॥ श्रीहरिः ॥
केनोपनिषद्

केनोपनिषद्

सामवेद (तलवकार/जैमिनीय शाखा)

🕉️ उपनिषद्

सामवेद के तलवकार ब्राह्मण का यह उपनिषद् केनेषितं पतति प्रेषितं मनः जैसे गूढ़ प्रश्न से आरम्भ होता है। इसमें यक्षोपाख्यान द्वारा इन्द्रियों से परे साक्षात् परब्रह्म की सत्ता का उद्घाटन है।

केनोपनिषद्

सामवेद के तलवकार ब्राह्मण का यह उपनिषद् केनेषितं पतति प्रेषितं मनः जैसे गूढ़ प्रश्न से आरम्भ होता है। इसमें यक्षोपाख्यान द्वारा इन्द्रियों से परे साक्षात् परब्रह्म की सत्ता का उद्घाटन है।

॥ श्रीहरिः ॥
॥ अथ केनोपनिषद् ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि।
सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु।
तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ : हे परमात्मन्! मेरे सम्पूर्ण अंग, वाणी, प्राण, नेत्र, श्रोत्र और बल तथा समस्त इन्द्रियाँ पुष्ट एवं समर्थ हों। उपनिषदों में वर्णित सब कुछ साक्षात् परब्रह्म ही है। मैं कभी ब्रह्म का निरादर (अस्वीकार) न करूँ और ब्रह्म कभी मेरा परित्याग न करे। परमात्मा और मेरे बीच का सम्बन्ध कभी न टूटे। उपनिषदों में प्रतिपादित समस्त धर्म और आत्म-गुण मुझ आत्म-परायण साधक में प्रतिष्ठित हों, मुझमें प्रतिष्ठित हों। त्रिविध तापों की शान्ति हो।
॥ प्रथमः खण्डः ॥
॥ १ ॥
केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति॥
अर्थ : शिष्य पूछता है — यह मन किसकी इच्छा से प्रेरित होकर विषयों की ओर दौड़ता है? किसके द्वारा नियुक्त होकर मुख्य प्राण सबसे पहले गतिमान होता है? किसके द्वारा प्रेरित होकर लोग यह वाणी बोलते हैं? और वह कौन सा प्रकाशमान देव है जो नेत्र और कान को अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त करता है?
॥ २ ॥
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥
अर्थ : गुरु उत्तर देते हैं — वह परब्रह्म कान का भी कान है, मन का भी मन है, वाणी की भी वाणी है, प्राण का भी प्राण है और आँख की भी आँख है। विवेकशील धीर पुरुष इन इन्द्रियों के अभिमान से मुक्त होकर तथा इस नश्वर संसार से ऊपर उठकर अमर (मुक्त) हो जाते हैं।
॥ ३ ॥
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्।
अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे॥
अर्थ : वहाँ न आँख पहुँच सकती है, न वाणी पहुँच सकती है और न मन ही पहुँच सकता है। हम उस परमात्मा को नहीं जानते (इन्द्रिय-विषय के रूप में), और न यह जानते हैं कि उसका उपदेश कैसे दिया जाए। वह ज्ञात (समस्त जाने हुए जगत) से सर्वथा भिन्न है और अज्ञात (अव्यक्त प्रकृति) से भी परे है। ऐसा हमने अपने पूर्वज ऋषियों से सुना है, जिन्होंने हमारे प्रति इसकी विशद व्याख्या की थी।
॥ ४ ॥
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥
अर्थ : जो वाणी द्वारा प्रकाशित नहीं किया जा सकता, अपितु जिसके सामर्थ्य से वाणी स्वयं प्रकाशित होती है — उसी को तू ब्रह्म जान; यह सीमित जगत नहीं, जिसकी लोग (बाह्य रूप में) उपासना करते हैं।
॥ ५ ॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥
अर्थ : जिसे मनुष्य मन से नहीं सोच सकता, किन्तु जिससे मन स्वयं विचार करने में समर्थ होता है — उसी को तू ब्रह्म जान; यह परिच्छिन्न वस्तु नहीं, जिसकी लोग उपासना करते हैं।
॥ ६ ॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥
अर्थ : जिसे आँखों द्वारा नहीं देखा जा सकता, किन्तु जिससे आँखें देखने में समर्थ होती हैं — उसी को तू ब्रह्म जान; यह सीमित दृश्य रूप नहीं, जिसकी लोग उपासना करते हैं।
॥ ७ ॥
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदꣳ श्रुतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥
अर्थ : जिसे कानों द्वारा सुना नहीं जा सकता, किन्तु जिससे यह कान सुनने में समर्थ होते हैं — उसी को तू ब्रह्म जान; यह सांसारिक शब्द नहीं, जिसकी लोग उपासना करते हैं।
॥ ८ ॥
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥
अर्थ : जिसे प्राण-शक्ति द्वारा चेष्टायुक्त नहीं किया जा सकता, किन्तु जिसके द्वारा प्राण स्वयं शक्तिमान होता है — उसी को तू ब्रह्म जान; यह परिमित सत्ता नहीं, जिसकी लोग उपासना करते हैं।
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
॥ ९ ॥
यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य त्वं यदस्य च देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम्॥
अर्थ : गुरु कहते हैं — यदि तू ऐसा मानता है कि 'मैं ब्रह्म को भली-भाँति जान गया हूँ', तो निश्चय ही तूने ब्रह्म के रूप को बहुत अल्प ही जाना है। उसका जो रूप तुझमें है और जो देवताओं में है, वह सब तेरे लिए अभी विचारणीय ही है। इस पर शिष्य विचार करके कहता है — अब मैं मानता हूँ कि मुझे उसका यथार्थ ज्ञान हुआ है।
॥ १० ॥
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥
अर्थ : शिष्य कहता है — मैं ऐसा नहीं मानता कि 'मैं उसे अच्छी तरह जान गया हूँ', और न मैं यही मानता हूँ कि 'मैं उसे नहीं जानता'; मैं जानता भी हूँ और नहीं भी जानता। हममें से जो कोई इस रहस्य को समझता है कि 'न तो मैं उसे नहीं जानता और न पूरी तरह जानता हूँ', वही वास्तव में उसे जानता है।
॥ ११ ॥
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्॥
अर्थ : जिसका यह मत है कि 'ब्रह्म बुद्धि का विषय नहीं है', उसी का मत यथार्थ है; और जो यह समझता है कि 'मैंने उसे जान लिया है', वह वस्तुतः नहीं जानता। अहंकारपूर्वक जानने का दावा करने वालों के लिए वह अज्ञात है, और जो यह अनुभव करते हैं कि वह बुद्धि से परे है, उनके द्वारा वह वास्तव में जाना गया है।
॥ १२ ॥
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्॥
अर्थ : प्रत्येक अनुभूति एवं ज्ञान-वृत्ति (बोध) में जब उस आत्म-तत्त्व का साक्षात्कार होता है, तभी यथार्थ ज्ञान होता है, और उसी से मनुष्य अमरता को प्राप्त करता है। अपनी आत्मा से मनुष्य को परम सामर्थ्य प्राप्त होता है और आत्म-विद्या से उसे अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
॥ १३ ॥
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥
अर्थ : यदि इसी मनुष्य-जन्म में उस परब्रह्म को जान लिया, तब तो जीवन का परम सत्य सिद्ध हो गया; और यदि इस जन्म में उसे नहीं जाना, तो यह महान विनाश (संसार-चक्र में भटकना) है। विवेकशील महापुरुष प्रत्येक प्राणी में उस एक ही आत्म-तत्त्व का दर्शन करके इस संसार से प्रयाण करने पर अमर हो जाते हैं।
॥ तृतीयः खण्डः — यक्षोपाख्यानम् ॥
॥ १४ ॥
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त।
त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति॥
अर्थ : एक बार परब्रह्म ने देवताओं के निमित्त (असुरों पर) विजय प्राप्त की। उस ब्रह्म की विजय से देवता गर्वित हो उठे। वे सोचने लगे — 'यह विजय हमारी ही है और यह महिमा भी हमारी ही है।'
॥ १५ ॥
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति॥
अर्थ : ब्रह्म ने देवताओं के इस अभिमान को जान लिया। वह उनके समक्ष एक परम पूजनीय दिव्य यक्ष (अद्भुत स्वरूप) के रूप में प्रकट हुआ। देवता उस दिव्य रूप को नहीं पहचान सके कि 'यह पूज्य यक्ष कौन है?'
॥ १६ ॥
तेऽग्निमब्रुवन् जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति॥
अर्थ : देवताओं ने अग्निदेव से कहा — 'हे जातवेदा! पता लगाओ कि यह पूज्य यक्ष कौन है?' अग्निदेव ने कहा — 'बहुत अच्छा।'
॥ १७ ॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति॥
अर्थ : अग्निदेव उस यक्ष के समीप दौड़े। यक्ष ने पूछा — 'तुम कौन हो?' उन्होंने उत्तर दिया — 'मैं अग्नि हूँ, मैं सर्वज्ञ जातवेदा हूँ।'
॥ १८ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदꣳ सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति॥
अर्थ : यक्ष ने पूछा — 'तुममें ऐसा क्या सामर्थ्य (बल) है?' अग्नि ने कहा — 'इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उस सबको भस्म कर सकता हूँ।'
॥ १९ ॥
तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति तदुपप्रियाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति॥
अर्थ : यक्ष ने उनके सामने एक तिनका रखकर कहा — 'इसे जलाओ!' अग्निदेव ने अपने सम्पूर्ण वेग और शक्ति से उस तिनके पर प्रहार किया, किन्तु वे उसे जला न सके। वे लज्जित होकर वहाँ से लौट आए और देवताओं से बोले — 'मैं यह नहीं जान सका कि वह पूज्य यक्ष कौन है।'
॥ २० ॥
अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति॥
अर्थ : तब देवताओं ने वायुदेव से कहा — 'हे वायु! आप पता लगाइए कि यह यक्ष कौन है?' वायु ने कहा — 'बहुत अच्छा।'
॥ २१ ॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति॥
अर्थ : वायुदेव उस यक्ष के पास दौड़े। यक्ष ने पूछा — 'तुम कौन हो?' उन्होंने कहा — 'मैं वायु हूँ, मैं अन्तरिक्ष में विचरण करने वाला मातरिश्वा हूँ।'
॥ २२ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदꣳ सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति॥
अर्थ : यक्ष ने पूछा — 'तुममें क्या सामर्थ्य है?' वायु ने कहा — 'इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उस सबको उड़ाकर ले जा सकता हूँ।'
॥ २३ ॥
तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रियाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति॥
अर्थ : यक्ष ने उनके सामने एक तिनका रखकर कहा — 'इसे उड़ाओ!' वायुदेव ने अपने सम्पूर्ण प्रचण्ड वेग से उस पर प्रहार किया, किन्तु वे उस तिनके को हिला भी न सके। वे वहाँ से निराश लौट आए और बोले — 'मैं यह नहीं जान सका कि वह पूज्य यक्ष कौन है।'
॥ २४ ॥
अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे॥
अर्थ : तब देवताओं ने देवराज इन्द्र से कहा — 'हे मघवन्! आप स्वयं पता लगाइए कि यह यक्ष कौन है?' इन्द्र ने कहा — 'तथास्तु।' वे यक्ष की ओर तीव्रता से बढ़े, किन्तु उनके निकट पहुँचते ही वह यक्ष अन्तर्धान हो गया।
॥ २५ ॥
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति॥
अर्थ : इन्द्र ने अभिमान त्यागकर उसी आकाश में एक परम रूपवती, दिव्य तेजस्विनी देवी उमा हैमवती (हिमालय-पुत्री पार्वती) को देखा। इन्द्र ने नम्रतापूर्वक भगवती से पूछा — 'हे देवी! वह पूज्य यक्ष कौन था?'
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
॥ २६ ॥
सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥
अर्थ : भगवती उमा ने कहा — 'वह साक्षात् परब्रह्म था! उस परब्रह्म की ही विजय से तुम सब देवता महिमान्वित हो रहे हो।' तब जाकर इन्द्र को निश्चय हुआ कि वह अद्भुत यक्ष साक्षात् परब्रह्म ही था।
॥ २७ ॥
तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्व्वायुुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥
अर्थ : चूँकि अग्नि, वायु और इन्द्र ने उस ब्रह्म का सबसे समीप से स्पर्श (साक्षात्कार) किया और उन्होंने ही सबसे पहले उसे ब्रह्म के रूप में जाना, इसलिए ये तीनों देव अन्य सभी देवताओं से श्रेष्ठ माने जाते हैं।
॥ २८ ॥
तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥
अर्थ : और इन तीनों में भी इन्द्र अन्य सभी देवों से अधिक श्रेष्ठ माने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने सबसे समीप जाकर भगवती के उपदेश द्वारा सबसे पहले उस ब्रह्म को साक्षात् जाना।
॥ २९ ॥
तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा३ इतीति न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम्॥
अर्थ : उस परब्रह्म का यह आधिदैविक (प्रकृति में) संकेत है — जैसे आकाश में बिजली एक क्षण के लिए कौंधती है और जैसे पलक झपकती है, वैसे ही ब्रह्म का दिव्य प्रकाश एक क्षण में सम्पूर्ण प्रपञ्च को आलोकित कर देता है।
॥ ३० ॥
अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पः॥
अर्थ : अब उसका आध्यात्मिक (भीतर का) संकेत है — जैसे मन तीव्रता से ब्रह्म की ओर जाता हुआ प्रतीत होता है, और जिसके द्वारा मन निरन्तर उसका स्मरण करता है, वही संकल्प-शक्ति ब्रह्म का प्रतीक है।
॥ ३१ ॥
तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति॥
अर्थ : वह परब्रह्म 'तद्वन' (सबके द्वारा भजनीय और परम प्रिय) नाम से प्रसिद्ध है; अतः 'तद्वन' के रूप में ही उसकी उपासना करनी चाहिए। जो साधक उसे इस रूप में जान लेता है, सम्पूर्ण प्राणी उससे परम प्रेम करने लगते हैं और उसकी कामना करते हैं।
॥ ३२ ॥
उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति॥
अर्थ : शिष्य ने प्रार्थना की — 'हे भगवन्! मुझे उपनिषद् का उपदेश दीजिए।' गुरु ने कहा — 'तुझे उपनिषद् कह दी गई; निश्चय ही हमने तुझे ब्रह्म-विषयक पावन उपनिषद् सुना दी है।'
॥ ३३ ॥
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम्॥
अर्थ : उस ब्रह्मविद्या की प्रतिष्ठा (आधार) तप, इन्द्रिय-निग्रह और निष्काम कर्म हैं; चारों वेद और उनके अंग (शिक्षा, कल्प आदि) इसके अवयव हैं; तथा परम सत्य ही इसका परम धाम (निवास स्थान) है।
॥ ३४ ॥
यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति॥
अर्थ : जो साधक इस ब्रह्मविद्या को इस प्रकार यथार्थ रूप से जान लेता है, वह समस्त पापों को नष्ट करके अनन्त, सर्वश्रेष्ठ, परम आनन्दमय ब्रह्म-लोक में सदा के लिए प्रतिष्ठित हो जाता है — हाँ, वह सदा के लिए प्रतिष्ठित हो जाता है।
॥ इति सामवेदीया केनोपनिषद् सम्पूर्णा ॥