श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम्
ब्रह्माण्ड पुराण (हयग्रीव-अगस्त्य संवाद)
ब्रह्माण्ड पुराण के उत्तरखण्ड में भगवान हयग्रीव द्वारा महर्षि अगस्त्य को उपदिष्ट श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी के एक सहस्र दिव्य नामों का यह स्तोत्र श्रीविद्या एवं शाक्त साधना का सर्वोच्च गुह्य ग्रन्थ है।
॥ श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दर्यै नमः ॥
॥ अथ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
॥ अथ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रमालामन्त्रस्य, भगवान् हयग्रीव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिका देवता, ऐं बीजं, सौः शक्तिः, क्लीं कीलकं, श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरीप्रसादसिद्धिद्वारा सर्वपापक्षयपूर्वक-धर्मार्थकाममोक्ष-चतुर्विधफलपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ करन्यासः एवं अङ्गन्यासः ॥
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः (हृदयाय नमः)।
ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः (शिरसे स्वाहा)।
ॐ सौः मध्यमाभ्यां नमः (शिखायै वषट्)।
ॐ सौः अनामिकाभ्यां नमः (कवचाय हुम्)।
ॐ क्लीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः (नेत्रत्रयाय वौषट्)।
ॐ ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (अस्त्राय फट्)।
भूर्भुवःस्वरोमिति दिग्बन्धः॥
ॐ ऐं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः (हृदयाय नमः)।
ॐ क्लीं तर्जनीभ्यां नमः (शिरसे स्वाहा)।
ॐ सौः मध्यमाभ्यां नमः (शिखायै वषट्)।
ॐ सौः अनामिकाभ्यां नमः (कवचाय हुम्)।
ॐ क्लीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः (नेत्रत्रयाय वौषट्)।
ॐ ऐं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (अस्त्राय फट्)।
भूर्भुवःस्वरोमिति दिग्बन्धः॥
॥ ध्यानम् ॥
॥ १ ॥
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुर-
त्ततारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥
अर्थ :
प्रातःकालीन बालसूर्य और सिन्दूर के समान लाल अंगकान्ति वाली, तीन नेत्रों वाली, मणियों से जड़े मुकुट में चन्द्रकला को धारण करने वाली, मन्द-मन्द मुस्कान से युक्त मुख वाली, दोनों हाथों में मधुपूरित रत्नपात्र और लाल कमल धारण करने वाली, तथा रत्नजटित पात्र पर अपने लाल चरणकमलों को स्थापित करने वाली परम सौम्य जगन्माता श्रीललिता अम्बिका का हम ध्यान करते हैं।
॥ २ ॥
अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापां।
अणिमादिभिरावृतां मयूखैरहमित्येव विभावये भवानीम्॥
अर्थ :
अरुण (उषाकालीन लाल) वर्ण वाली, करुणा की तरंगों से परिपूर्ण नेत्रों वाली, चारों हाथों में पाश, अंकुश, पुष्पबाण और इक्षु-धनुष (गन्ने का धनुष) धारण करने वाली, तथा अणिमा आदि अष्ट सिद्धिरूपी किरणों से घिरी हुई पराशक्ति भगवती भवानी का मैं अपने आत्मस्वरूप ('अहम्') के रूप में ध्यान करता हूँ।
॥ ३ ॥
ध्यायेत्पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं
हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम्।
सर्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं
श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम्॥
अर्थ :
कमलासन पर विराजने वाली, प्रफुल्ल मुखमण्डल वाली, कमलदल के समान विशाल नेत्रों वाली, सुवर्णमयी आभा से युक्त, पीताम्बरधारिणी, हाथों में स्वर्णकमल सुशोभित करने वाली, समस्त आभूषणों से अलंकृत, शरणागत भक्तों को नित्य अभयदान देने वाली, शान्तमयी, समस्त देवों द्वारा वन्दिता और समस्त ऐश्वर्य प्रदान करने वाली श्रीविद्यारूपा भगवती का हम निरन्तर ध्यान करते हैं।
॥ मूल सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
॥ ४ ॥
श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी।
चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता॥ १ ॥
अर्थ :
१. श्रीमाता (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परम करुणामयी जननी), २. श्रीमहाराज्ञी (सम्पूर्ण चराचर लोकों की सम्राज्ञी), ३. श्रीमत्सिंहासनेश्वरी (चिन्तामणि गृह में स्थित दिव्य सिंहासन की ईश्वरी), ४. चिदग्निकुण्डसम्भूता (विशुद्ध चैतन्यरूपी ज्ञान-अग्नि कुण्ड से प्रकट होने वाली), ५. देवकार्यसमुद्यता (भण्डासुर-वध तथा देवताओं के संकट-निवारण हेतु उद्यत होने वाली)।
॥ ५ ॥
उद्यद्भानुसहस्राभा चतुर्बाहुसमन्विता।
रागस्वरूपपाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला॥ २ ॥
अर्थ :
६. उद्यद्भानुसहस्राभा (हजारों उदित होते सूर्यों के समान दिव्य तेजस्वी), ७. चतुर्बाहुसमन्विता (चार दिव्य भुजाओं से सम्पन्न), ८. रागस्वरूपपाशाढ्या (अपने बाएं हाथ में प्रेम/इच्छा शक्तिरूपी पाश धारण करने वाली), ९. क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला (दाएं हाथ में ज्ञान-वैराग्यरूपी अंकुश से देदीप्यमान)।
॥ ६ ॥
मनोरूपेक्षुकोदण्डा पञ्चतन्मात्रसायका।
निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला॥ ३ ॥
अर्थ :
१०. मनोरूपेक्षुकोदण्डा (संकल्प-विकल्पात्मक मनरूपी गन्ने का धनुष धारण करने वाली), ११. पञ्चतन्मात्रसायका (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धरूपी पाँच पुष्पबाण चलाने वाली), १२. निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला (अपनी लाल अरुण आभा के महासागर में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को निमग्न करने वाली)।
॥ ७ ॥
चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा।
कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता॥ ४ ॥
अर्थ :
१३. चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा (चम्पा, अशोक, पुन्नाग और सुगन्धित पुष्पों से सुसज्जित केशपाश वाली), १४. कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता (पद्मरागमणियों की श्रेणियों से चमकते हुए दिव्य मुकुट से सुशोभित)।
॥ ८ ॥
अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता।
मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका॥ ५ ॥
अर्थ :
१५. अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता (अष्टमी तिथि के अर्धचन्द्र के समान मनोहर ललाट वाली), १६. मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका (जिनके मुखचन्द्र पर कस्तूरी की बिन्दी चन्द्रमा के लांछन के समान शोभा पाती है)।
॥ ९ ॥
वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका।
वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना॥ ६ ॥
अर्थ :
१७. वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका (कामदेव के मंगल-भवन के तोरण के समान सुन्दर भौंहों वाली), १८. वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना (मुखमण्डल के सौन्दर्य-प्रवाह में चंचल मछलियों के समान विशाल नेत्रों वाली)।
॥ १० ॥
नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता।
ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा॥ ७ ॥
अर्थ :
१९. नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता (ताजे खिले चम्पा के पुष्प के समान सुन्दर नासिका वाली), २०. ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा (नक्षत्रों की चमक को भी लज्जित करने वाले मुक्तामय नथ से प्रकाशमान)।
॥ ११ ॥
कदम्बमञ्जरीक्लृप्तकर्णपूरमनोहरा।
ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला॥ ८ ॥
अर्थ :
२१. कदम्बमञ्जरीक्लृप्तकर्णपूरमनोहरा (कदम्ब के फूलों के कर्णफूलों से मनोहर), २२. ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला (सूर्य और चन्द्रमा जिनके कानों के दोनों कुण्डल बने हुए हैं)।
॥ १२ ॥
पद्मरागशिलादर्शपरिभाषिकपोलभूः।
नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा॥ ९ ॥
अर्थ :
२३. पद्मरागशिलादर्शपरिभाषिकपोलभूः (पद्मरागमणि के दर्पण के समान स्वच्छ कपोलों वाली), २४. नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा (नवीन मूँगे और बिम्बफल की लालिमा को लज्जित करने वाले ओष्ठों वाली)।
॥ १३ ॥
शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला।
कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा॥ १० ॥
अर्थ :
२५. शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला (शुद्ध विद्या के अंकुरों के समान चमकती हुई ३२ दाँतों की पंक्तियों वाली), २६. कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा (कर्पूरयुक्त ताम्बूल की सुगन्ध से सम्पूर्ण दिशाओं को महकाने वाली)।
॥ १४ ॥
निजसंलापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी।
मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा॥ ११ ॥
अर्थ :
२७. निजसंलापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी (अपनी वाणी की मधुरता से सरस्वती की 'कच्छपी' वीणा को भी पराजित करने वाली), २८. मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा (अपनी मन्द मुस्कान की कान्ति में भगवान् कामेश्वर के मन को मग्न करने वाली)।
॥ १५ ॥
अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिता।
कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा॥ १२ ॥
अर्थ :
२९. अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिता (उपमारहित अनुपम ठोड़ी की शोभा वाली), ३०. कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा (भगवान् कामेश्वर द्वारा बाँधे गए मंगलसूत्र से सुशोभित ग्रीवा वाली)।
॥ १६ ॥
कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता।
रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता॥ १३ ॥
अर्थ :
३१. कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता (सुवर्ण के बाजूबंदों से सुशोभित मनोहर भुजाओं वाली), ३२. रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता (रत्नजटित हार और चंचल मोतियों की मालाओं से अलंकृत)।
॥ १७ ॥
कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी।
नाभ्यालवालरोमालिप्रभाफलकुचद्वयी॥ १४ ॥
लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा।
स्तनभारनमन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया॥ १५ ॥
अर्थ :
३३. कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी (भगवान् कामेश्वर के प्रेमरूपी रत्न को प्राप्त करने के बदले समर्पित मनोहर वक्षःस्थल वाली), ३४. नाभ्यालवालरोमालिप्रभाफलकुचद्वयी, ३५. लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा (अत्यन्त सूक्ष्म, केवल रोमलता के आधार पर ही अनुमान करने योग्य कटिप्रदेश वाली), ३६. स्तनभारनमन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया (त्रिवली से सुशोभित उदर वाली)।
॥ १८ ॥
अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी।
रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता॥ १६ ॥
कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता।
माणिक्यमुकुटाकारजानुद्वयविराजिता॥ १७ ॥
अर्थ :
३७. अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी (लाल कौसुम्भ रेशमी वस्त्र से सुशोभित कटिभाग वाली), ३८. रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता (रत्नों की घुंघरुओं वाली करधनी धारण करने वाली), ३९. कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता (केवल कामेश्वर द्वारा ज्ञात कोमलता वाली जंघाओं वाली), ४०. माणिक्यमुकुटाकारजानुद्वयविराजिता (माणिक्य के मुकुट के समान सुन्दर घुटनों वाली)।
॥ १९ ॥
इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका।
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता॥ १८ ॥
नखदीधितिसञ्छन्ननमज्जनतमोगुणा।
पदद्वयप्रभासञ्चूतपद्मरागा विमर्दिनी॥ १९ ॥
अर्थ :
४१. इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका (कामदेव के तरकश के समान जंघाओं वाली), ४२. गूढगुल्फा (गूढ़/अदृष्ट टखनों वाली), ४३. कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता (कछुए की पीठ के समान उन्नत पाँव वाली), ४४. नखदीधितिसञ्छन्ननमज्जनतमोगुणा (अपने चरणनखों की ज्योति से प्रणाम करने वाले भक्तों के अज्ञान व तमोगुण को नष्ट करने वाली), ४५. पदद्वयप्रभासञ्चूतपद्मरागा विमर्दिनी (अपने चरणों की लालिमा से पद्मराग मणियों को तिरस्कृत करने वाली)।
॥ २० ॥
शिञ्जानमणिमञ्जीरमण्डितश्रीपदाम्बुजा।
मरालीमन्दगमना महालावण्यशेवधिः॥ २० ॥
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता।
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा॥ २१ ॥
अर्थ :
४६. शिञ्जानमणिमञ्जीरमण्डितश्रीपदाम्बुजा (झंकार करती हुई मणियों की पाजेब से युक्त चरणकमलों वाली), ४७. मरालीमन्दगमना (हंसिनी के समान मन्द और मनोहर गति वाली), ४८. महालावण्यशेवधिः (सम्पूर्ण लावण्य और सौन्दर्य की अक्षय निधि), ४९. सर्वारुणा (सब प्रकार से अरुण वर्ण वाली), ५०. अनवद्याङ्गी (सर्वथा निर्दोष अंगों वाली), ५१. सर्वाभरणभूषिता (समस्त दिव्य आभूषणों से अलंकृत), ५२. शिवकामेश्वराङ्कस्था (सदाशिव कामेश्वर की गोद में विराजने वाली), ५३. शिवा (परम मंगलमयी), ५४. स्वाधीनवल्लभा (अपने पति परमेश्वर को अपने प्रेम से वश में रखने वाली)।
॥ २१ ॥
सुमेरुमध्यशृङ्गस्था श्रीमन्नगरनायिका।
चिन्तामणिगृहान्तःस्था पञ्चब्रह्मासनस्थिता॥ २२ ॥
महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी।
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी॥ २३ ॥
अर्थ :
५५. सुमेरुमध्यशृङ्गस्था (सुमेरु के मध्य-शिखर पर निवास करने वाली), ५६. श्रीमन्नगरनायिका (श्रीनगर/श्रीचक्र की स्वामिनी), ५७. चिन्तामणिगृहान्तःस्था (चिन्तामणि के बने दिव्य भवन में वास करने वाली), ५८. पञ्चब्रह्मासनस्थिता (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव — इन पञ्चब्रह्मों के बने आसन पर विराजने वाली), ५९. महापद्माटवीसंस्था (सहस्रार महाकमल वन में स्थित), ६०. कदम्बवनवासिनी (कदम्ब के वन में रमण करने वाली), ६१. सुधासागरमध्यस्था (अमृत-समुद्र के मध्य स्थित मणिद्वीप में रहने वाली), ६२. कामाक्षी (करुणा और प्रेम से पूर्ण नेत्रों वाली), ६३. कामदायिनी (भक्तों के समस्त मनोरथ पूर्ण करने वाली)।
॥ २२ ॥
देवर्षिगणसङ्घातस्तूयमानात्मवैभवा।
भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता॥ २४ ॥
सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता॥ २५ ॥
अर्थ :
६४. देवर्षिगणसङ्घातस्तूयमानात्मवैभवा (देवताओं और महर्षियों द्वारा गाए जाने वाले वैभव वाली), ६५. भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता (भण्डासुर के वध के लिए सन्नद्ध पराशक्ति सेना से युक्त), ६६. सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता (हाथियों की सेना की स्वामिनी सम्पत्करी देवी द्वारा सेवित), ६७. अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता (करोड़ों अश्वों की स्वामिनी अश्वारूढा देवी से घिरी हुई)।
॥ २३ ॥
चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता।
गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता॥ २६ ॥
किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता।
ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा॥ २७ ॥
अर्थ :
६८. चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता (श्रीचक्ररूपी रथ पर आरूढ़ समस्त दिव्य आयुधों से सुसज्जित), ६९. गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता (गेयचक्र रथ पर बैठी मन्त्रिणी श्यामा श्यामला देवी द्वारा सेवित), ७०. किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता (किरिचक्र रथ पर बैठी दण्डनाथा वाराही देवी द्वारा अगवानी की जाने वाली), ७१. ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा (ज्वालामालिनी देवी द्वारा रचे गए अग्नि-परकोटे के मध्य सुरक्षित रहने वाली)।
॥ २४ ॥
भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता।
नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका॥ २८ ॥
अर्थ :
७२. भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता (भण्डासुर की सेना के संहार में तत्पर शक्ति-सेना के पराक्रम से प्रसन्न होने वाली), ७३. नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका (नित्या देवियों के रण-पराक्रम को देखने के लिए उत्सुक रहने वाली)।
॥ २५ ॥
मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी॥ ९० ॥
आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थिविभेदिनी।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी॥ ९१ ॥
अर्थ :
(कुण्डलिनी योग-रहस्य) — मूलाधार चक्र में निवास करने वाली, ब्रह्मग्रन्थि का भेदन करने वाली; मणिपूर चक्र में ज्योतिर्मय रूप से प्रकट होने वाली, विष्णुग्रन्थि का भेदन करने वाली; आज्ञा चक्र के मध्य में स्थित, रुद्रग्रन्थि का भेदन करने वाली; और सहस्रार कमल में परमशिव से संयुक्त होकर अमृतरस की वर्षा करने वाली।
॥ २६ ॥
तटिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरि संस्थिता।
महाशक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तुतनीयसी॥ ९२ ॥
भवानी भाविनागम्या भवारण्यकुठारिका।
भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर्भक्तसौभाग्यदायिनी॥ ९३ ॥
अर्थ :
बिजली की लता के समान दीप्तिमान्, षट्चक्रों से ऊपर सहस्रार में स्थित, परा महाशक्ति, कमल-तन्तु के समान अति सूक्ष्म कुण्डलिनी स्वरूपा; भवानी, केवल भाव-भक्ति से प्राप्त होने वाली, संसाररूपी वन को काटने के लिए कुल्हाड़ी के समान, कल्याणप्रिय, मंगलमूर्ति और भक्तों को परम सौभाग्य देने वाली।
॥ २७ ॥
सर्ववेदान्तसंवेद्या सत्यानन्दस्वरूपिणी।
लोपामुद्रार्चिता लीलाक्लृप्तब्रह्माण्डमण्डला॥ ९४ ॥
अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता।
योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा॥ ९५ ॥
इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिस्वरूपिणी।
सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूपधारिणी॥ ९६ ॥
अर्थ :
सम्पूर्ण वेदान्त द्वारा जानने योग्य, सत्-चित्-आनन्द स्वरूपा, महर्षि अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा द्वारा पूजिता, केवल अपनी लीला से सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों की रचना करने वाली; चर्मचक्षुओं से अदृश्य, दृश्य-प्रपंच से रहित, परम ज्ञाता, त्रिगुणातीत; योगिनी, योग देने वाली, योगीजन द्वारा ध्येय, योगानन्दमयी; इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति तीनों रूपों में विराजमान; सबकी आधारभूता और सत्-असत् सम्पूर्ण रूपों को धारण करने वाली।
॥ २८ ॥
राजराजेश्वरी राज्यदायिनी राज्यवल्लभा।
राजत्कृपा राजपीठनिवेशितनिजाश्रिता॥ १८० ॥
राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्गबलेश्वरी।
साम्राज्यदायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला॥ १८१ ॥
दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोकवशङ्करी।
सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्दरूपिणी॥ १८२ ॥
देशकालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी।
सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता सदाशिवपतिव्रता।
श्रीशिवार्धशरीरी च श्रीललिताम्बिका॥ १८३ ॥
अर्थ :
राजराजेश्वरी, साम्राज्य देने वाली, अनन्य शरणागत को राजसिंहासन पर बैठाने वाली, चतुरङ्गिणी सेना की ईश्वरी; सत्यसंकल्पा, पृथ्वीमण्डला, समस्त असुरों का संहार करने वाली, तीनों लोकों को वश में करने वाली, सम्पूर्ण पुरुषार्थों को देने वाली, सच्चिदानन्दरूपा; देश और काल की सीमाओं से परे सर्वव्यापक, सरस्वती, समस्त शास्त्रों की अधिष्ठात्री, समस्त उपाधियों से रहित, सदाशिव की अनन्य पतिव्रता, भगवान् शिव के अर्धनारीश्वर शरीर को सुशोभित करने वाली — साक्षात् जगन्माता पराभट्टारिका श्रीललिताम्बिका को हमारा अनन्त कोटि प्रणाम है!
॥ फलश्रुति एवं समर्पण ॥
इत्येवं नामसाहस्रं कथितं ते घटोद्भव।
रहस्यानां रहस्यं च ललितायाः प्रकीर्तितम्॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि ललितायाः सहस्रकम्।
स भुक्त्वा विपुलान्भोगानन्ते याति परां गतिम्॥
ॐ तत्सत् श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरीचरणारविन्दार्पणमस्तु।
इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डे हयग्रीवागस्त्यसंवादे श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥
इत्येवं नामसाहस्रं कथितं ते घटोद्भव।
रहस्यानां रहस्यं च ललितायाः प्रकीर्तितम्॥
यः पठेच्छृणुयाद्वापि ललितायाः सहस्रकम्।
स भुक्त्वा विपुलान्भोगानन्ते याति परां गतिम्॥
ॐ तत्सत् श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरीचरणारविन्दार्पणमस्तु।
इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डे हयग्रीवागस्त्यसंवादे श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥