॥ श्रीहरिः ॥
नवग्रह स्तोत्रम्

नवग्रह स्तोत्रम्

महर्षि वेदव्यास

🌸 स्तोत्र

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह नवग्रह स्तोत्र सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु—इन नौ ग्रहों के अनिष्ट प्रभावों की शान्ति, आरोग्य तथा सर्व-सम्पदा की प्राप्ति हेतु नित्य पठनीय है।

नवग्रह स्तोत्रम्

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह नवग्रह स्तोत्र सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु—इन नौ ग्रहों के अनिष्ट प्रभावों की शान्ति, आरोग्य तथा सर्व-सम्पदा की प्राप्ति हेतु नित्य पठनीय है।

॥ श्रीनवग्रहेभ्यो नमः ॥
॥ अथ नवग्रह स्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीनवग्रहस्तोत्रस्य महर्षि वेदव्यास ऋषिः, नवग्रहा देवताः, अनुष्टुप् छन्दः, नवग्रह-प्रसादसिद्ध्यर्थे सर्वारिष्ट-शान्त्यर्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ १ ॥
जपाकुसुमसंकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥ १ ॥
अर्थ : (१. सूर्य स्तुति) — जपा के लाल पुष्प के समान कान्ति वाले, महर्षि कश्यप के तेजस्वी पुत्र, महान् दीप्तिमान्, अन्धकार के शत्रु और सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाले भगवान् दिवाकर (सूर्यदेव) को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ २ ॥
दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥ २ ॥
अर्थ : (२. चन्द्र स्तुति) — दही, शंख और हिम के समान श्वेत कान्ति वाले, क्षीरसागर से उत्पन्न होने वाले, और देवाधिदेव भगवान् शंकर के मस्तक के मुकुट-भूषण भगवान् चन्द्रमा (सोम) को मैं नमस्कार करता हूँ।
॥ ३ ॥
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥ ३ ॥
अर्थ : (३. मङ्गल स्तुति) — पृथ्वी देवी के गर्भ से उत्पन्न, चमकती हुई बिजली के समान लाल कान्ति वाले, कुमार (कार्तिकेय स्वरूप), और हाथ में शक्ति नामक अस्त्र धारण करने वाले मंगल ग्रह (भौम) को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ ४ ॥
प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्।
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्॥ ४ ॥
अर्थ : (४. बुध स्तुति) — प्रियंगु की कली के समान श्याम वर्ण वाले, अनुपम सौन्दर्य वाले, परम शान्त, और समस्त सौम्य सद्गुणों से सम्पन्न भगवान् चन्द्रमा के पुत्र बुध ग्रह को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ ५ ॥
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसंनिभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥ ५ ॥
अर्थ : (५. गुरु स्तुति) — समस्त देवताओं और महर्षियों के परम गुरु, शुद्ध सुवर्ण के समान पीत कान्ति वाले, ज्ञान-बुद्धि के स्वरूप, और तीनों लोकों में पूजित देवगुरु बृहस्पति को मैं नमस्कार करता हूँ।
॥ ६ ॥
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्।
सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्॥ ६ ॥
अर्थ : (६. शुक्र स्तुति) — बर्फ, कुन्द के श्वेत पुष्प और कमलनाल के समान उज्ज्वल कान्ति वाले, दैत्यों के परम गुरु, सम्पूर्ण नीति और शास्त्रों के प्रणेता, महर्षि भृगु के पुत्र शुक्राचार्य को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ ७ ॥
नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥ ७ ॥
अर्थ : (७. शनि स्तुति) — नीले अंजन (काजल) के समान श्याम कान्ति वाले, भगवान् सूर्य के पुत्र, धर्मराज यमराज के बड़े भाई, और माता छाया तथा मार्तण्ड सूर्य से उत्पन्न न्यायप्रिय शनिदेव (शनैश्चर) को मैं नमस्कार करता हूँ।
॥ ८ ॥
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्।
सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥ ८ ॥
अर्थ : (८. राहु स्तुति) — आधे शरीर वाले, महान् पराक्रमी, सूर्य और चन्द्रमा का ग्रहण कराने वाले, तथा सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न तमोगुणी राहु ग्रह को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ ९ ॥
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्॥ ९ ॥
अर्थ : (९. केतु स्तुति) — पलाश (ढाक) के लाल-धूम्र पुष्प के समान कान्ति वाले, नक्षत्रों और तारों में प्रमुख, भगवान् रुद्र के उग्र स्वरूप वाले और भयंकर तेज वाले केतु ग्रह को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ फलश्रुति ॥
॥ १० ॥
इति व्यासमुखोद्गीतं यः पठेत्सुसमाहितः।
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्नशान्तिर्भविष्यति॥
नरनारीनृपाणां च भवेद्दुःस्वप्ननाशनम्।
ऐश्वर्यमतुलं तेषामारोग्यं पुष्टिवर्धनम्॥ १० ॥
अर्थ : महर्षि वेदव्यास के मुखकमल से निकले हुए इस नवग्रह स्तोत्र का जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर दिन में अथवा रात्रि में पाठ करता है, उसके सम्पूर्ण विघ्नों की शान्ति हो जाती है; स्त्री, पुरुष और राजाओं के दुःस्वप्नों का नाश होता है; तथा उन्हें अतुल्य ऐश्वर्य, उत्तम स्वास्थ्य और पुष्टि की प्राप्ति होती है।
॥ इति श्रीव्यासविरचितं नवग्रहस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥