १२ ॥
वशिष्ठ विश्वामित्र सुध्याये।
ब्रह्मर्षि पदवी सुख पाये॥
॥ १३ ॥
जो जन गायत्री मन लावे।
सकल पाप उसके मिट जावे॥
॥ १४ ॥
ज्ञान ज्योति घट माहिं जगावे।
ब्रह्म तेज मुख पर चमकावे॥
॥ १५ ॥
बुद्धि हीन पावे विज्ञाना।
निर्बल लहे बल विज्ञाना॥
॥ १६ ॥
दरिद्र दुख कबहूं नहिं आवै।
जो जन गायत्री गुण गावै॥
॥ १७ ॥
रोग दोष सब मिटहिं शरीरा।
जपत मन्त्र मिट जाय सब पीरा॥
॥ १८ ॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवे।
गायत्री जब नाम सुनावै॥
॥ १९ ॥
महाशक्ति पावन सुखदाता।
सब भक्तन की भाग्य विधाता॥
॥ २० ॥
प्रातः काल जो उठि करि ध्यावे।
संध्या काल जो पाठ सुनावे॥
॥ २१ ॥
त्रिकाल संध्या जो नर करई।
भव सागर से सहजहि तरई॥
॥ २२ ॥
कुण्डलिनी शक्ति जगावे माता।
योग मार्ग की तुम सुखदाता॥
॥ २३ ॥
सूर्य मण्डल की तुम सुखदानी।
सविता रूप आदि कल्याणी॥
॥ २४ ॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी।
मन्द बुद्धि हम शरण तुम्हारी॥
॥ २५ ॥
क्षमहु नाथ अपराध हमारा।
देहु ज्ञान वरदान उदारा॥
॥ २६ ॥
जो यह चालीसा मन लावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥
॥ २७ ॥
पुत्र हीन धन हीन जो कोई।
पाठ करै निश्चय सुख होई॥
॥ २८ ॥
अंत समय सुरपुर सिधरावे।
जन्म मरण का चक्र छुड़ावे॥
॥ २९ ॥
जय गायत्री वेद विधाता।
जय जय जय सुर मुनि सुखदाता॥
॥ ३० ॥
सब संकट तें मातु छुड़ावे।
प्रेम सहित जो ध्यान लगावे॥
॥ ३१ ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
मनवांछित फल सो नर पावे॥
॥ ३२ ॥
जयति जयति गायत्री माता।
सब देवन की भाग्य विधाता॥
॥ ३३ ॥
अज्ञानता सब दूर बहावे।
निर्मल मति सब जन में पावे॥
॥ ३४ ॥
सद्बुद्धि की तुम वरदानी।
जय सावित्री आदि भवानी॥
॥ ३५ ॥
सत्य सनातन धर्म उज्यारी।
वेद ज्ञान की महिमा न्यारी॥
॥ ३६ ॥
दीन अनाथ जानि सुत मेरो।
राखहु माता चरणन नेरो॥
॥ ३७ ॥
सदा बसहु मम हृदय मझारी।
हरहु सकल अज्ञान अंधियारी॥
॥ ३८ ॥
जय जय जगदम्बे सुखकारी।
संकट हारी मंगलकारी॥
॥ ३९ ॥
चारों वेद तुम्हार बखानें।
ऋषि मुनि योगी ध्यान लगावें॥
॥ ४० ॥
नित्य नेम करि पाठ करावै।
सो जन निश्चय परम पद पावै॥
॥ ४१ ॥
दास शरण आयो जगदम्बा।
देहु ज्ञान बुद्धि अवलम्बा॥
॥ ४२ ॥
जय गायत्री मातु भवानी।
सब सुख दानि कृपा कल्याणी॥
॥ ४३ ॥
गायत्री चालीसा पढ़े,
जो कोई धरि ध्यान।
कृपा होय वेदमातु की,
पावे ब्रह्म ज्ञान॥