मुण्डकोपनिषद्
अथर्ववेद (शौनक शाखा)
अथर्ववेद के इस उपनिषद् में महर्षि अंगिरा ने शौनक को परा और अपरा विद्या का भेद समझाया है। भारत का राष्ट्र-वाक्य सत्यमेव जयते इसी उपनिषद् की देन है, तथा यहाँ जीवात्मा और परमात्मा के द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया रूपक का अमर वर्णन है।
॥ श्रीहरिः ॥
॥ अथ मुण्डकोपनिषद् ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायूः।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ :
हे देवगण! हम कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, नेत्रों से मंगलमय स्वरूप देखें। सुदृढ़ देह से प्रभु-स्तुति करते हुए देव-निर्धारित आयु प्राप्त करें। यशस्वी इन्द्र, सर्वज्ञ पूषा, अविनाशी गरुड़ और देवगुरु बृहस्पति हमारा कल्याण करें। त्रिविध तापों की शान्ति हो।
॥ प्रथमं मुण्डकम् — प्रथमः खण्डः ॥
॥ परा एवं अपरा विद्या का निरूपण ॥
॥ १ ॥
ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह॥
अर्थ :
समस्त देवताओं में सर्वप्रथम ब्रह्मा जी प्रकट हुए, जो इस सम्पूर्ण जगत के रचयिता और भुवनों के रक्षक हैं। उन्होंने समस्त विद्याओं की आधारभूता 'ब्रह्मविद्या' का उपदेश अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को दिया। अथर्वा ने अंगिर को, अंगिर ने भारद्वाज सत्यवाह को, और सत्यवाह ने महर्षि अंगिरा को यह पावन विद्या प्रदान की।
॥ २ ॥
शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ —
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति॥
अर्थ :
गृहस्थ ऋषियों में श्रेष्ठ महाशालाधिपति शौनक ने शास्त्रीय विधिपूर्वक समिधा लेकर महर्षि अंगिरा के चरणों में उपस्थित होकर पूछा — 'हे भगवन्! वह कौन सा एक तत्त्व है, जिसके जान लिए जाने पर यह सम्पूर्ण जगत यथार्थ रूप से जान लिया जाता है?'
॥ ३ ॥
तस्मै स होवाच — द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च॥
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति।
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते॥
अर्थ :
महर्षि अंगिरा ने कहा — 'ब्रह्मवेत्ताओं का कथन है कि जानने योग्य दो विद्याएँ हैं — एक "अपरा विद्या" (लौकिक ज्ञान) और दूसरी "परा विद्या" (आध्यात्मिक परम ज्ञान)। इनमें से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष — ये सब अपरा विद्या हैं। और परा विद्या वह है, जिसके द्वारा उस अविनाशी परम अक्षर ब्रह्म का साक्षात् अनुभव किया जाता है।'
॥ ४ ॥
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्।
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः॥
अर्थ :
जो इन्द्रियों से अदृश्य है, बुद्धि से अग्राह्य है, जिसका कोई कुल या जाति नहीं है, जिसका कोई वर्ण (रूप-रंग) नहीं है, जिसके आँख और कान नहीं हैं, जिसके हाथ और पैर नहीं हैं; जो नित्य, सर्वसमर्थ, सर्वव्यापी, अति सूक्ष्म और अविनाशी है — उस समस्त प्राणियों के मूल कारण (भूतयोनि) परब्रह्म का विवेकशील धीर पुरुष सर्वत्र साक्षात् दर्शन करते हैं।
॥ ५ ॥
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्॥
अर्थ :
जैसे मकड़ी अपने ही भीतर से जाले को निकालती है और पुनः उसे अपने में समेट लेती है; जैसे पृथ्वी से नाना प्रकार की औषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं; और जैसे जीवित मनुष्य के शरीर से केश और रोम स्वतः उत्पन्न होते हैं — ठीक वैसे ही उस अविनाशी परब्रह्म से यह सम्पूर्ण चराचर ब्रह्माण्ड प्रकट होता है।
॥ प्रथमं मुण्डकम् — द्वितीयः खण्डः ॥
॥ सकाम कर्मकाण्ड की सीमा एवं गुरु-शरण ॥
॥ ६ ॥
प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म।
एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरां मृत्युं ते पुनरेवापियन्ति॥
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥
अर्थ :
सोलह ऋत्विज, यजमान और उसकी पत्नी — इन अठारह अंगों वाले ये सकाम यज्ञ-रूप कर्म अत्यन्त निर्बल नौकाएँ (प्लव) हैं, जो भवसागर से पार नहीं उतार सकते। जो मूढ़जन केवल इन्हीं सकाम कर्मों को सर्वश्रेष्ठ मानकर इनमें लिप्त रहते हैं, वे बारम्बार बुढ़ापे और मृत्यु के चक्र में भटकते हैं। अविद्या के अन्धकार में डूबे हुए, स्वयं को बहुत बुद्धिमान और पण्डित मानने वाले ऐसे लोग वैसे ही ठोकरें खाते हुए भटकते हैं, जैसे अन्धे के पीछे चलने वाले अन्धे गड्ढे में गिर पड़ते हैं।
॥ ७ ॥
परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥
अर्थ :
कर्मों द्वारा अर्जित समस्त सांसारिक एवं स्वर्गीय लोकों की नश्वरता का सम्यक् विचार करके विवेकशील ब्राह्मण को वैराग्य (निर्वेद) प्राप्त कर लेना चाहिए; क्योंकि अनित्य कर्मों से कभी नित्य ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती। उस नित्य आत्म-तत्त्व के यथार्थ ज्ञान के लिए साधक को हाथ में समिधा लेकर वेदों के ज्ञाता (श्रोत्रिय) और ब्रह्म में पूर्ण प्रतिष्ठित (ब्रह्मनिष्ठ) सद्गुरु की ही शरण में जाना चाहिए।
॥ द्वितीयं मुण्डकम् — प्रथमः खण्डः ॥
॥ विराट् पुरुष एवं सृष्टि-विस्तार ॥
॥ ८ ॥
तदेतत् सत्यं यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः।
तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति॥
अर्थ :
यह परम सत्य है — जैसे प्रज्वलित अग्नि से उसी के समान रूप वाली सहस्रों चिनगारियाँ फूट पड़ती हैं, वैसे ही हे प्रिय! उस अविनाशी परब्रह्म से नाना प्रकार के चर-अचर जीव प्रकट होते हैं और प्रलयकाल में पुनः उसी में विलीन हो जाते हैं।
॥ ९ ॥
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यो दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः।
वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा॥
अर्थ :
द्युलोक (स्वर्ग) जिसका मस्तक है, सूर्य और चन्द्रमा जिसके दोनों नेत्र हैं, दिशाएँ जिसके कान हैं, प्रकट वेद जिसकी वाणी हैं, वायु जिसका प्राण है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिसका हृदय है, और पृथ्वी जिसके चरण हैं — वही विराट् पुरुष सम्पूर्ण प्राणियों का अन्तरात्मा है।
॥ द्वितीयं मुण्डकम् — द्वितीयः खण्डः ॥
॥ ओंकार-धनुष का रूपक एवं परम ज्योति ॥
॥ १० ॥
धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिधितं संधयीत।
आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि॥
अर्थ :
उपनिषदों में वर्णित 'प्रणव' (ओंकार) रूपी महान अस्त्र धनुष को ग्रहण करके, उस पर निरन्तर उपासना द्वारा तीक्ष्ण किए गए आत्म-रूपी बाण का संधान करो। अपने चित्त को उस परमात्मा के भाव में पूर्णतया एकाग्र करके खींचते हुए, हे प्रिय! उस अविनाशी परब्रह्म को ही अपना लक्ष्य वेधो।
॥ ११ ॥
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥
अर्थ :
'प्रणव' (ॐ) ही धनुष है, 'जीवात्मा' ही बाण है, और 'परब्रह्म' ही उसका परम लक्ष्य कहा गया है। प्रमाद-रहित होकर पूर्ण एकाग्रता से इस लक्ष्य का वेधन करना चाहिए; और जैसे बाण लक्ष्य में धँसकर एक हो जाता है, वैसे ही साधक को ब्रह्म में तन्मय (एकीभूत) हो जाना चाहिए।
॥ १२ ॥
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
अर्थ :
उस कार्य और कारण रूप, श्रेष्ठ से भी अति श्रेष्ठ परब्रह्म का साक्षात् दर्शन हो जाने पर साधक के हृदय की अविद्या-रूपी समस्त गाँठें खुल जाती हैं, उसके समस्त संशय सदा के लिए छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, और उसके अनादि काल के संचित कर्मों के बन्धन पूर्णतया क्षीण हो जाते हैं।
॥ १३ ॥
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
अर्थ :
वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारे चमकते हैं, न यह बिजली चमकती है, फिर इस लौकिक अग्नि की तो बात ही क्या! उसी स्वयं-प्रकाशमान परमात्मा के आलोकित होने पर यह सम्पूर्ण जगत प्रकाशित होता है; उसी के दिव्य तेज से यह सब कुछ भासमान हो रहा है।
॥ १४ ॥
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण।
अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्॥
अर्थ :
यह अमृतमय परब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है, ब्रह्म ही दाहिनी ओर और ब्रह्म ही बाईं ओर है। नीचे और ऊपर सर्वत्र केवल वही विस्तृत है; वास्तव में यह सम्पूर्ण श्रेष्ठ ब्रह्माण्ड साक्षात् परब्रह्म ही है।
॥ तृतीयं मुण्डकम् — प्रथमः खण्डः ॥
॥ द्वा सुपर्णा एवं 'सत्यमेव जयते' ॥
॥ १५ ॥
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
अर्थ :
सुन्दर पंखों वाले, परस्पर सखा-भाव से रहने वाले दो चेतन पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) अनादि काल से एक ही शरीर रूपी वृक्ष पर साथ-साथ वास करते हैं। उन दोनों में से एक (जीवात्मा) अपने कर्मों के अनुसार इस वृक्ष के खट्टे-मीठे फलों का उपभोग करता है, जबकि दूसरा (परमात्मा) बिना कुछ खाए केवल साक्षी-भाव से सर्वत्र देखता रहता है।
॥ १६ ॥
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः॥
अर्थ :
उसी एक शरीर-वृक्ष में फँसा हुआ जीवात्मा अपनी असमर्थता और अज्ञान के कारण मोहित होकर शोक करता रहता है। किन्तु जब वह अपने से भिन्न, नित्य सेव्य, परम समर्थ परमेश्वर का और उसकी दिव्य महिमा का साक्षात् दर्शन कर लेता है, तब वह समस्त शोकों से सर्वथा मुक्त हो जाता है।
॥ १७ ॥
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।
येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥
अर्थ :
सत्य की ही सदा विजय होती है, असत्य की कभी नहीं। सत्य के द्वारा ही वह दिव्य 'देवयान' मार्ग विस्तृत होता है, जिससे होकर निष्काम महर्षिगण उस परम धाम में पहुँचते हैं, जहाँ सत्य का वह सर्वोच्च अक्षय भण्डार (परब्रह्म) विद्यमान है।
॥ १८ ॥
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः॥
अर्थ :
वह परमात्मा न आँखों से देखा जा सकता है, न वाणी से पकड़ा जा सकता है, न अन्य इन्द्रियों से जाना जा सकता है, और न केवल तपस्या या कर्मकाण्ड से प्राप्त किया जा सकता है। जब विवेक-ज्ञान की निर्मलता से साधक का अन्तःकरण पूर्ण विशुद्ध हो जाता है, तब वह ध्यानमग्न होकर उस अखण्ड, अवयव-रहित परमेश्वर का साक्षात् दर्शन करता है।
॥ तृतीयं मुण्डकम् — द्वितीयः खण्डः ॥
॥ ब्रह्म-साक्षात्कार एवं अमृतत्व ॥
॥ १९ ॥
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम्॥
अर्थ :
यह परमात्मा न केवल शास्त्र-प्रवचनों से प्राप्त होता है, न कुशाग्र बुद्धि से, और न बहुत सुनने से मिलता है। जिसको यह परमात्मा स्वयं वरण (स्वीकार) करता है, उसी के द्वारा वह प्राप्त होता है; उसके सम्मुख यह परमात्मा अपने वास्तविक दिव्य स्वरूप को प्रकट कर देता है।
॥ २० ॥
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात्।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम॥
अर्थ :
यह आत्म-तत्त्व आत्मिक बल से हीन (कायर या दुर्बल) मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता, न असावधानी (प्रमाद) से और न संन्यास-रहित केवल बाह्य तप से प्राप्त होता है। किन्तु जो ज्ञानी साधक इन सम्यक् उपायों (धैर्य, एकाग्रता और सच्चे त्याग) से यत्न करता है, उसका यह आत्मा साक्षात् ब्रह्म-धाम में प्रवेश कर जाता है।
॥ २१ ॥
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय।
तथा विद्वानामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥
अर्थ :
जैसे कलकल बहती हुई नदियाँ समुद्र में मिलकर अपने नाम और रूप दोनों को त्यागकर उसी में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही आत्मज्ञानी महापुरुष अपने नश्वर नाम-रूप के बन्धनों से सर्वथा मुक्त होकर परात्पर दिव्य परम पुरुष परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
॥ २२ ॥
स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति।
तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति॥
अर्थ :
जो पुरुष उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह साक्षात् ब्रह्म ही हो जाता है (ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति)। उसके कुल में कोई भी ब्रह्म-ज्ञान से हीन नहीं होता। वह सम्पूर्ण शोकों को पार कर जाता है, समस्त पापों को पार कर जाता है, हृदय की अविद्या-जनित गाँठों से मुक्त होकर अमर हो जाता है।
॥ इति अथर्ववेदीया मुण्डकोपनिषद् सम्पूर्णा ॥