॥ श्रीहरिः ॥
कालभैरवाष्टकम्

कालभैरवाष्टकम्

आदि शङ्कराचार्य

🌸 स्तोत्र

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य विरचित यह अष्टक काशी के अधिपति कालभैरव की महिमा में है। मत्तगयन्द व भुजङ्गप्रयात जैसी ओजस्वी लय में रचित यह स्तोत्र काल, भय, पाप एवं यम-दण्ड से मुक्ति का पावन साधन है।

कालभैरवाष्टकम्

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य विरचित यह अष्टक काशी के अधिपति कालभैरव की महिमा में है। मत्तगयन्द व भुजङ्गप्रयात जैसी ओजस्वी लय में रचित यह स्तोत्र काल, भय, पाप एवं यम-दण्ड से मुक्ति का पावन साधन है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ अथ श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कालभैरवाष्टकम् ॥
काशी के अधिपति भगवान कालभैरव की यह पावन अष्टक स्तुति भय, रोग, अकाल मृत्यु, पाप और ग्रह-बाधाओं का निवारण कर मोक्ष एवं धर्म-सिद्धि प्रदान करती है।
॥ १ ॥
देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ १ ॥
अर्थ : जिनके पवित्र चरणकमलों की सेवा देवराज इन्द्र भी करते हैं, जिन्होंने सर्प का यज्ञोपवीत धारण कर रखा है, जिनके मस्तक पर चन्द्रकला सुशोभित है, जो कृपा के सागर हैं, नारद आदि मुनीश्वर जिनकी वंदना करते हैं और जो दिशाओं को ही वस्त्र के रूप में धारण करने वाले दिगम्बर हैं — उन काशी के स्वामी भगवान कालभैरव का मैं भजन करता हूँ।
॥ २ ॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्।
कालकालमम्बुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ २ ॥
अर्थ : जो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, भवसागर से पार उतारने वाले परम प्रभु हैं, नीलकण्ठ हैं, भक्तों के मनोवांछित फलों को प्रदान करने वाले त्रिनेत्रधारी हैं, काल के भी महाकाल हैं, कमल के समान सुन्दर नयनों वाले, हाथ में अक्षमाला और त्रिशूल धारण करने वाले अविनाशी हैं — उन काशी के स्वामी भगवान कालभैरव का मैं भजन करता हूँ।
॥ ३ ॥
शूलदण्डपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ३ ॥
अर्थ : जिन्होंने अपने हाथों में त्रिशूल, दण्ड और पाश धारण कर रखा है, जो सम्पूर्ण सृष्टि के मूल आदि-कारण हैं, जिनका श्यामवर्ण शरीर है, जो आदिदेव, अविनाशी और समस्त विकारों से रहित हैं, जिनका पराक्रम अत्यंत भीषण है और जिन्हें अलौकिक ताण्डव नृत्य प्रिय है — उन काशी के स्वामी भगवान कालभैरव का मैं भजन करता हूँ।
॥ ४ ॥
भुक्तिमुक्तिदायकमप्रमेयपुण्यदं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४ ॥
अर्थ : जो भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाले हैं, असीम पुण्य देने वाले, भक्तों से अत्यंत स्नेह रखने वाले, सम्पूर्ण लोकों में व्यापक स्वरूप वाले हैं तथा जिनकी कमर में बंधी हुई सुवर्ण की करधनी की घुंघरू मधुर ध्वनि करती है — उन काशी के स्वामी भगवान कालभैरव का मैं भजन करता हूँ।
॥ ५ ॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम्।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गनिर्मलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ५ ॥
अर्थ : जो धर्म की मर्यादा के रक्षक हैं, अधर्म के मार्ग का समूल नाश करने वाले हैं, जीवों के कर्म-बन्धनों को काटने वाले, परम सुख एवं शांति प्रदान करने वाले सर्वव्यापी प्रभु हैं तथा जिनका निर्मल श्रीअंग स्वर्ण वर्ण के सर्पों से सुशोभित है — उन काशी के स्वामी भगवान कालभैरव का मैं भजन करता हूँ।
॥ ६ ॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरञ्जनम्।
मृत्युदर्पनाशनं कराळदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ६ ॥
अर्थ : जिनके दोनों चरण रत्नों से जड़ी हुई पादुकाओं की कान्ति से अत्यंत शोभायमान हैं, जो नित्य, अद्वितीय, हमारे इष्टदेव और माया से परे निरंजन हैं, जो मृत्यु के भी दर्प का नाश करने वाले और अपनी विकराल दाढ़ों से दुष्टों को समाप्त करने वाले हैं — उन काशी के स्वामी भगवान कालभैरव का मैं भजन करता हूँ।
॥ ७ ॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसन्ततिं दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ७ ॥
अर्थ : जिनके प्रचण्ड अट्टहास से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कांप उठता है, जिनकी मात्र कृपादृष्टि से समस्त पापों का जाल नष्ट हो जाता है, जिनका शासन अत्यंत उग्र एवं अकाट्य है, जो भक्तों को अष्ट-सिद्धियां प्रदान करने वाले और मुण्डमाला धारण करने वाले हैं — उन काशी के स्वामी भगवान कालभैरव का मैं भजन करता हूँ।
॥ ८ ॥
भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ८ ॥
अर्थ : जो भूत-गणों के नायक हैं, अक्षय कीर्ति प्रदान करने वाले हैं, काशी में वास करने वाले लोगों के पाप-पुण्य का शोधन (निर्णय) करने वाले सर्वसमर्थ प्रभु हैं, नीति-मार्ग के मर्मज्ञ, सनातन पुरातन पुरुष और सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं — उन काशी के स्वामी भगवान कालभैरव का मैं भजन करता हूँ।
॥ ९ ॥
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम्।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं ध्रुवम्॥ ९ ॥
अर्थ : जो मनुष्य ज्ञान और मुक्ति का साधन, अनुपम पुण्य की वृद्धि करने वाले तथा शोक, मोह, दीनता, लोभ, क्रोध और संताप का नाश करने वाले इस मनोहर कालभैरवाष्टक का पाठ करते हैं, वे निश्चित रूप से भगवान कालभैरव के परम पावन चरणों की सन्निधि प्राप्त करते हैं।
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम् ॥