॥ श्रीहरिः ॥
पुरुष सूक्तम्

पुरुष सूक्तम्

ऋग्वेद (१०.९०) / यजुर्वेद (३१)

🔥 वेद

ऋग्वेद के दशम मण्डल (सूक्त ९०) का यह विश्व-प्रसिद्ध सूक्त विराट् पुरुष के स्वरूप और ब्रह्माण्डीय सृष्टि-यज्ञ का वर्णन करता है। इसमें सहस्रशीर्षा पुरुष, चारों वर्णों की उत्पत्ति तथा समस्त प्रकृति के एकात्म भाव का वैदिक निरूपण है।

पुरुष सूक्तम्

ऋग्वेद के दशम मण्डल (सूक्त ९०) का यह विश्व-प्रसिद्ध सूक्त विराट् पुरुष के स्वरूप और ब्रह्माण्डीय सृष्टि-यज्ञ का वर्णन करता है। इसमें सहस्रशीर्षा पुरुष, चारों वर्णों की उत्पत्ति तथा समस्त प्रकृति के एकात्म भाव का वैदिक निरूपण है।

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
॥ अथ पुरुष सूक्तम् ॥
ॐ अस्य श्रीपुरुषसूक्तस्य नारायण ऋषिः, विराट् पुरुषो देवता, अनुष्टुप् छन्दः (अन्त्या त्रिष्टुप्), श्रीपरमपुरुष-नारायण-प्रीत्यर्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ १ ॥
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्।
स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥ १ ॥
अर्थ : वह परम विराट् पुरुष अनन्त (हजारों) सिरों वाला, अनन्त नेत्रों वाला और अनन्त चरणों वाला है। वह इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-भूमि को सब ओर से व्याप्त करके, दस अंगुल ऊपर (सम्पूर्ण सृष्टि से परे, हृदय-कमल एवं अनाहत चक्र में) भी स्थित है।
॥ २ ॥
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥ २ ॥
अर्थ : जो कुछ पहले बीत चुका है (भूतकाल) और जो कुछ आगे होने वाला है (भविष्यकाल) — यह सम्पूर्ण जगत् केवल वही विराट् पुरुष है। वह अमरत्व का भी स्वामी (ईश्वर) है, और जो कुछ अन्न (भोग्य जगत्) के द्वारा बढ़ता है, उन सबका भी वही अधिपति है।
॥ ३ ॥
एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः।
पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥ ३ ॥
अर्थ : यह दृश्य जगत् तो केवल उस परम पुरुष की महिमा का विस्तार मात्र है; वह पुरुष तो इस महिमा से भी कहीं अधिक महान् और श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण भूत-प्राणी और चराचर जगत् उसका केवल एक अंश (पाद) हैं; तथा उसके शेष तीन अंश (पाद) दिव्यरूप अमृत होकर परम व्योम में स्थित हैं।
॥ ४ ॥
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः।
ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥ ४ ॥
अर्थ : वह त्रिपाद पुरुष ऊपर (संसार से परे) स्थित रहा, और उसका एक पाद पुनः-पुनः इस सृष्टि रूप में प्रकट हुआ। तत्पश्चात् वह चेतन (भोजन करने वाले जीव) और जड़ (भोजन न करने वाले पदार्थ) — दोनों प्रकार के विश्व में सर्वत्र व्यापक हो गया।
॥ ५ ॥
तस्माद्विराडजायत विराजो अधि पूरुषः।
स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥ ५ ॥
अर्थ : उस आदि पुरुष से ब्रह्माण्ड-शरीर 'विराट्' उत्पन्न हुआ, और उस विराट् शरीर से पुनः जीव-रूप पुरुष उत्पन्न हुआ। वह प्रकट होकर सम्पूर्ण पृथ्वी और देहों से आगे बढ़ गया — पहले देहों की रचना की और फिर पीछे पृथ्वी का विस्तार किया।
॥ ६ ॥
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वन्।
वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥ ६ ॥
अर्थ : जब देवों (प्राणों और इन्द्रियों) ने उस विराट् पुरुष को ही हविष्य (आहुति-द्रव्य) मानकर मानसरूपी सृष्टि-यज्ञ का विस्तार किया; तब उस यज्ञ में वसन्त ऋतु घी (आज्य), ग्रीष्म ऋतु समिधा (ईंधन), और शरद ऋतु हवि बनी।
॥ ७ ॥
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः।
तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥ ७ ॥
अर्थ : उस सर्वप्रथम प्रकट हुए विराट् पुरुषरूपी यज्ञीय पशु का देवों ने, साध्यगणों ने और ऋषियों ने कुशा के आसन (बर्हि) पर प्रोक्षण (पवित्र संस्कार) किया; और उसी से उन्होंने सृष्टि-यज्ञ का अनुष्ठान सम्पन्न किया।
॥ ८ ॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्।
पशूंस्तांश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये॥ ८ ॥
अर्थ : उस सर्वहुत (जिसमें सब कुछ समर्पित हो गया) विराट् यज्ञ से दधि-युक्त घी (पृषदाज्य) उत्पन्न हुआ; और उसी से वायु में उड़ने वाले पक्षी, वन में रहने वाले वन्य जीव, तथा ग्रामों में पलने वाले पालतू पशु (गौ आदि) उत्पन्न हुए।
॥ ९ ॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ ९ ॥
अर्थ : उस सर्वहुत यज्ञ से ऋग्वेद की ऋचाएं और सामवेद के मन्त्र प्रकट हुए; उसी से गायत्री आदि वैदिक छन्द उत्पन्न हुए, और उसी से यजुर्वेद का प्राकट्य हुआ।
॥ १० ॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥ १० ॥
अर्थ : उस यज्ञ से घोड़े और दोनों ओर दाँत वाले अन्य पशु (गधे, खच्चर आदि) उत्पन्न हुए; उसी से गौएं उत्पन्न हुईं, और उसी से बकरियाँ तथा भेड़ें उत्पन्न हुईं।
॥ ११ ॥
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्।
मुखं किमस्य कौ बाहू कावूरू पादा उच्येते॥ ११ ॥
अर्थ : जब ऋषियों और देवों ने उस विराट् पुरुष का ध्यान किया, तब कितने रूपों में उसकी कल्पना की? उसका मुख क्या था? उसकी भुजाएं कौन थीं? उसकी जंघाएं और उसके चरण किन्हें कहा गया?
॥ १२ ॥
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥ १२ ॥
अर्थ : उस परम पुरुष का मुख ब्राह्मण (ज्ञानवान् वर्ग) हुआ; उसकी भुजाएं क्षत्रिय (रक्षा करने वाला वर्ग) बनीं; उसकी जंघाएं वैश्य (व्यापार और पोषण करने वाला वर्ग) हुईं; और उसके चरणों से शूद्र (सेवा और श्रम करने वाला वर्ग) उत्पन्न हुआ।
॥ १३ ॥
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत॥ १३ ॥
अर्थ : उस विराट् पुरुष के मन से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ; उसके नेत्रों से सूर्य प्रकट हुआ; उसके मुख से इन्द्र और अग्नि देव उत्पन्न हुए; और उसके प्राण से वायु देव उत्पन्न हुआ।
॥ १४ ॥
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥ १४ ॥
अर्थ : उसकी नाभि से अन्तरिक्ष लोक उत्पन्न हुआ; उसके सिर से द्युलोक (स्वर्ग) का निर्माण हुआ; उसके चरणों से पृथ्वी और उसके कानों से दिशाएं प्रकट हुईं — इस प्रकार देवों ने सम्पूर्ण लोकों की रचना की।
॥ १५ ॥
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुम्॥ १५ ॥
अर्थ : इस सृष्टि-यज्ञ की सात परिधियाँ (सात समुद्र या सात छन्द) थीं, और इक्कीस (बारह मास, पाँच ऋतुएं, तीन लोक और एक सूर्य) समिधाएं थीं; जब देवताओं ने इस यज्ञ का विस्तार करते हुए उस विराट् पुरुष को ही यूप में बाँधकर संकल्पित किया।
॥ १६ ॥
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ १६ ॥
अर्थ : देवताओं ने यज्ञ के द्वारा उस यज्ञाधिपति परमेश्वर का पूजन किया; वे ही प्रथम धर्म-विधान (सृष्टि के सनातन नियम) बने। वे महिमामयी पुण्यात्मा जन उस परम दिव्य स्वर्ग-धाम को प्राप्त होते हैं, जहाँ पुरातन साध्यगण और देवगण निवास करते हैं।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
इति ऋग्वेदे दशममण्डले पुरुषसूक्तं सम्पूर्णम्॥