महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम्
आदि शङ्कराचार्य
आदि शंकराचार्य कृत अयि गिरिनन्दिनि के रूप में विख्यात यह स्तोत्र संस्कृत साहित्य के नाद-सौन्दर्य का चरम शिखर है। इसमें चामर छन्द की गूँजती लय और अनुप्रास द्वारा महिषासुर-मर्दिनी जगन्माता के पराक्रम का वर्णन है।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ अथ श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् ॥
॥ अथ श्री महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् ॥
श्रीमज्जगद्गुरु आदिशङ्कराचार्य विरचित यह २१ पदों वाला परम ओजस्वी स्तोत्र भगवती दुर्गा के पराक्रम, करुणा और महिषासुर-मर्दन स्वरूप की अलौकिक वंदना करता है।
॥ १ ॥
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दसुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १ ॥
अर्थ :
हे गिरिराज हिमालय की पुत्री! सम्पूर्ण पृथ्वी को आनन्दित करने वाली, जगत को अपनी दिव्य लीलाओं से प्रसन्न रखने वाली, नन्दबाबा की कन्या के रूप में अवतरित होने वाली! विन्ध्याचल पर्वत के शिखर पर निवास करने वाली, भगवान विष्णु को आह्लादित करने वाली, इन्द्रदेव द्वारा पूजित, नीलकण्ठ महादेव की अर्धाङ्गिनी, सम्पूर्ण चराचर जगत को अपना कुटुम्ब मानने वाली और अपार कृपा बरसाने वाली हे शैलपुत्री! सुन्दर जटाजूट धारण करने वाली हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी सदा जय हो, जय हो!
॥ २ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते।
दनुजनिकोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ २ ॥
अर्थ :
देवताओं पर वरदानों की वर्षा करने वाली, दुर्धर्ष दैत्यों का दमन करने वाली, दुर्मुख जैसे उद्दण्ड असुरों का नाश कर संतों को हर्षित करने वाली! तीनों लोकों का पोषण करने वाली, भगवान शिव को सन्तुष्ट करने वाली, पापों का हरण करने वाली, वीरों के गर्जन से युक्त, दानवों पर क्रोध करने वाली और दुर्दान्त अभिमानियों का मद चूर करने वाली हे क्षीरसागर-तनया! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ ३ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ३ ॥
अर्थ :
हे सम्पूर्ण जगत की माता! हे मेरी जननी! कदम्ब के सघन वनों में रमण करने वाली, मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरने वाली! पर्वतों के मुकुटमणि विशाल हिमालय के उत्तुङ्ग शिखरों पर अपने दिव्य भवन में विराजने वाली! मधु के समान मधुर स्वभाव वाली, मधु और कैटभ दैत्यों का संहार करने वाली, आनन्दमयी रास में लीन रहने वाली हे माँ! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी सदा जय हो!
॥ ४ ॥
अयि शतखण्डविखण्डितरुण्डवितुण्डितशुण्डगजाधिपते
रिपुगजगण्डविदारणचण्डपराक्रमशौण्डमृगाधिपते।
निजभुजदण्डनिपातितखण्डविपातितमुण्डभटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ४ ॥
अर्थ :
शत्रुओं के शरीरों को सैकड़ों खण्डों में विदीर्ण करने वाली, उन्मत्त ऐरावत जैसे दिग्गज हाथियों की सूंडों को काट डालने वाली! अपने वाहन सिंह के प्रचण्ड पराक्रम से शत्रु-हाथियों के गण्डस्थलों को विदीर्ण कराने वाली तथा अपनी बलशाली भुजाओं के प्रहार से दुष्ट सेनापतियों के शीश काट गिराने वाली हे भगवती! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ ५ ॥
अयि रणदुर्मदशत्रुवधोदितदुर्धरनिर्जरशक्तिभृते
चतुरविचारधुरीणमहाशिवदूतकृतप्रमथाधिपते।
दुरितदुरीहदुराशयदुर्मतिदानवदूतकृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ५ ॥
अर्थ :
युद्ध में मदोन्मत्त शत्रुओं का संहार करने के लिए देवताओं की अमोघ शक्तियों को धारण करने वाली! अत्यन्त चतुर एवं विचारशील देवाधिदेव शिवजी को अपना दूत बनाकर भेजने वाली तथा दुष्ट, दुराचारी एवं दुर्बुद्धि दानव-दूतों का यमराज के समान संहार करने वाली हे माँ! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ ६ ॥
अयि शरणागतवैरिवधूवरवीरवराभयदायकरे
त्रिभुवनमस्तकशूलविरोधिशिरोऽधिकृतामलशूलकरे।
दुमिदुमितामरदुन्दुभिनादमहोमुखरीकृततिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ६ ॥
अर्थ :
शरण में आए हुए शत्रुओं की पत्नियों के सुहाग की रक्षा करने वाली और अपने भक्तों को अभयदान देने वाली! तीनों लोकों को पीड़ा पहुँचाने वाले दुष्टों के शीश पर अपने दिव्य त्रिशूल से प्रहार करने वाली तथा देवताओं की दुन्दुभियों के 'दुमि-दुमि' गंभीर घोष से दिशाओं को गुंजायमान करने वाली हे माँ! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ ७ ॥
अयि निजहुङ्कृतिमात्रनिराकृतधूम्रविलोचनधूम्रशते
समरविशोषितशोणितबीजसमुद्भवशोणितबीजलते।
शिवशिवशुम्भनिशुम्भमहाहवतर्पितभूतपिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ७ ॥
अर्थ :
अपनी एकमात्र हुंकार से ही धूम्रलोचन और उसकी विशाल सेना को भस्म कर देने वाली! युद्धभूमि में गिरे रक्त से उत्पन्न होने वाले रक्तबीज के रक्त की एक-एक बूंद को पीकर उसकी वंश-लता को समाप्त करने वाली तथा शुम्भ-निशुम्भ के महायुद्ध में रक्त-मांस से भूत-पिशाचों को तृप्त करने वाली हे माँ! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ ८ ॥
धनुरनुषङ्गिरणक्षणसङ्गपरिस्फुरदङ्गनटत्कटके
कनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्गवसद्भटशृङ्गहतावटुके।
कृतचतुरङ्गबलक्षितिरङ्गघटद्बहुरङ्गरटत्कटके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ८ ॥
अर्थ :
धनुष पर बाण चढ़ाते समय युद्ध के क्षणों में जिनकी कलाई के कंगन झंकृत होकर नृत्य करते हैं, जिनके सुवर्णमयी तरकश से निकले तीक्ष्ण बाणों से बड़े-बड़े योद्धा धाराशायी हो जाते हैं और जो युद्धभूमि में चतुरंगिणी सेना के विविध रंगों के व्यूह को नष्ट कर देती हैं, हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ ९ ॥
जय जय जप्यजये जयशब्दपरस्तुतितत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमिझिङ्कृतनूपुरशिञ्जितमोहितभूतपते।
नटितनटार्धनटीपटुनायकनाटितनाट्यसुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ९ ॥
अर्थ :
समस्त ब्रह्माण्ड द्वारा 'जय हो, जय हो' के मङ्गल शब्दों से स्तुति की जाने वाली! अपने नूपुरों की 'झण-झण, झिंझिम' मधुर ध्वनि से भगवान भूतनाथ शिवजी को मुग्ध करने वाली तथा अर्धनारीश्वर रूप में नटराज शिव के साथ अद्वितीय दिव्य नृत्य और गान में लीन रहने वाली हे माँ! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १० ॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनःसुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रवृते।
सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १० ॥
अर्थ :
पुष्पों के समान कोमल एवं अत्यन्त मनोहर कान्ति से युक्त, रात्रि के पूर्ण चन्द्रमा की भांति सौम्य और प्रकाशवान मुखमण्डल वाली तथा भौरों के समान सुन्दर, चंचल और काले नेत्रों से युक्त हे माता! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ ११ ॥
सहितमहाहवमल्लमतल्लिकमल्लितरल्लकमल्लरते
विरचितवल्लिकपल्लिकमल्लिकझिल्लिकभिल्लिकवर्गवृते।
शितकृतफुल्लसमुल्लसितारुणतल्लजपल्लवपादयुगे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ ११ ॥
अर्थ :
महायुद्ध में बड़े-बड़े पराक्रमी मल्ल योद्धाओं से युद्ध करने में समर्थ, वनवासियों, भीलों और सखियों के समुदाय से घिरी रहने वाली तथा खिले हुए लाल नवीन पल्लवों के समान परम कोमल एवं तेजस्वी चरणकमल वाली हे भगवती! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १२ ॥
अविरलगण्डगलत्तन्मेदुरमत्तमतङ्गजराजपते
त्रिभुवनभूषणभूतकलानिधिरूपपयोनिधिराजसुते।
अयि सुदतीजनलालसमानसमोहनमन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १२ ॥
अर्थ :
मदोन्मत्त गजराजों के समान ऐश्वर्यशाली, तीनों लोकों के आभूषणरूप चन्द्रमा की कान्ति से युक्त, समुद्र की पुत्री के समान सुन्दरी और कामदेव को भी मोहित करने वाले अनुपम रूप-लावण्य से सम्पन्न हे देवी! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १३ ॥
कमलदलामलकोमलगान्तिकलाकलितामलभालतले
सकलविलासकलानिलयक्रमकेलिचलत्कलहंसकुले।
अलिकुलसङ्कुलकुवलयमण्डलमौलिलसद्बकुलावृतये
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १३ ॥
अर्थ :
कमल की पंखुड़ी के समान निर्मल, कोमल और कलापूर्ण ललाट वाली, समस्त कलाओं का आश्रय स्थल, कलहंसों की भांति मन्द-मन्द चलने वाली तथा भौरों से घिरे नीलोत्पल और मौलसिरी के महकते पुष्पों से सुसज्जित केशपाश वाली हे माँ! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १४ ॥
करमुरलीरववीजितकूजितकोकिलमञ्जुमते
मिलितपुलिन्दमनोहरगुञ्जितरञ्जितशैलनिकुञ्जगते।
निजगुणभूतमनोज्ञगुणार्णवतावितसद्गुणगण्यरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १४ ॥
अर्थ :
हाथ में मुरली की मधुर तान से कोयल की कूक के समान मीठा बोलने वाली, पर्वत की निकुञ्जों में वनवासियों के साथ प्रेमपूर्वक विचरण करने वाली तथा समस्त सद्गुणों के महासागर स्वरूप हे माँ! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १५ ॥
कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूखतिरस्कृतचन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुरमौलिमणिस्फुरदंशुलसन्नखचन्द्ररुचे।
जितकनकाचलमौलिमदोर्जितनिर्भरकुञ्जरकुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १५ ॥
अर्थ :
कमर में पहने हुए पीले रेशमी वस्त्र की दिव्य आभा से चन्द्रमा की प्रभा को भी लज्जित करने वाली, नतमस्तक हुए देव-दानवों के मुकुटों की मणियों से जिनके चरण-नखों की चन्द्र-कान्ति और अधिक चमक उठती है, ऐसी हे जगदम्ब! हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १६ ॥
विजितसहस्रकरैकसहस्रकरैकसहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारकसंगरतारकसूनुशरोरकसङ्गरते।
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १६ ॥
अर्थ :
सहस्रों सूर्यों के समान तेजस्वी, सहस्रों भुजाओं वाले देवताओं द्वारा पूजित, तारकासुर के साथ युद्ध में स्वामी कार्तिकेय को विजयी बनाने वाली तथा करुणा की साक्षात मूर्ति हे कल्याणी माँ! जो भक्त प्रतिदिन आपके चरणकमलों की सेवा करता है, उसका कल्याण निश्चित है। हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १७ ॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं स शिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १७ ॥
अर्थ :
हे दयामयी शिवे! जो मनुष्य प्रतिदिन आपके चरणकमलों की आराधना करता है, वह स्वयं लक्ष्मी का निवासस्थान क्यों न बन जाए? हे माता! आपके चरण ही परम पद हैं — ऐसा निरंतर ध्यान करने वाले मुझ सेवक का कल्याण क्यों नहीं होगा? हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १८ ॥
कनकगलत्तुलसिन्धुजलैरनुषिञ्चिनुते गुणरङ्गभुवं
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखम्।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासिरतं
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १८ ॥
अर्थ :
जो भक्त सुवर्ण कलश से लाए गए पवित्र गंगाजल से आपके मन्दिर का अभिषेक करता है, वह देवराज इन्द्र के समान सम्पूर्ण सुखों और ऐश्वर्य को प्राप्त करता है। हे माँ! मैं आपके उन चरणों की शरण लेता हूँ जिनकी देवता भी निरंतर वन्दना करते हैं। हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ १९ ॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखीसुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ १९ ॥
अर्थ :
जो भक्त आपके निर्मल चन्द्रमा के समान तेजस्वी मुखमण्डल का ध्यान करता है, क्या वह स्वर्ग की अप्सराओं के सौन्दर्य से कभी विचलित हो सकता है? हे शिव नाम के धन से सम्पन्न माँ! आपकी कृपा प्राप्त होने पर मनुष्य के लिए संसार में क्या अप्राप्य रह जाता है? हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ २० ॥
अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुरितासि रते।
यदचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुरु
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ २० ॥
अर्थ :
हे उमा! मुझ दीन पर दया करके आप सदैव कृपालु रहें। आप सम्पूर्ण जगत की जननी हैं और स्वभाव से ही परम कृपामयी हैं। हे माँ! मुझसे जो भी त्रुटि हुई हो उसे क्षमा करें और मेरे जीवन के घोर संताप एवं कष्टों को दूर कर दें। हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो!
॥ २१ ॥
कमलाकान्तकलत्रकलाधरकान्तकलानिधिपूज्यपदे
शितिकण्ठकृपामृतसारपरिस्रुतकान्तिकलाभरिते।
नितरां च सुरासुरसिद्धमुनीन्द्रगणैरभिवन्दितपादयुगे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥ २१ ॥
अर्थ :
भगवान विष्णु, लक्ष्मीजी, चन्द्रशेखर शिव तथा समस्त देवताओं द्वारा पूजित चरणकमलों वाली, देवाधिदेव महादेव के कृपामृत से परिपूर्ण तथा सुर, असुर, सिद्ध एवं मुनिगणों द्वारा वन्दित हे जगदम्ब! हे महिषासुरमर्दिनी शैलपुत्री! आपकी सदा-सर्वदा जय हो, जय हो, जय हो!
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥