श्री मन्दाकिनी (पयस्विनी) स्तोत्रम्
महर्षि वाल्मीकि (श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण)
चित्रकूट धाम में महासती अनुसूया के तपोबल से प्रकट हुई पावन देवनदी मन्दाकिनी (पयस्विनी) के तट पर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मणजी ने वनवास काल व्यतीत किया था। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड (सर्ग ९५) में भगवान श्रीराम स्वयं माता सीता को मन्दाकिनी के दिव्य सौन्दर्य, निर्मल जल, तटवर्ती ऋषियों के तपोमय जीवन तथा मोक्षदायिनी महिमा का दर्शन कराते हैं। चित्रकूट के रामघाट पर स्नान व दीपदान करते समय इसका नित्य पाठ किया जाता है।
॥ श्रीजानकीरामाभ्यां नमः ॥
॥ अथ श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे मन्दाकिनीवर्णनम् (मन्दाकिनी स्तोत्रम्) ॥
(अयोध्याकाण्ड — सर्ग ९५)
॥ १ ॥
विचित्रपुलिनां रम्यां हंससारससेविताम्।
कुसुमैरुपसम्पन्नां पश्य मन्दाकिनीं नदीम्॥ १ ॥
अर्थ :
(श्रीराम सीताजी से कहते हैं): हे प्रिये सीते! रंग-बिरंगे बालू के तटों से युक्त, हंस और सारस पक्षियों द्वारा सुशोभित तथा खिले हुए कमलों और पुष्पों से आच्छादित इस परम रमणीक मन्दाकिनी नदी को देखो।
॥ २ ॥
नानाविधैस्तीरुहैर्वृतां पुष्पफलद्रुमैः।
राजन्तीं राजराजस्य नलिनीमिव सर्वतः॥ २ ॥
अर्थ :
यह नदी दोनों तटों पर उगे हुए अनेक प्रकार के फल-फूलों से लदे वृक्षों से घिरी हुई ऐसी शोभा पा रही है, मानो कुबेर की नन्दन-कानन स्थित दिव्य नलिनी (कमल-सरोवर) हो।
॥ ३ ॥
क्वचिन्मणिनिकाशोदां क्वचित्पुलिनशालिनीम्।
क्वचित् सिद्धजनाकीर्णां पश्य मन्दाकिनीं नदीम्॥ ३ ॥
अर्थ :
कहीं मणियों के समान पारदर्शी और निर्मल जल वाली, कहीं मनोहर रेतीले किनारों से शोभित और कहीं तपस्वी सिद्ध मुनियों से सेवित इस पावन मन्दाकिनी को निहारो।
॥ ४ ॥
पश्य संफुल्लविटपान् मारुतोद्धूतमारुतान्।
पादपान् पुष्पपत्राणि सृजतो विविधोदके॥ ४ ॥
अर्थ :
देखो, मन्द-सुगन्धित पवन के झकोरों से हिलती हुई शाखाओं वाले ये वृक्ष अपने रंग-बिरंगे पुष्पों और पत्तों की वर्षा मन्दाकिनी के पावन जल में कर रहे हैं।
॥ ५ ॥
क्वचित् स्तिमितगम्भीरां क्वचिद्वेगवदाकुलाम्।
क्वचित् तीररुहैश्छन्नां पश्य मन्दाकिनीं नदीम्॥ ५ ॥
अर्थ :
कहीं शांत और गम्भीर प्रवाह वाली, कहीं चंचल लहरों के वेग से अठखेलियाँ करती हुई तथा कहीं तटवर्ती लता-कुञ्जों से आच्छादित इस पुण्यमयी मन्दाकिनी के दिव्य रूप को देखो।
॥ ६ ॥
ऋषयश्च महात्मानः सन्ध्यावन्दनतत्पराः।
अवगाहन्ति तीर्थेषु मन्दाकिन्यां शुभाशयाः॥ ६ ॥
अर्थ :
पवित्र अन्तःकरण वाले महात्मा ऋषि-मुनि त्रिकाल सन्ध्या-वन्दन में तत्पर होकर इस मन्दाकिनी के पावन तीर्थों में भक्तिपूर्वक स्नान और अवगाहन कर रहे हैं।
॥ ७ ॥
चित्रकूटस्य रम्यस्य पार्श्वे वहति पाविनी।
पापराशिं हरन्ती सा मन्दाकिनी विराजते॥ ७ ॥
अर्थ :
मनोहर चित्रकूट पर्वत के पार्श्व भाग से होकर प्रवाहित होने वाली यह परम पाविनी नदी अपने स्पर्श और दर्शन मात्र से जीवों के जन्म-जन्मान्तरों के पाप-समूहों का हरण कर लेती है।
॥ ८ ॥
मन्दाकिन्यां यदा स्नातो नरो भक्त्या समन्विता।
सर्वपापविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति॥ ८ ॥
अर्थ :
जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से परिपूर्ण होकर इस मन्दाकिनी नदी में स्नान करता है; वह समस्त पापों से मुक्त होकर अन्त में भगवान् श्रीराम के परम धाम (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
॥ इति श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणे अयोध्याकाण्डे मन्दाकिनीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ नमः पयस्विन्यै मन्दाकिन्यै ॥