॥ श्रीहरिः ॥
मधुराष्टकम्

मधुराष्टकम्

श्री वल्लभाचार्य

🌸 स्तोत्र

वल्लभाचार्य महाप्रभु द्वारा रचित यह अष्टक पुष्टि-मार्ग एवं वैष्णव भक्ति-साहित्य का मधुरतम रत्न है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के अधर, नयन, हँसी, चाल, वेश और लीलाओं के प्रत्येक अंग को मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् घोषित किया गया है।

मधुराष्टकम्

वल्लभाचार्य महाप्रभु द्वारा रचित यह अष्टक पुष्टि-मार्ग एवं वैष्णव भक्ति-साहित्य का मधुरतम रत्न है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण के अधर, नयन, हँसी, चाल, वेश और लीलाओं के प्रत्येक अंग को मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् घोषित किया गया है।

॥ श्री कृष्णाय नमः ॥
॥ अथ श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचितं मधुराष्टकम् ॥
पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक महाप्रभु श्रीमद्वल्लभाचार्य द्वारा विरचित 'मधुराष्टकम्' भगवान श्रीकृष्ण के रूप, वाणी, लीला, वेश और स्वभाव की अनुपम माधुरी का विशुद्ध भक्तिमय वर्णन करता है।
॥ १ ॥
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥ १ ॥
अर्थ : मधुराधिपति भगवान श्रीकृष्ण के ओष्ठ (अधर) मधुर हैं, उनका मुखमण्डल मधुर है, उनके नयन मधुर हैं, उनकी मन्द मुस्कान मधुर है, उनका हृदय मधुर है और उनकी चाल (गमन) भी मधुर है — उन माधुर्य के स्वामी का सब कुछ ही मधुर है!
॥ २ ॥
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम्।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥ २ ॥
अर्थ : उनकी वाणी मधुर है, उनका चरित्र मधुर है, उनके पीताम्बर वस्त्र मधुर हैं, उनकी भाव-भंगिमाएं मधुर हैं, उनका चलना मधुर है और उनका घूमना भी मधुर है — उन मधुराधिपति का सब कुछ ही मधुर है!
॥ ३ ॥
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥ ३ ॥
अर्थ : उनकी बांसुरी (वेणु) की तान मधुर है, उनके श्रीअंग की धूलि (रेणु) मधुर है, उनके कर-कमल मधुर हैं, उनके चरण-कमल मधुर हैं, उनका दिव्य नृत्य मधुर है और उनकी मित्रता (सख्य) भी मधुर है — उन मधुराधिपति का सब कुछ ही मधुर है!
॥ ४ ॥
गानं मधुरं पानं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम्।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥ ४ ॥
अर्थ : उनका गायन मधुर है, उनका जलपान मधुर है, उनका भोजन (माखन-मिश्री भोग) मधुर है, उनका शयन मधुर है, उनका अनुपम रूप-सौन्दर्य मधुर है और उनके ललाट का कस्तूरी तिलक भी मधुर है — उन मधुराधिपति का सब कुछ ही मधुर है!
॥ ५ ॥
करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम्।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥ ५ ॥
अर्थ : उनके समस्त कार्य (लीलाएं) मधुर हैं, उनका उद्धार करना (भवतारण) मधुर है, उनका चित्त चुराना (माखन-हरण) मधुर है, उनका विहार (रास-रमण) मधुर है, उनके उद्गार मधुर हैं और उनका शांत स्वरूप भी मधुर है — उन मधुराधिपति का सब कुछ ही मधुर है!
॥ ६ ॥
गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥ ६ ॥
अर्थ : उनकी गुंजा की माला मधुर है, उनकी वनमाला मधुर है, श्रीयमुना जी मधुर हैं, यमुना की चंचल लहरें मधुर हैं, यमुना का पावन जल मधुर है और उसमें खिले हुए कमल भी मधुर हैं — उन मधुराधिपति का सब कुछ ही मधुर है!
॥ ७ ॥
गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम्।
दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥ ७ ॥
अर्थ : उनकी गोपियां मधुर हैं, उनकी दिव्य लीलाएं मधुर हैं, उनका संयोग मधुर है, उनका वियोग मधुर है, उनकी कृपादृष्टि मधुर है और उनका शिष्टाचार भी मधुर है — उन मधुराधिपति का सब कुछ ही मधुर है!
॥ ८ ॥
गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥ ८ ॥
अर्थ : उनके सखा ग्वालबाल (गोप) मधुर हैं, उनकी गौएं मधुर हैं, उनकी चराने की लाठी (यष्टि) मधुर है, उनकी रची हुई सम्पूर्ण सृष्टि मधुर है, उनका असुरों का दलन करना मधुर है और उनका कृपा-फल प्रदान करना भी मधुर है — उन मधुराधिपति भगवान श्रीकृष्ण का तो सब कुछ ही अत्यंत मधुर है!
॥ इति श्रीमद्वल्लभाचार्यविरचितं मधुराष्टकं सम्पूर्णम् ॥