श्री जानकी स्तुति एवं जानकीनाथ भजन
गोस्वामी तुलसीदास
चित्रकूट धाम के पावन मन्दाकिनी तट स्थित महर्षि अत्रि एवं महासती अनुसूया के आश्रम में जगज्जननी जानकी जी ने पतिव्रत धर्म एवं भक्ति का अलौकिक उपदेश ग्रहण किया था। यह स्तुति माता सीता के परम पावन, शीलवान और करुणामयी स्वरूप को समर्पित है, जिसके साथ गोस्वामी तुलसीदास जी का परम प्रसिद्ध पद 'जानकीनाथ सहाय करैं जब' सम्मिलित है।
॥ श्रीजानकीरामाभ्यां नमः ॥
॥ अथ श्री जानकी स्तुति ॥
॥ १ ॥
जानकि त्वां नमस्यामि सर्वकामफलप्रदाम्।
रामचन्द्रप्रियां देवीं पातिव्रत्यपरायणाम्॥ १ ॥
अर्थ :
समस्त मनोकामनाओं के उत्तम फल को प्रदान करने वाली, भगवान् श्रीरामचन्द्र की प्राणवल्लभा, परम पतिव्रता और दिव्य स्वरूपा भगवती जानकी जी को मैं सादर नमस्कार करता हूँ।
॥ २ ॥
जनकस्य सुतां देवीं वैदेहीं रघुनन्दनप्रियाम्।
सर्वपापहरां पुण्यां वन्देऽहं लोकमातरम्॥ २ ॥
अर्थ :
महाराज जनक की दिव्य पुत्री, विदेह-राजकुमारी वैदेही, रघुकुलभूषण श्रीराम की प्रिया, समस्त पापों का हरण करने वाली और परम पुण्यमयी सम्पूर्ण लोकों की माता श्रीसीताजी की मैं वन्दना करता हूँ।
॥ ३ ॥
चित्रकूटवने रम्ये रामेण सह संस्थिताम्।
अनसूयाकृतप्रीतां जानकीं प्रणमाम्यहम्॥ ३ ॥
अर्थ :
चित्रकूट के रमणीक वन में श्रीराम के साथ पर्णकुटी में निवास करने वाली तथा महासती अनुसूया के प्रेम और दिव्य वस्त्र-आभूषणों के आशीर्वाद से अलंकृत भगवती जानकी जी को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ।
॥ गोस्वामी तुलसीदास कृत जानकीनाथ भजन ॥
॥ ४ ॥
जानकीनाथ सहाय करैं जब,
कौन बिगाड़ करै नर तेरो।
सूरज,
मंगल, सोम, बुद्ध, गुरु, भृगु, सुत, बुध, केतु न फेरो॥ ४ ॥
अर्थ :
हे मानव! जब स्वयं श्रीजानकीनाथ प्रभु श्रीराम तेरे सहायक हों, तब संसार में कोई तेरा क्या बिगाड़ सकता है? सूर्य, मंगल, चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु — कोई भी ग्रह तेरे अनुकूल मार्ग को विपरीत नहीं कर सकते।
॥ ५ ॥
जाकी कृपा-सुधा-दृष्टि से,
दारुण दुःख-दवानल मेरो।
तुलसीदास प्रभु राखि चरन-तल,
जनम-जनम को मेटि फेरो॥ ५ ॥
अर्थ :
जिनकी अमृतमयी कृपा-दृष्टि मात्र से सांसारिक दुःखों की भयानक दावानल शान्त हो जाती है; गोस्वामी तुलसीदास प्रार्थना करते हैं — हे प्रभु जानकीनाथ! मुझे अपने श्रीचरण-कमलों के आश्रय में रखकर मेरे जन्म-मरण के चौरासी के चक्र को सदा के लिए समाप्त कर दीजिए।
॥ इति श्री जानकी स्तुति सम्पूर्णा ॥
॥ जय सियाराम ॥