॥ श्रीहरिः ॥
कठोपनिषद्

कठोपनिषद्

कृष्ण यजुर्वेद (कठ शाखा)

🕉️ उपनिषद्

कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा का यह सुप्रसिद्ध उपनिषद् बालक नचिकेता और यमराज के गहन संवाद के रूप में है। इसमें श्रेय और प्रेय का भेद, आत्मा का रथ-रूपक तथा मृत्यु से परे अमृत-तत्त्व की प्राप्ति का सार्वकालिक दर्शन प्रतिपादित है।

कठोपनिषद्

कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा का यह सुप्रसिद्ध उपनिषद् बालक नचिकेता और यमराज के गहन संवाद के रूप में है। इसमें श्रेय और प्रेय का भेद, आत्मा का रथ-रूपक तथा मृत्यु से परे अमृत-तत्त्व की प्राप्ति का सार्वकालिक दर्शन प्रतिपादित है।

॥ श्रीहरिः ॥
॥ अथ कठोपनिषद् ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ : परमेश्वर हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन-पोषण करें। हम दोनों साथ मिलकर महान सामर्थ्य एवं विद्या-बल अर्जित करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ ज्ञान तेजस्वी और ओजस्वी हो। हम कभी परस्पर द्वेष न करें। त्रिविध तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) की शान्ति हो।
॥ प्रथमोऽध्यायः — प्रथमा वल्ली ॥
॥ नचिकेता एवं यमराज का प्रसंग — तीन वरदान ॥
॥ १ ॥
ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस॥
अर्थ : प्राचीन काल में वाजश्रवा के पुत्र महर्षि उद्दालक ने स्वर्ग आदि की कामना से 'विश्वजित' नामक महायज्ञ किया, जिसमें अपना सर्वस्व दान कर दिया। उनका 'नचिकेता' नाम का एक परम मेधावी और श्रद्धालु पुत्र था।
॥ २ ॥
तं ह कुमारꣳ सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाऽऽविवेश सोऽमन्यत॥
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्॥
अर्थ : यज्ञ में ऋत्विजों को दक्षिणा के रूप में बूढ़ी, अशक्त गाएँ दी जा रही थीं, जिन्होंने जल पी लिया था, घास चर ली थी, जिनका दूध दुहा जा चुका था और जिनकी प्रजनन शक्ति समाप्त हो चुकी थी। कुमार नचिकेता के हृदय में यह देखकर गहरी 'श्रद्धा' जाग उठी। उसने सोचा — 'ऐसी निष्प्रयोजन गाएँ दान करके मेरे पिता आनन्द-रहित अन्धकारमय लोकों में जाएँगे।'
॥ ३ ॥
स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति।
द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति॥
अर्थ : अपने पिता के यज्ञ को सफल बनाने की उत्कट इच्छा से नचिकेता ने पिता के पास जाकर पूछा — 'हे पिताजी! आप मुझे किसको दान करेंगे?' पिता ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब उसने दूसरी और तीसरी बार भी यही प्रश्न दोहराया, तब पिता ने क्रुद्ध होकर कह दिया — 'मैं तुझे मृत्यु (यमराज) को देता हूँ!'
॥ ४ ॥
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः।
किं स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति॥
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथा परे।
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः॥
अर्थ : नचिकेता ने विचार किया — 'मैं बहुत से शिष्यों में उत्तम आचरण करने वाला रहा हूँ और बहुतों में मध्यम; अधम कभी नहीं रहा। यमराज का ऐसा क्या प्रयोजन है जिसे पिताजी आज मेरे द्वारा सिद्ध करना चाहते हैं? मनुष्य को अपने पूर्वजों के सत्यवादी आचरण का स्मरण करना चाहिए। यह मर्त्य प्राणी अन्न के समान पककर नष्ट हो जाता है और अन्न के समान ही पुनः उत्पन्न होता है; अतः सत्य से विचलित नहीं होना चाहिए।'
॥ ५ ॥
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्।
तस्यैताꣳ शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम्॥
आशाप्रतीक्षे सङ्गताꣳसूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान्।
एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानाशन् वसति ब्राह्मणो गृहे॥
अर्थ : नचिकेता यमराज के भवन में पहुँचा। उस समय यमराज घर पर नहीं थे। नचिकेता तीन रात्रियों तक बिना जल-अन्न के द्वार पर बैठा रहा। यमराज के लौटने पर उनकी पत्नी ने कहा — 'ब्राह्मण अतिथि अग्नि के समान गृह में प्रवेश करता है। सत्पुरुष जल देकर उसकी शान्ति करते हैं। हे वैवस्वत यमराज! आप अतिथि के लिए जल ले आइए। जिस मन्दबुद्धि पुरुष के घर में ब्राह्मण अतिथि बिना खाए-पिये वास करता है, उसकी समस्त आशाएँ, प्रतीक्षाएँ, सत्संग, प्रिय वाणी, यज्ञ-दान के फल और पुत्र-पशु सब नष्ट हो जाते हैं।'
॥ ६ ॥
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्र्वरान्वृणीष्व॥
अर्थ : यमराज ने नचिकेता से कहा — 'हे ब्राह्मण! आप परम पूज्य अतिथि हैं। आपने मेरे घर में तीन रातें बिना भोजन किए व्यतीत की हैं, इसके लिए मैं आपको प्रणाम करता हूँ, मेरा कल्याण हो। अतः उन तीन रात्रियों के बदले आप मुझसे तीन वरदान माँग लीजिए।'
॥ ७ ॥
शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो।
त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे॥
अर्थ : नचिकेता ने कहा — 'हे मृत्युदेव! मेरे पिता गौतम मेरे प्रति शान्त-चित्त, प्रसन्न मन और क्रोध-रहित हो जाएँ। आपके द्वारा छोड़े जाने पर जब मैं घर लौटूँ, तब वे मुझे पहचानकर प्रेमपूर्वक मुझसे वार्तालाप करें — तीनों वरों में से यह मैं पहला वरदान माँगता हूँ।' यमराज ने कहा — 'तथास्तु।'
॥ ८ ॥
स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति।
उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके॥
स त्वमग्निꣳ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम्।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण॥
अर्थ : नचिकेता ने कहा — 'स्वर्ग-लोक में किसी प्रकार का भय नहीं है; वहाँ वृद्धावस्था का भय नहीं है और न आप (मृत्यु) का प्रभाव है। वहाँ भूख और प्यास दोनों को पार करके मनुष्य समस्त शोकों से रहित होकर आनन्द भोगता है। हे यमराज! आप स्वर्ग प्राप्त कराने वाली पावन 'अग्नि-विद्या' को जानते हैं। मुझ श्रद्धालु को उसका उपदेश दीजिए — यह मैं दूसरा वरदान माँगता हूँ।'
॥ ९ ॥
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन्।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम्॥
अर्थ : यमराज ने नचिकेता को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की आधारभूता 'नाचिकेत अग्नि-विद्या' का विस्तारपूर्वक उपदेश दिया, यज्ञवेदी की रचना और मन्त्र सिखाए। नचिकेता ने ज्यों-का-त्यों सब दोहरा दिया। यमराज ने प्रसन्न होकर एक विचित्र रत्नों की माला भेंट की और घोषणा की कि 'यह अग्नि अब संसार में तुम्हारे ही नाम से "नाचिकेत-अग्नि" कहलाएगी।'
॥ १० ॥
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः॥
अर्थ : नचिकेता ने तीसरा वरदान माँगा — 'मनुष्य के मरने के बाद जो यह संशय बना रहता है कि कोई कहते हैं कि "आत्मा रहता है", और कोई कहते हैं कि "वह नहीं रहता" — आपके द्वारा भली-भाँति उपदेश पाकर मैं इस आत्म-तत्त्व के परम रहस्य को साक्षात् जानना चाहता हूँ। यही मेरे तीनों वरों में से तीसरा और सर्वश्रेष्ठ वरदान है।'
॥ ११ ॥
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥
अर्थ : यमराज ने कहा — 'हे नचिकेता! इस विषय में प्राचीन काल में देवताओं को भी संशय हुआ था; क्योंकि यह आत्म-तत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है, सरलता से समझ में आने वाला नहीं है। तुम कोई दूसरा वर माँग लो, मुझ पर इसके लिए दबाव मत डालो; मुझे इस वरदान से मुक्त कर दो।'
॥ १२ ॥
शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि॥
कामांस्ते सर्वान् कामदुहो ददामि नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः॥
अर्थ : यमराज ने नचिकेता को सांसारिक प्रलोभन देते हुए कहा — 'तुम सौ वर्ष की आयु वाले पुत्र-पौत्र माँग लो, विपुल गौएँ, हाथी, स्वर्ण और घोड़े माँग लो; पृथ्वी का विशाल साम्राज्य माँग लो और स्वयं जितने वर्ष चाहो उतने वर्ष जीवित रहो। स्वर्ग की अप्सराएँ और दिव्य रथ ले लो; किन्तु हे नचिकेता! मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है, यह प्रश्न मत पूछो।'
॥ १३ ॥
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते॥
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव॥
अर्थ : नचिकेता ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया — 'हे अन्तक यमराज! ये समस्त सांसारिक भोग कल रहेंगे या नहीं, इनका कोई भरोसा नहीं है; ये इन्द्रियों के समस्त तेज को क्षीण कर देते हैं। समस्त जीवन भी वस्तुतः अत्यन्त अल्प ही है। ये दिव्य रथ, नृत्य और गीत आपके पास ही रहें। मनुष्य कभी धन-सम्पदा से तृप्त नहीं हो सकता। जब हमने आपके दर्शन पा लिए तो हमें धन भी मिल ही जाएगा और जब तक आप चाहेंगे हम जीवित भी रहेंगे; किन्तु मेरा वरणीय वरदान तो वही आत्म-ज्ञान है।'
॥ प्रथमोऽध्यायः — द्वितीया वल्ली ॥
॥ श्रेयस और प्रेयस का विवेक एवं आत्म-तत्त्व की महिमा ॥
॥ १४ ॥
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥
अर्थ : यमराज ने नचिकेता की निष्कामता देखकर उपदेश प्रारम्भ किया — 'हे नचिकेता! श्रेय (परम कल्याणकारी आध्यात्मिक मार्ग) सर्वथा भिन्न है, और प्रेय (प्रिय लगने वाला सांसारिक भोग-मार्ग) सर्वथा भिन्न है। ये दोनों भिन्न-भिन्न प्रयोजनों वाले मार्ग मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित कर बाँधते हैं। इनमें से जो श्रेय मार्ग को स्वीकार करता है, उसका कल्याण होता है; और जो प्रेय (भोगों) का वरण करता है, वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाता है।'
॥ १५ ॥
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते॥
अर्थ : श्रेय और प्रेय दोनों ही मनुष्य के सामने उपस्थित होते हैं। बुद्धिमान धीर पुरुष दोनों का भली-भाँति विचार करके उनमें भेद करता है। वह प्रेय की अपेक्षा श्रेय को श्रेष्ठ जानकर ग्रहण करता है; किन्तु मन्दबुद्धि मनुष्य केवल सांसारिक संग्रह और भोग (योग-क्षेम) की वासना से प्रेय को चुनता है।'
॥ १६ ॥
दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त॥
अर्थ : 'अविद्या' (भोगों में प्रवृत्त करने वाला अज्ञान) और 'विद्या' (आत्म-साक्षात्कार कराने वाला ज्ञान) — ये दोनों एक-दूसरे से सर्वथा विपरीत और भिन्न दिशाओं में ले जाने वाले हैं। हे नचिकेता! मैं तुम्हें विद्या का सच्चा अभिलाषी मानता हूँ; क्योंकि इतने विशाल सांसारिक भोग भी तुम्हें अपने मार्ग से डिगा नहीं सके।'
॥ १७ ॥
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥
अर्थ : 'सम्पूर्ण वेद जिस परम पद का बारम्बार गान करते हैं, समस्त तपस्याएँ जिसे पाने का संकेत करती हैं, और जिसकी प्राप्ति की इच्छा से साधक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं — उस परम पद को मैं संक्षेप में तुमसे कहता हूँ; वह है — "ओम्" (ॐ)।'
॥ १८ ॥
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्॥
अर्थ : 'यही ओंकार रूप अक्षर साक्षात् अपर ब्रह्म है, और यही ओंकार अक्षर परब्रह्म है। इस परम पावन अक्षर को जानकर साधक जो कुछ भी (मोक्ष अथवा कल्याण) चाहता है, वह उसे प्राप्त हो जाता है।'
॥ १९ ॥
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थ : 'यह ज्ञानस्वरूप चेतन आत्मा न कभी जन्म लेता है और न कभी मरता है। यह न किसी कारण से उत्पन्न हुआ है और न इससे कोई अन्य उत्पन्न हुआ है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी इसका विनाश नहीं होता।'
॥ २० ॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
अर्थ : 'यदि मारने वाला यह समझता है कि "मैं मारता हूँ", और यदि मरने वाला यह समझता है कि "मैं मारा गया", तो वे दोनों ही अज्ञानी हैं, आत्मा के सत्य को नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा न किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।'
॥ २१ ॥
अणोरणीयान् महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥
अर्थ : 'यह आत्मा अणु से भी अति सूक्ष्म और महान से भी अति महान है, जो इस प्राणी के हृदय-रूपी गुहा में नित्य विराजमान है। निष्काम, शोकरहित पुरुष ईश्वर की कृपा और इन्द्रियों की निर्मलता से उस आत्मा की दिव्य महिमा का साक्षात् दर्शन करता है।'
॥ प्रथमोऽध्यायः — तृतीया वल्ली ॥
॥ प्रसिद्ध रथ-रूपक एवं 'उत्तिष्ठत जाग्रत' ॥
॥ २२ ॥
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
अर्थ : 'हे नचिकेता! तू जीवात्मा को रथ का स्वामी (रथी) जान, और इस भौतिक शरीर को रथ समझ। बुद्धि को सारथि जान, और मन को लगाम समझ।'
॥ २३ ॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥
अर्थ : 'ज्ञानियों ने इन्द्रियों को उस रथ के घोड़े कहा है, और सांसारिक विषयों को वे मार्ग कहा है जिन पर वे घोड़े दौड़ते हैं। आत्मा, इन्द्रियाँ और मन से युक्त उस चेतन पुरुष को ही मनीषी 'भोक्ता' कहते हैं।'
॥ २४ ॥
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥
अर्थ : 'जो पुरुष विवेकहीन होता है और जिसका मन सदा अनियन्त्रित रहता है, उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में नहीं रहतीं — ठीक वैसे ही जैसे किसी अकुशल सारथि के दुष्ट घोड़े बेकाबू हो जाते हैं। किन्तु जो विवेकवान् होता है और जिसका मन सदा एकाग्र व संयमित रहता है, उसकी इन्द्रियाँ उसके पूर्ण वश में रहती हैं — जैसे कुशल सारथि के उत्तम घोड़े आज्ञाकारी होते हैं।'
॥ २५ ॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥
अर्थ : 'जो मनुष्य विवेक रूपी बुद्धि को अपना सारथि बनाता है और मन रूपी लगाम को दृढ़ता से थामे रहता है, वही इस संसार-मार्ग के चरम पार — भगवान विष्णु के उस परम धाम को प्राप्त कर लेता है।'
॥ २६ ॥
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।
पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः॥
अर्थ : 'स्थूल इन्द्रियों की अपेक्षा उनके सूक्ष्म विषय (अर्थ) श्रेष्ठ हैं; विषयों से श्रेष्ठ मन है; मन से श्रेष्ठ बुद्धि है; बुद्धि से श्रेष्ठ समष्टि महत्तत्त्व (महान आत्मा) है। महत्तत्त्व से श्रेष्ठ अव्यक्त मूल प्रकृति है; और अव्यक्त प्रकृति से भी परे परम पुरुष (परमात्मा) है। उस परम पुरुष से परे कुछ भी नहीं है; वही समस्त साधना की पराकाष्ठा है, और वही जीवों की परम गति है।'
॥ २७ ॥
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥
अर्थ : 'यह परम आत्मा सम्पूर्ण प्राणियों में गूढ़ (छिपा हुआ) रूप से विद्यमान है, इसलिए साधारण चर्म-चक्षुओं को दिखाई नहीं देता। केवल सूक्ष्मदर्शी तत्त्वज्ञानी ही अपनी एकाग्र, तीव्र और शुद्ध बुद्धि द्वारा इसका प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं।'
॥ २८ ॥
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥
अर्थ : 'हे मानवों! उठो! जागो! और श्रेष्ठ आत्मज्ञानी महापुरुषों के समीप जाकर उस आत्म-ज्ञान को प्राप्त करो! ज्ञानियों का कहना है कि आत्म-साक्षात्कार का यह मार्ग छुरे की तीक्ष्ण धार के समान अत्यन्त दुर्गम और कठिन है।'
॥ द्वितीयोऽध्यायः — प्रथमा वल्ली ॥
॥ इन्द्रियों का अन्तर्मुखी भाव एवं एकत्व का दर्शन ॥
॥ २९ ॥
पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥
अर्थ : 'स्वयंभू परमात्मा ने इन्द्रियों के मुख बाहर की ओर बनाए हैं; इसलिए मनुष्य सदा बाहर के विषयों को ही देखता है, अपने अन्तरात्मा को नहीं। किन्तु कोई विरला ही विवेकशील धीर पुरुष अमरता की इच्छा से अपनी इन्द्रियों को विषयों से मोड़कर (अन्तर्मुख करके) भीतर स्थित प्रत्यगात्मा का साक्षात् दर्शन करता है।'
॥ ३० ॥
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥
अर्थ : 'जो परब्रह्म यहाँ इस हृदय में स्थित है, वही वहाँ समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है; और जो वहाँ ब्रह्माण्ड में है, वही यहाँ इस देह में है। जो अज्ञानी यहाँ (ईश्वर और जीव में, अथवा जीवों में) भेद देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को (पुनर्जन्म के चक्र में) प्राप्त होता रहता है।'
॥ ३१ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति॥
अर्थ : 'अंगूठे के परिमाण वाला यह अन्तरात्मा पुरुष सदा प्राणियों के हृदय में विराजमान रहता है। जैसे मूँज घास के भीतर से उसकी सींक को धैर्यपूर्वक अलग निकाल लिया जाता है, वैसे ही साधक को इस नश्वर शरीर से उस आत्म-तत्त्व को विवेक द्वारा पृथक् जान लेना चाहिए। उसी को परम शुद्ध और अमृत स्वरूप जानो — हाँ, उसी को परम पावन अमर तत्त्व समझो।'
॥ द्वितीयोऽध्यायः — द्वितीया वल्ली ॥
॥ एकादश-द्वार देह एवं परम ज्योति ॥
॥ ३२ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
अर्थ : 'उस परम ब्रह्म के समक्ष न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारे, न यह बिजली ही चमकती है, फिर इस लौकिक अग्नि की तो बात ही क्या! उसी स्वयं-प्रकाशमान परमात्मा के प्रकाशित होने पर यह सम्पूर्ण जगत प्रकाशित होता है; उसी के दिव्य प्रकाश से यह सब कुछ आलोकित हो रहा है।'
॥ द्वितीयोऽध्यायः — तृतीया वल्ली ॥
॥ सनातन अश्वत्थ वृक्ष, योग-साधना एवं उपसंहार ॥
॥ ३३ ॥
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः।
तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।
तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन। एतद्वै तत्॥
अर्थ : 'यह संसार रूपी सनातन पीपल का वृक्ष ऐसा है जिसकी जड़ ऊपर (परब्रह्म परमात्मा) में है और शाखाएँ नीचे की ओर फैली हुई हैं। वही मूल परम शुद्ध है, वही परब्रह्म है, और वही अमृत कहलाता है। समस्त लोक उसी के आश्रित हैं, कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। हे नचिकेता! जिसके विषय में तुमने पूछा था, वह यही है।'
॥ ३४ ॥
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम्॥
तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ॥
अर्थ : 'जब मन के साथ पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ भली-भाँति शान्त होकर आत्मा में स्थिर हो जाती हैं, और बुद्धि भी किसी सांसारिक संकल्प-विकल्प की चेष्टा नहीं करती — उस अवस्था को ज्ञानी जन 'परम गति' कहते हैं। इन्द्रियों की इस पूर्ण स्थिर धारणा को ही 'योग' माना जाता है। उस समय साधक सर्वथा प्रमाद-रहित हो जाता है; क्योंकि योग ही आध्यात्मिक उत्पत्ति और अविद्या के लय का कारण है।'
॥ ३५ ॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम्॥
अर्थ : 'जब मनुष्य के हृदय में स्थित सम्पूर्ण सांसारिक कामनाएँ सर्वथा छूट जाती हैं, तब यह मरणधर्मा मनुष्य इसी देह में अमर हो जाता है और यहीं परब्रह्म का साक्षात् उपभोग करता है। जब मनुष्य के हृदय की अविद्या-जनित समस्त गाँठें (संशय, अज्ञान और अहंकार) छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, तब वह अमर हो जाता है — समस्त वेदान्त का उपदेश बस इतना ही है।'
॥ ३६ ॥
मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव॥
अर्थ : यमराज द्वारा उपदिष्ट इस सम्पूर्ण आत्म-विद्या तथा अष्टांग योग-विधि को पूर्ण रूप से प्राप्त करके नचिकेता समस्त पाप-पुण्य के मलों से रहित होकर, मृत्यु के बन्धन से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त हो गया। संसार में कोई भी अन्य साधक जो इस प्रकार आत्म-तत्त्व को जान लेता है, वह भी उसी प्रकार अमरता और ब्रह्म-पद को प्राप्त कर लेता है।
॥ इति कृष्णयजुर्वेदीया कठोपनिषद् सम्पूर्णा ॥