॥ श्रीहरिः ॥
कृष्ण चालीसा

कृष्ण चालीसा

परम्परागत

🪔 चालीसा

आनन्दकन्द भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, माखन-चोरी, गोवर्धन-धारण, कालिया-दमन एवं गीता के उपदेशों का भावपूर्ण स्मरण कराने वाली यह चालीसा प्रेम-भक्ति एवं आनन्द की प्राप्ति का सहज माध्यम है।

कृष्ण चालीसा

आनन्दकन्द भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, माखन-चोरी, गोवर्धन-धारण, कालिया-दमन एवं गीता के उपदेशों का भावपूर्ण स्मरण कराने वाली यह चालीसा प्रेम-भक्ति एवं आनन्द की प्राप्ति का सहज माध्यम है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्री कृष्णाय शरणं मम ॥
॥ १ ॥
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
॥ २ ॥
पूर्ण इन्दु अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥
॥ ३ ॥
जय यदुनन्दन जय जगवन्दन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
॥ ४ ॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय राधा मोहन छबि न्यारे॥
॥ ५ ॥
मोर मुकुट सिर कुटिल कुन्तला। कुण्डल स्रवण लगत सुख चंचला॥
॥ ६ ॥
भृकुटि कुटिल नैन अति बांके। निरखि मदन मुनि मन सब थाके॥
॥ ७ ॥
अधर मधुर मुरली मन भावै। राग रंग जन ध्यान भुलावै॥
॥ ८ ॥
कटि तट पीत बसन फहरावै। नूपुर चरनन झनकि सुनावै॥
॥ ९ ॥
कंठ माल वैजयन्ती साजे। कौस्तुभ मणि उर ज्योति विराजे॥
॥ १० ॥
माखन चोर सखा सुखदाई। धेनु चरावत वन यदुराई॥
॥ ११ ॥
पूतना का विष पान करायो। तृणावर्त तृण सम उड़ायो॥
॥ १२ ॥
यमलार्जुन उद्धार कियो प्रभु। कालिय दमन विलास कियो विभु॥
॥ १३ ॥
गोवर्धन गिरि नख पर धार्यो। इन्द्र गर्व एकहि पल टार्यो॥
॥ १४ ॥
चीर हरण लीला विस्तारी। गोपिन संग रास सुखकारी॥
॥ १५ ॥
मथुरा आय कंस को मार्यो। उग्रसेन कहं राज सम्हार्यो॥
॥ १६ ॥
मात-पिता के बन्धन काटे। सब जन के दुख संताप मिटाते॥
॥ १७ ॥
द्वारिकापुरी धाम बसाया। सुदामा मित्र का मान बढ़ाया॥
॥ १८ ॥
पाण्डव हितकारी यदुराई। द्रोपदी की कुल लाज बचाई॥
॥ १९ ॥
कौरव पाण्डव युद्ध करायो। गीता ज्ञान अमर सिखलायो॥
॥ २० ॥
अर्जुन मोह निवारन कीन्हा। दिव्य रूप निज दरशन दीन्हा॥
॥ २१ ॥
भीष्म प्रतिज्ञा पूरी कीन्ही। चक्र हाथ धरि महिमा दीन्ही॥
॥ २२ ॥
जो जन कृष्ण नाम अनुरागे। ताके सकल पाप भय भागे॥
॥ २३ ॥
दीन बन्धु करुना के सागर। जय घनश्याम ज्ञान रस नागर॥
॥ २४ ॥
जो कोई शरण तुम्हारी आवै। सो जन निश्चय भव तरि जावै॥
॥ २५ ॥
माखन मिश्री भोग लगावैं। तुलसी दल प्रभु अति हरषावैं॥
॥ २६ ॥
जय गोविन्द गोपाल मुरारी। जय जय जय श्री कुंजबिहारी॥
॥ २७ ॥
संकट कष्ट नशै सब भारी। जब सुमिरै यदुपति बनवारी॥
॥ २८ ॥
जो जन पाठ करै चालीसा। तापर कृपा करैं जगदीशा॥
॥ २९ ॥
प्रेम भक्ति उर माहिं बढ़ावै। परम धाम सो बैकुण्ठ पावै॥
॥ ३० ॥
जन्म जन्म के पाप नसावैं। कृष्ण चरण चित्त ध्यान लगावैं॥
॥ ३१ ॥
जो कोई कृष्ण चालीसा गावै। मनवांछित फल सो नर पावै॥
॥ ३२ ॥
पुत्र हीन पावै सुत ज्ञानी। धन हीनहिं धन मिलै सुखानी॥
॥ ३३ ॥
सब सुख लहै तुम्हारी शरणा। तुम रक्षक काहू डर ना॥
॥ ३४ ॥
जय जय मोहन बंशी वारे। भक्तन के संकट सब टारे॥
॥ ३५ ॥
राधा प्यारी संग विराजे। अद्भुत छवि त्रिभुवन में छाजे॥
॥ ३६ ॥
दीन अनाथ जानि सुत मेरो। राखहु प्रभु निज चरणन नेरो॥
॥ ३७ ॥
क्षमहु नाथ अपराध हमारा। देहु प्रेम भक्ति उदारा॥
॥ ३८ ॥
जय जय जय यदुकुल अवतंसा। नाशन असुर सकल खल बंसा॥
॥ ३९ ॥
वृन्दावन के कुंजन विहारी। जय जय जय श्री गोवर्धनधारी॥
॥ ४० ॥
नित्य नेम करि जो जन ध्यावे। सो नर परम धाम को पावे॥
॥ ४१ ॥
दास शरण आयो घनश्यामा। पूरण करहु सकल मम कामा॥
॥ ४२ ॥
जय श्री कृष्ण कृपा सुखदाता। सब भक्तन के भाग्य विधाता॥
॥ ४३ ॥
कृष्ण नाम रस जो पिए, तजि सब जग के काम।
पावे परम पद सो जन, पहुंचे श्री हरि धाम॥