गोपी गीत
महर्षि वेदव्यास
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध (रासपञ्चाध्यायी) का यह उन्नीस श्लोकों का गीत विरह-भक्ति का अनुपम महाकाव्य है। कृष्ण के अन्तर्धान होने पर यमुना-तट पर गोपियों के हृदय से निकली यह पुकार निष्काम ईश्वरीय प्रेम का चरम निदर्शन है।
॥ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥
॥ अथ श्रीमद्भागवते गोपीगीतम् ॥
॥ दशमस्कन्धः — एकत्रिंशोऽध्यायः ॥
॥ अथ श्रीमद्भागवते गोपीगीतम् ॥
॥ दशमस्कन्धः — एकत्रिंशोऽध्यायः ॥
॥ गोप्य ऊचुः ॥
॥ १ ॥
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि धृतासवास्त्वां विचिन्वते॥
अर्थ :
गोपियाँ बोलीं — 'हे प्यारे! आपके जन्म लेने से यह ब्रज-भूमि वैकुण्ठ से भी अधिक धन्य और परम वैभवशाली हो गई है; क्योंकि साक्षात् भगवती महालक्ष्मी यहाँ नित्य निवास करने लगी हैं। हे प्रियतम! हम सब केवल आप ही के लिए अपने प्राणों को धारण किए हुए हैं। हम आपकी अनन्य दासियाँ चारों दिशाओं में आपको ही ढूंढ रही हैं; कृपा करके हमें अपने दर्शन दीजिए!'
॥ २ ॥
शरदुदाशये साधुजातसत्सरसिजोदरश्रीमुषा दृशा।
सुरतनाथ तेऽशुल्कदासिका वरद निघ्नतो नेह किं वधः॥
अर्थ :
'हे प्रेम-रस के स्वामी! शरद् ऋतु के निर्मल जलाशय में खिले हुए परम सुन्दर कमल के भीतरी भाग की कान्ति को चुराने वाले आपके इन नयनों के बाण से हम बिना मोल बिकी दासियाँ घायल हो रही हैं। हे वरदायक! क्या केवल शस्त्रों से मारना ही वध कहलाता है? क्या इस प्रकार अपने प्रेम-बाणों से हमारा वध करना हिंसा नहीं है?'
॥ ३ ॥
विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसाद्वर्षमारुताद्वैद्युतानलात्।
वृषमयात्मजाद्विश्वतो भयादृषभ ते वयं रक्षिता मुहुः॥
अर्थ :
'हे ब्रज-शिरोमणि! कालिया नाग के विषैले जल से, अघासुर-बकासुर आदि भयंकर दैत्यों से, इन्द्र के कोप से हुई मूसलाधार वर्षा और आँधी से, दावानल की भीषण अग्नि से, तथा व्योमासुर और अरिष्टासुर जैसे वृषभ रूप दैत्य से — आपने पग-पग पर हमारी बारम्बार रक्षा की है।'
॥ ४ ॥
न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान्सात्वतां कुले॥
अर्थ :
'हे प्यारे सखे! आप केवल यशोदा मैया के ही पुत्र नहीं हैं; आप तो सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में विराजमान उनके साक्षी अन्तरात्मा हैं। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर सम्पूर्ण विश्व की रक्षा और कल्याण के लिए ही आप यदुकुल में अवतीर्ण हुए हैं।'
॥ ५ ॥
विरचिताभयं वृष्णिधूर्य ते चरणमीयुषां संसृतेर्भयात्।
करसरोरुहं कान्त कामदं शिरसि धेहि नः श्रीकरग्रहम्॥
अर्थ :
'हे यदुवंश-शिरोमणि! जो लोग जन्म-मरण के संसार-भय से डरकर आपके चरणों की शरण में आते हैं, उन्हें अभय प्रदान करने वाला, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला, तथा लक्ष्मी जी के हाथ को थामने वाला आपका जो दिव्य करकमल है — हे प्रिय! उस पावन हस्तकमल को आप हमारे मस्तक पर रख दीजिए।'
॥ ६ ॥
व्रजजनार्तिहन्वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित।
भज सखे भवत्किङ्करीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय॥
अर्थ :
'हे ब्रजवासियों के दुःख हरने वाले वीर! अपने भक्तों के अभिमान को हरने वाली मन्द मुस्कान से युक्त हे सखे! हम आपकी नित्य दासियाँ हैं, आप हमें स्वीकार कीजिए; और अपने उस परम सुन्दर कमल-सदृश मुखारविन्द के दर्शन हमें कराइए।'
॥ ७ ॥
प्रणतदेहिनां पापकर्शनं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम्।
फणिफणार्पितं ते पदाबुजं कृणु कुचेषु नः कृन्धि हृच्छयम्॥
अर्थ :
'प्रणाम करने वाले प्राणियों के समस्त पापों को नष्ट करने वाले, गौओं और बछड़ों के पीछे-पीछे घास पर चलने वाले, लक्ष्मी जी का नित्य निवास स्थान, तथा कालिया नाग के फनों पर नृत्य करने वाले आपके जो पावन चरणकमल हैं — हे प्रियतम! उन चरणों को आप हमारे हृदय पर रख दीजिए और हमारी विरह-व्यथा को शान्त कीजिए।'
॥ ८ ॥
मधुरया गिरा वल्गुवाक्यया बुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण।
विधिकरीरिमा वीर मुह्यतीरधरसीधुनाऽऽप्याययस्व नः॥
अर्थ :
'हे कमल-नयन! आपकी जो मधुर, मनोहर और ज्ञानियों के मन को हरने वाली अमृतमयी वाणी है — उस वाणी को सुनने के लिए लालायित और आपके विरह में मूच्छित होती हुई हम दासियों को आप अपने अधरामृत का पान कराके नवजीवन प्रदान कीजिए।'
॥ ९ ॥
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥
अर्थ :
'आपकी दिव्य लीला-कथा का अमृत संसार के दुःखों से तपे हुए जीवों को परम जीवन देने वाला है; महान तत्त्ववेत्ता कवियों द्वारा पूजित, समस्त पापों को समूल नष्ट करने वाला, सुनते ही परम मंगल प्रदान करने वाला तथा अलौकिक आध्यात्मिक ऐश्वर्य का विस्तार करने वाला है। इस भूतल पर जो लोग आपकी इस पावन कथामृत का गान करते हैं, वास्तव में वे ही संसार में सबसे बड़े दानी और परम पुण्यात्मा हैं।'
॥ १० ॥
प्रहसितं प्रिय प्रेमवीक्षणं विहरणं च ते ध्यानमङ्गलम्।
रहसि संविदो या हृदिस्पृशः कुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि॥
अर्थ :
'हे प्रिय! आपका वह मधुर हास्य, वह प्रेमपूर्ण चितवन, वह मनोहारी विहरण, जिसका ध्यान करना भी परम कल्याणकारी है — और एकान्त में कही गई वे हृदयस्पर्शी मीठी बातें! हे नटखट मोहन! वे सब लीलाएँ याद आकर हमारे मन को निरन्तर व्याकुल कर रही हैं।'
॥ ११ ॥
चलसि यद्व्रजाच्चारयन्पशून्नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्।
शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति॥
अर्थ :
'हे प्राणनाथ! जब आप गौओं को चराने के लिए ब्रज से वन की ओर जाते हैं, तब कमल के समान अत्यन्त कोमल आपके चरण कंकर, पत्थरों और नुकीले तृणों से घायल हो रहे होंगे — यह सोच-सोचकर हमारा मन अत्यन्त व्यथित और व्याकुल हो उठता है।'
॥ १२ ॥
दिनपरिक्षये नीलकुन्तलैर्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम्।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहुर्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि॥
अर्थ :
'दिन ढलने पर जब आप वन से लौटते हैं, तब गौओं के खुरों से उड़ी हुई धूलि से धूसरित आपके घुंघराले नीले बाल और कमल जैसा सुन्दर मुखड़ा — हे वीर! उस छवि का बारम्बार दर्शन कराके आप हमारे हृदय में अनन्य प्रेम-विषाद को जगा देते हैं।'
॥ १३ ॥
प्रणतकामदं पद्मजार्चितं धरणिमण्डनं ध्येयमापदि।
चरणपङ्कजं शन्तपं च ते रमण नः स्तनेष्वर्पयाधिनु॥
अर्थ :
'शरणागतों की समस्त कामनाएँ पूर्ण करने वाले, ब्रह्मा जी द्वारा पूजित, पृथ्वी के परम आभूषण, संकट के समय एकमात्र ध्यान करने योग्य तथा परम शान्ति देने वाले आपके जो पावन चरणकमल हैं — हे रमण! उन्हें हमारे हृदय पर अर्पित करके हमारी विरह-अग्नि को शान्त कीजिए।'
॥ १४ ॥
सुरतवर्धनं शोकनाशनं स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्॥
अर्थ :
'दिव्य प्रेम-रस को बढ़ाने वाले, सम्पूर्ण शोकों का नाश करने वाले, आपकी मधुर मुरली द्वारा बारम्बार चूमे जाने वाले, और संसार के अन्य समस्त आकर्षणों को भुला देने वाले अपने उस दिव्य अधरामृत का दान, हे वीर! आप हमें कीजिए।'
॥ १५ ॥
अटति यद्भवानह्न काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥
अर्थ :
'दिन के समय जब आप वन में चले जाते हैं, तब आपको न देख सकने वाले हमारे लिए एक-एक पल (त्रुटि) एक-एक युग के समान बीतता है। और जब आप सांझ को लौटते हैं, तब आपके उस घुंघराली लटों वाले दिव्य मुखारविन्द को निहारने में बाधक बनने वाली आँखों की पलकों को बनाने वाले ब्रह्मा को हम मूढ़ और जड़ मानती हैं।'
॥ १६ ॥
पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवानतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव कस्त्यजेन्निशि योषितः॥
अर्थ :
'हे अच्युत! अपने पति, पुत्र, कुल, भाई और बान्धवों की मर्यादा को छोड़कर, आपकी वेणु-ध्वनि के गीत से मोहित होकर हम आपकी शरण में आई हैं। हे छलिया! आधी रात के इस घने वन में आई हुई असहाय स्त्रियों को भला आपके सिवा और कौन छोड़ सकता है?'
॥ १७ ॥
रहसि संविदं हृच्छयोदयं प्रहसिताननं प्रेमवीक्षणम्।
बृहदुरः श्रियो वीक्ष्य धाम ते मुहुरतस्पृहा मुह्यते मनः॥
अर्थ :
'एकान्त में कही गई वे प्रेममयी बातें, आपका वह मुस्कुराता हुआ मुख, वह प्रेमामृत बरसाती दृष्टि, और भगवती लक्ष्मी का नित्य निवास-स्थान आपका वह विशाल वक्षःस्थल — इन सबका बारम्बार स्मरण करके हमारा मन आपके अनन्य दर्शन की तीव्र लालसा से मोहित हो रहा है।'
॥ १८ ॥
व्रजवनौकसां व्यक्तिरङ्ग ते वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्॥
अर्थ :
'हे प्यारे श्यामसुन्दर! आपका यह दिव्य प्राकट्य ब्रजवासियों और सम्पूर्ण विश्व के समस्त पापों और दुःखों का नाश करने वाला परम मंगलमय है। केवल आपके दर्शन की अभिलाषा रखने वाली हम दासियों के हृदय-रोग (विरह) का नाश करने वाली जो आपकी दिव्य औषधि है, वह कृपा करके हमें प्रदान कीजिए।'
॥ १९ ॥
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥
अर्थ :
'हे प्यारे श्यामसुन्दर! आपके जिन अतिशय कोमल चरणकमलों को हम अपने कठोर वक्षःस्थल पर भी इस भय से धीरे-धीरे रखती हैं कि कहीं वे दुख न जाएँ — उन्हीं कोमल चरणों से आप इस समय घने कँटीले वन में नंगे पाँव भटक रहे होंगे! क्या कंकड़ों और कांटों से आपके वे चरण व्यथित नहीं हो रहे होंगे? आप ही में प्राण रखने वाली हम दासियों की बुद्धि यह सोचकर ही चकरा रही है!'
॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे रासक्रीडायां गोपीगीतं सम्पूर्णम् ॥