प्रश्नोपनिषद्
अथर्ववेद (पिप्पलाद शाखा)
अथर्ववेद के पिप्पलाद ऋषि से छः ब्रह्मजिज्ञासु ऋषियों द्वारा पूछे गए छः मौलिक प्रश्नों पर आधारित यह उपनिषद् प्राण-विद्या, सृष्टि-उत्पत्ति, स्वप्नावस्था तथा षोडशकला से युक्त पुरुष का वैज्ञानिक व दार्शनिक विवेचन करता है।
॥ श्रीहरिः ॥
॥ अथ प्रश्नोपनिषद् ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
॥ अथ प्रश्नोपनिषद् ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायूः।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिः।
व्यशेम देवहितं यदायूः।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ :
हे देवगण! हम कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, आँखों से शुभ और मंगल का दर्शन करें। सुदृढ़ अंगों से आपकी स्तुति करते हुए हम देव-निर्धारित पूर्ण आयु का उपभोग करें। यशस्वी इन्द्र, सर्वज्ञ सूर्य, अरिष्टनेमि गरुड़ और देवगुरु बृहस्पति हमारा कल्याण करें। त्रिविध तापों की शान्ति हो।
॥ प्रथमः प्रश्नः — कबन्धी कात्यायन का प्रश्न ॥
॥ सृष्टि की उत्पत्ति : प्राण और रयि ॥
॥ सृष्टि की उत्पत्ति : प्राण और रयि ॥
॥ १ ॥
ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः॥
अर्थ :
भारद्वाज के पुत्र सुकेशा, शिबि के पुत्र सत्यकाम, गर्ग-गोत्री सौर्यायणी, अश्वल के पुत्र कौसल्य, विदर्भ-देशीय भार्गव और कत्य के प्रपौत्र कबन्धी — ये छः ऋषि ब्रह्मपरायण और ब्रह्मनिष्ठ थे। वे परब्रह्म के यथार्थ ज्ञान की खोज में, हाथों में समिधा लेकर इस विश्वास के साथ पूज्य महर्षि पिप्पलाद के पास पहुँचे कि वे हमें परब्रह्म का सम्पूर्ण उपदेश देंगे।
॥ २ ॥
तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छथ यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति॥
अर्थ :
महर्षि पिप्पलाद ने उनसे कहा — 'आप सब श्रद्धा, ब्रह्मचर्य और तपस्या के साथ यहाँ एक वर्ष तक निवास कीजिए। उसके पश्चात् आप अपनी इच्छा के अनुसार जो भी प्रश्न पूछना चाहें, पूछें। यदि मैं जानूँगा, तो आपके सभी संशयों का समाधान अवश्य करूँगा।'
॥ ३ ॥
अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ — भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति॥
अर्थ :
एक वर्ष बीतने पर कबन्धी कात्यायन ने महर्षि के पास जाकर पहला प्रश्न पूछा — 'हे भगवन्! ये समस्त प्रजाएँ (प्राणी) कहाँ से और किससे उत्पन्न होती हैं?'
॥ ४ ॥
तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति॥
आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः॥
अर्थ :
महर्षि पिप्पलाद ने कहा — 'सृष्टि के स्वामी प्रजापति ने सृष्टि उत्पन्न करने की इच्छा से तप (गहन विचार) किया। उस तप के प्रभाव से उन्होंने एक युगल (जोड़ा) उत्पन्न किया — 'रयि' (पदार्थ/मूर्त प्रकृति/चन्द्रमा) और 'प्राण' (ऊर्जा/चेतन शक्ति/सूर्य)। प्रजापति ने विचार किया कि ये दोनों मिलकर अनेक प्रकार की प्रजाओं का विस्तार करेंगे। सूर्य ही साक्षात् प्राण है और चन्द्रमा ही रयि है। यह जो कुछ भी स्थूल (मूर्त) और सूक्ष्म (अमूर्त) जगत है, वह सब रयि ही है।'
॥ द्वितीयः प्रश्नः — भार्गव वैदर्भि का प्रश्न ॥
॥ देह के आधारभूत देव एवं प्राण की सर्वोच्चता ॥
॥ देह के आधारभूत देव एवं प्राण की सर्वोच्चता ॥
॥ ५ ॥
अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ — भगवन् कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रप्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति॥
अर्थ :
तत्पश्चात् विदर्भ-देशीय भार्गव ऋषि ने दूसरा प्रश्न पूछा — 'हे भगवन्! कितने देवता इस शरीर रूपी प्रजा को धारण करते हैं? उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं? और उन सबमें सबसे श्रेष्ठ (वरिष्ठ) कौन है?'
॥ ६ ॥
तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च।
ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः॥
अर्थ :
महर्षि ने उत्तर दिया — 'आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी — ये पाँच भूत; और वाणी, मन, नेत्र, श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ ही वे देव हैं जो इस शरीर को धारण करते हैं। उन सबने अभिमानपूर्वक कहा — "हम ही इस शरीर रूपी रथ को सहारा देकर धारण किए हुए हैं।"'
॥ ७ ॥
तान् वरिष्ठः प्राण उवाच — मा मोहमापद्यथाऽहमेवैतत्पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः॥
सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठामाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते।
तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठामाने सर्वा एव प्रतिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति॥
अर्थ :
तब उन सबमें श्रेष्ठ मुख्य प्राण ने उनसे कहा — 'तुम इस भ्रम में मत पड़ो! मैं ही स्वयं को पाँच रूपों में विभक्त करके इस शरीर को थामे हुए हूँ।' इन्द्रियों ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। तब मुख्य प्राण ने अप्रसन्न होकर शरीर से ऊपर निकलने का उपक्रम किया। जैसे ही प्राण ऊपर उठने लगा, वैसे ही अन्य सभी इन्द्रियाँ भी शरीर से खिंचने लगीं; और जब प्राण स्थिर हुआ, तो सब स्थिर हो गईं। जैसे मधुमक्खियाँ अपनी रानी मक्खी के उड़ने पर उड़ जाती हैं और उसके बैठने पर बैठ जाती हैं, वैसे ही वाणी, मन, नेत्र और श्रोत्र सबने प्राण की अधीनता स्वीकार कर ली और प्रसन्न होकर प्राण की स्तुति करने लगे।
॥ तृतीयः प्रश्नः — कौसल्य आश्वलायन का प्रश्न ॥
॥ प्राण की उत्पत्ति, पञ्चप्राण और गति ॥
॥ प्राण की उत्पत्ति, पञ्चप्राण और गति ॥
॥ ८ ॥
अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ — भगवन् कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीरे कथमत्मानं प्रविभज्य प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति॥
अर्थ :
तीसरे ऋषि कौसल्य आश्वलायन ने पूछा — 'हे भगवन्! यह प्राण किससे उत्पन्न होता है? यह इस शरीर में कैसे प्रवेश करता है? स्वयं को किस प्रकार विभक्त करके स्थित रहता है? किस मार्ग से शरीर से बाहर निकलता है? और बाह्य प्रकृति तथा आन्तरिक देह को किस प्रकार धारण करता है?'
॥ ९ ॥
तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि — आत्मन एष प्राणो जायते।
यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे॥
अर्थ :
महर्षि ने कहा — 'तुम अत्यन्त गूढ़ प्रश्न पूछ रहे हो। तुम ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ हो, इसलिए मैं तुम्हें बताता हूँ — यह प्राण आत्मा से उत्पन्न होता है। जैसे मनुष्य की काया के साथ उसकी छाया जुड़ी रहती है, वैसे ही यह प्राण आत्मा के आश्रित है। यह पूर्वजन्म के मानसिक संकल्पों और कर्मों के कारण इस शरीर में प्रवेश करता है।'
॥ १० ॥
पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रतिष्ठिते मध्यं तु समानः।
हृदि ह्येष आत्मा... तत्रैकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति॥
अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्॥
अर्थ :
जैसे राजा अपने अधिकारियों को भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में नियुक्त करता है, वैसे ही मुख्य प्राण अन्य प्राणों को नियुक्त करता है — मल-मूत्र के स्थानों में 'अपान' को; नेत्र, श्रोत्र, मुख और नासिका में 'प्राण' स्वयं रहता है; नाभि के मध्य में खाये-पिये अन्न को पचाने वाला 'समान' स्थित है। हृदय में आत्मा का निवास है, जहाँ १०१ मुख्य नाड़ियाँ हैं; प्रत्येक नाड़ी की १००-१०० शाखाएँ और प्रत्येक शाखा की ७२-७२ हजार उप-शाखाएँ हैं — इनमें 'व्यान' वायु विचरण करता है। और सुषुम्ना नामक एक ऊर्ध्वगामी नाड़ी से 'उदान' वायु गति करता है, जो मनुष्य को उसके पुण्य कर्मों से पुण्य-लोक में, पाप से नरक में और दोनों के सम्मिश्रण से पुनः मनुष्य-लोक में ले जाता है।
॥ चतुर्थः प्रश्नः — सौर्यायणी गार्ग्य का प्रश्न ॥
॥ जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और परम आत्मा ॥
॥ जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और परम आत्मा ॥
॥ ११ ॥
अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ — भगवन्नेतस्मिन्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति॥
अर्थ :
चौथे ऋषि सौर्यायणी गार्ग्य ने पूछा — 'हे भगवन्! इस मनुष्य शरीर में कौन सोता है? कौन जागता रहता है? वह कौन सा देव है जो स्वप्नों को देखता है? सुषुप्ति का यह असीम सुख किसको प्राप्त होता है? और यह सब कुछ किसमें भली-भाँति प्रतिष्ठित (लीन) होता है?'
॥ १२ ॥
तस्मै स होवाच — यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति... प्राणान्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति॥
अर्थ :
महर्षि ने कहा — 'हे गार्ग्य! जैसे अस्ताचल को जाते हुए सूर्य की समस्त किरणें उस तेजोमण्डल में एकीभूत हो जाती हैं और प्रातः पुनः उदय होने पर चारों ओर फैल जाती हैं, वैसे ही निद्रा के समय समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ परम देव 'मन' में विलीन हो जाती हैं। उस समय केवल पाँच प्राण-रूपी अग्नियां ही इस देह रूपी नगर में जागती रहती हैं।'
॥ १३ ॥
स यदा तेजसाऽभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति।
स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते॥
अर्थ :
'जब जीवात्मा सुषुप्ति में ब्रह्म-तेज से अभिभूत हो जाता है, तब वह कोई स्वप्न नहीं देखता; उस समय इस शरीर में अलौकिक ब्रह्मानन्द का सुख अनुभव होता है। हे प्रिय! जैसे पक्षी सांझ के समय अपने बसेरे के वृक्ष पर विश्राम के लिए लौट आते हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण प्रपञ्च उस परम अविनाशी आत्मा में प्रतिष्ठित (लीन) हो जाता है।'
॥ पञ्चमः प्रश्नः — शैब्य सत्यकाम का प्रश्न ॥
॥ ओंकार की त्रिमात्रिक साधना ॥
॥ ओंकार की त्रिमात्रिक साधना ॥
॥ १४ ॥
अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ — स यो ह वै तद्भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तमोंकारमभिध्यायीत कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति॥
अर्थ :
पाँचवें ऋषि शैब्य सत्यकाम ने पूछा — 'हे भगवन्! मनुष्यों में जो साधक अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक ओंकार (ॐ) का अनन्य ध्यान करता है, वह उसके प्रभाव से किस लोक पर विजय प्राप्त करता है?'
॥ १५ ॥
तस्मै स होवाच — एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोंकारस्तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति॥
यः पुनरेतं त्रिमात्रेणैवोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः... स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते॥
अर्थ :
महर्षि पिप्पलाद ने कहा — 'हे सत्यकाम! यह ओंकार ही परब्रह्म (निर्गुण) और अपर ब्रह्म (सगुण) दोनों है; अतः ज्ञानी साधक इसी ओंकार के आश्रय से दोनों में से किसी एक को प्राप्त करता है। जो केवल 'अकार' (प्रथम मात्रा) का ध्यान करता है, वह शीघ्र पुनः उत्तम मनुष्य-जन्म पाता है; जो 'उकार' (द्वितीय मात्रा) का ध्यान करता है, वह अन्तरिक्ष एवं चन्द्र-लोक को प्राप्त होता है; और जो तीनों मात्राओं (अ-उ-म) से युक्त इस ओंकार अक्षर द्वारा परम पुरुष का ध्यान करता है, वह सूर्य-मण्डल के दिव्य प्रकाश में पहुँचकर समस्त पापों से वैसे ही मुक्त हो जाता है जैसे सर्प अपनी केंचुल से छूट जाता है। वह उस हिरण्यगर्भ से भी परे सबके हृदय में विराजमान परम पुरुष परमात्मा का साक्षात् दर्शन करता है।'
॥ षष्ठः प्रश्नः — सुकेशा भारद्वाज का प्रश्न ॥
॥ षोडशकल पुरुष (सोलह कलाओं वाले परमात्मा) ॥
॥ षोडशकल पुरुष (सोलह कलाओं वाले परमात्मा) ॥
॥ १६ ॥
अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ — भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्याेतं प्रश्नमपृच्छत षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थेति।
तं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति... स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज।
तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति॥
अर्थ :
छठे ऋषि सुकेशा भारद्वाज ने पूछा — 'हे भगवन्! कोशल देश के राजकुमार हिरण्यनाभ ने एक बार मुझसे पूछा था — "हे भारद्वाज! क्या तुम सोलह कलाओं वाले पुरुष (षोडशकल पुरुष) को जानते हो?" मैंने उस राजकुमार से कहा — "मैं उसे नहीं जानता; यदि जानता तो तुम्हें क्यों न बताता? जो असत्य बोलता है, वह समूल नष्ट हो जाता है।" वह राजकुमार चुपचाप रथ पर बैठकर लौट गया। अब मैं आपसे पूछता हूँ कि वह सोलह कलाओं वाला पुरुष कहाँ है?'
॥ १७ ॥
तस्मै स होवाच — इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कला प्रभवन्तीति॥
अर्थ :
महर्षि पिप्पलाद ने कहा — 'हे प्रिय! वह परम पुरुष कहीं बाहर नहीं, इसी शरीर के भीतर विराजमान है, जिसमें ये सोलह कलाएँ प्रकट होती हैं।'
॥ १८ ॥
स ईक्षांचक्रे — कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति।
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः।
अन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च॥
अर्थ :
उस परम पुरुष ने विचार किया — 'किसके निकलने पर मैं भी निकल जाऊँगा, और किसके स्थित रहने पर मैं भी स्थित रहूँगा?' तब उसने 'प्राण' को रचा; प्राण से 'श्रद्धा', फिर आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी — ये पञ्चभूत रचे; फिर इन्द्रियाँ, मन और अन्न रचा; अन्न से सामर्थ्य (वीर्य), तप, मन्त्र, यज्ञ-कर्म, विविध लोक और लोकों में समस्त नाम रचे — ये ही सोलह कलाएँ हैं।
॥ १९ ॥
स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते।
एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः॥
अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः।
तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति॥
अर्थ :
जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र में पहुँचकर विलीन हो जाती हैं, और उनके नाम तथा रूप दोनों समाप्त हो जाते हैं, केवल 'समुद्र' ही कहलाता है; वैसे ही इस सर्वद्रष्टा आत्मा की ये सोलह कलाएँ परमात्मा को प्राप्त होकर उसमें लीन हो जाती हैं, उनके नाम-रूप मिट जाते हैं और केवल 'परम पुरुष' ही शेष रह जाता है। वह पुरुष कला-रहित और अमर हो जाता है। जैसे रथ के पहिये की नाभि में तीलियाँ जड़ी रहती हैं, वैसे ही जिसमें ये समस्त कलाएँ प्रतिष्ठित हैं — उस जानने योग्य परम पुरुष को जानो, जिससे मृत्यु तुम्हें कभी व्यथित न कर सके।
॥ २० ॥
तान्होवाच — एतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति।
ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति।
नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः॥
अर्थ :
महर्षि पिप्पलाद ने कहा — 'इस परब्रह्म के विषय में मैं इतना ही जानता हूँ; इससे परे अन्य कुछ नहीं है।' उन सभी ऋषियों ने महर्षि का पावन पूजन करते हुए कहा — 'आप ही हमारे सच्चे आध्यात्मिक पिता हैं, जिन्होंने हमें अज्ञान रूपी भवसागर के उस पार पहुँचा दिया है।' परम ऋषियों को बारम्बार नमस्कार है! परम ऋषियों को बारम्बार नमस्कार है!
॥ इति अथर्ववेदीया प्रश्नोपनिषद् सम्पूर्णा ॥