॥ श्रीहरिः ॥
लक्ष्मी चालीसा

लक्ष्मी चालीसा

परम्परागत

🪔 चालीसा

धन, धान्य, यश एवं वैभव की अधिष्ठात्री भगवती महालक्ष्मी की यह स्तुति श्रीसूक्त के भावों को सहज भाषा में अभिव्यक्त करती है। दीपावली एवं नित्य सन्ध्या समय इसके पाठ से गृह-क्लेश और दारिद्र्य का शमन होता है।

लक्ष्मी चालीसा

धन, धान्य, यश एवं वैभव की अधिष्ठात्री भगवती महालक्ष्मी की यह स्तुति श्रीसूक्त के भावों को सहज भाषा में अभिव्यक्त करती है। दीपावली एवं नित्य सन्ध्या समय इसके पाठ से गृह-क्लेश और दारिद्र्य का शमन होता है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ॥
॥ १ ॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध कर, पुरवहु मेरी आस॥
॥ २ ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥
॥ ३ ॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
॥ ४ ॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
॥ ५ ॥
चार भृगु सुत की तुम देवी। सुर नर मुनि सब तुम्हरी सेवी॥
॥ ६ ॥
ऋद्धि सिद्धि सब तुम्हरी चेरी। करहु कृपा मम संकट हेरी॥
॥ ७ ॥
क्षीरसिन्धु में उपजी माता। सब देवन की सुख सम्पदाता॥
॥ ८ ॥
शंख चक्र गदा पद्म विराजे। छवि लखि कोटि मदन सर लाजे॥
॥ ९ ॥
कमलासन पर मातु विराजी। मुनि मन मोहे छवि अति साजी॥
॥ १० ॥
क्षीरसिन्धु जब मथ्यो विधाता। चौदह रत्न निकसे सुखदाता॥
॥ ११ ॥
रत्नन में तुम प्रगटीं माता। श्री विष्णु को अंग सुहाता॥
॥ १२ ॥
भए आनन्द सकल संसारा। देव समाज भए सुख भारा॥
॥ १३ ॥
जो जन तुम्हरी सेवा कीन्हा। सब सुख सम्पति ताको दीन्हा॥
॥ १४ ॥
तुम बिन यत्न करै जो कोई। ताकहं सिद्धि कभी नहिं होई॥
॥ १५ ॥
तुम ही सब जग की सुख दाता। अन्न धन वैभव की विधाता॥
॥ १६ ॥
मात पिता भ्राता सब कोई। तुम बिन कहुं आदर नहिं होई॥
॥ १७ ॥
तुम जहां वास करहु महरानी। सुख सम्पत्ति बाढ़े कल्याणी॥
॥ १८ ॥
महालक्ष्मी तुम नाम तुम्हारा। सब जग कहं सुख देन विहारा॥
॥ १९ ॥
जय जय जय जग जननि भवानी। महिमा अमित न जाइ बखानी॥
॥ २० ॥
दीन दयाल दया उर आनो। मम अपराध क्षमा करि जानो॥
॥ २१ ॥
ज्ञान ध्यान कछु मैं नहिं जानूं। केवल नाम तुम्हार बखानूं॥
॥ २२ ॥
रूप चतुर्भुज मातु सुहावा। देखि दरश मुनि मन हर्षावा॥
॥ २३ ॥
स्वर्ण कलश कर मातु विराजे। अष्ट सिद्धि नव निधि मुख साजे॥
॥ २४ ॥
जो जन पाठ करै चालीसा। तापर कृपा करैं जगदीशा॥
॥ २५ ॥
दारिद्र दुख नहिं निकट आवै। जो यह पाठ प्रेम से गावै॥
॥ २६ ॥
पुत्र हीन धन हीन जो कोई। पाठ करै निश्चय सुख होई॥
॥ २७ ॥
त्राहि त्राहि मैं शरण तुम्हारी। दूर करहु विपदा मम भारी॥
॥ २८ ॥
मात पिता की कृपा न पाई। केवल आस तुम्हारी लाई॥
॥ २९ ॥
मनवांछित फल पावै सोई। जापर कृपा तुम्हारी होई॥
॥ ३० ॥
जय कमलासन सुख की दाती। तुम सम कोउ न पर उपघाती॥
॥ ३१ ॥
संकट हरहु दया करि माता। सब सुख सम्पति देहु विधाता॥
॥ ३२ ॥
जो यह चालीसा मन लावै। सो जन परम धाम कहं पावै॥
॥ ३३ ॥
धन वैभव अरु कीर्ति बढ़ावै। सकल मनोरथ सिद्ध करावै॥
॥ ३४ ॥
प्रातःकाल उठै जो कोई। पाठ करै निष्कपट जो होई॥
॥ ३५ ॥
निश्चय लक्ष्मी ताके आहीं। वास करैं निज सदन समाहीं॥
॥ ३६ ॥
जय जय जय लक्ष्मी महरानी। सब सुख दानि कृपा कल्याणी॥
॥ ३७ ॥
दीन हीन पर कृपा तुम्हारी। भव सागर से पार उतारी॥
॥ ३८ ॥
भक्तन के सब संकट टारे। जय जय जय श्री विष्णु प्यारे॥
॥ ३९ ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावै। प्रेम सहित चालीसा गावै॥
॥ ४० ॥
दास जानि मोहि दीजै दाना। चरण कमल में ध्यान समाना॥
॥ ४१ ॥
जय लक्ष्मी माता कल्याणी। राखहु लाज देहु वरदानी॥
॥ ४२ ॥
त्राहि त्राहि दुख हरहु सब, मातु कृपा करि मोहि।
दास जानि निज शरण में, राखि लेहु अब तोहि॥