श्रीरामचरितमानस — चित्रकूट प्रसंग एवं भरत-मिलाप
गोस्वामी तुलसीदास
श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड का यह प्रसंग त्याग, मर्यादा, तपस्या और भ्रातृ-प्रेम की सर्वोच्च पराकाष्ठा है। महर्षि वाल्मीकि के निर्देश पर भगवान श्रीराम ने माता सीता और लक्ष्मणजी सहित कामदगिरि पर्वत पर पर्णकुटी बनाकर निवास किया। भरत जी अयोध्या का सम्पूर्ण राजवैभव त्यागकर चित्रकूट आए और प्रभु की चरण-पादुकाओं को मस्तक पर धारण कर अयोध्या लौटे। चित्रकूट की पावन भूमि पर इस चरित्र का पारायण असीम पुण्यप्रद माना जाता है।
॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्रीरामचरितमानस — अयोध्याकाण्ड ॥
(चित्रकूट निवास एवं भरत-मिलाप प्रसंग)
॥ महर्षि वाल्मीकि द्वारा चित्रकूट निवास का परामर्श ॥
॥ १ ॥
चित्रकूट गिरि करहु निवासू।
तहं तुम्हार सब भाँति सुपासू॥
सैतु बंधु सरि मंजुल मीना।
संचित धर्म करहु जग दीना॥ १ ॥
अर्थ :
महर्षि वाल्मीकि श्रीराम से कहते हैं — हे रघुनन्दन! आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिए। वहाँ आपके लिए सब प्रकार से सुख और सुविधा है। वह पर्वत सुंदर है, वहाँ निर्मल मन्दाकिनी नदी बहती है और वन में समस्त कन्द-मूल-फल सुलभ हैं।
॥ २ ॥
कामद भे गिरि राम प्रसादा।
अवलोकत अपहरइ बिषादा॥
चित्रकूट महिमा बहु गाई।
रिषि मुनि संत रहहिं सुख पाई॥ २ ॥
अर्थ :
श्रीराम की चरण-रज के स्पर्श से वह पर्वत 'कामद' (समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला) हो गया; उसके दर्शन मात्र से जीवों के सारे विषाद और दुःख दूर हो जाते हैं। संतों और ऋषियों ने चित्रकूट की अपार महिमा गाई है, जहाँ सभी सुखी होकर तपस्या करते हैं।
॥ चित्रकूट में पर्णकुटी निर्माण एवं प्रभु का वास ॥
॥ ३ ॥
लखन लख्यो रघुबंसमनि सुर हरषित भए ब्योम।
पर्नकुटी सुंदर रची मजु कर जोरे दोम॥ ३ ॥
अर्थ :
लक्ष्मणजी ने श्रीरघुनाथजी के मन के भाव को समझकर, सुंदर पत्तों और काष्ठ से अत्यंत मनोहर पर्णकुटी का निर्माण किया। आकाश में देवतागण यह पावन दृश्य देखकर हर्षित हुए और पुष्पवर्षा करने लगे।
॥ ४ ॥
सीय लखन जेहि कुटी बिराजहिं।
सोभा देखि अमरावती लाजहिं॥
चित्रकूट सब दिन अति अनुकूला।
प्रभु पद कमल भये सब फूला॥ ४ ॥
अर्थ :
जिस कुटी में श्रीसीताजी, श्रीराम और लक्ष्मणजी विराजमान हैं, उसकी अलौकिक शोभा देखकर इन्द्र की अमरावती भी लज्जित होती है। चित्रकूट की भूमि पर प्रभु के चरणकमल पड़ते ही सम्पूर्ण वन प्रदेश नित्य वसन्त ऋतु के समान पुष्पित और पल्लवित हो गया।
॥ भरत जी का आगमन एवं अनुपम भरत-मिलाप ॥
॥ ५ ॥
भरत दीन्ह रघुपति पद माथा।
पुलकि सप्रेम मिले रघुनाथा॥
अनुज सनेह सुभायँ सुहाए।
प्रभु लखि लोचन जल भरि आए॥ ५ ॥
अर्थ :
चित्रकूट पहुँचकर भरत जी ने श्रीरघुनाथजी के पावन चरणों में मस्तक रख दिया। प्रभु श्रीराम ने अत्यंत प्रेम से पुलकित होकर भरत को गले से लगा लिया। छोटे भाई के निष्काम और निर्मल प्रेम को देखकर प्रभु के दोनों कमलनयनों में प्रेमाश्रु छलक आए।
॥ ६ ॥
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी।
कबिकुल अगम करम मन बानी॥
परम प्रेम पूरन दोउ भाई।
मनहुँ प्रेम पय सिंधु समाई॥ ६ ॥
अर्थ :
श्रीराम और भरत के मिलन के उस अलौकिक प्रेम का वर्णन किस प्रकार किया जा सकता है? वह कवियों की बुद्धि, कर्म, मन और वाणी की पहुँच से परे है। दोनों भाई परम प्रेम से परिपूर्ण होकर ऐसे शोभित हुए, मानो साक्षात् प्रेम ही क्षीरसागर में समा गया हो।
॥ चरण-पादुका अर्पण एवं अयोध्या प्रस्थान ॥
॥ ७ ॥
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं।
सादर भरत सीस धरि लीन्हीं॥
चरनपीठ करुनानिधान के।
जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के॥ ७ ॥
अर्थ :
प्रभु श्रीराम ने कृपा करके अपनी दोनों काष्ठ-पादुकाएं भरत जी को प्रदान कीं; भरत जी ने उन्हें अत्यंत आदरपूर्वक अपने मस्तक पर धारण कर लिया। वे करुानिधान की दोनों पादुकाएं मानो अयोध्या की प्रजा के प्राणों की रक्षा करने वाले दो पहरेदार (रक्षक) हों।
॥ ८ ॥
भरत चरित करि नेमु तुलसी जे सादर सुनहिं।
सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥ ८ ॥
अर्थ :
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं — जो मनुष्य नियमपूर्वक आदर के साथ इस चित्रकूट भरत-चरित्र का श्रवण करते हैं; उन्हें श्रीसीता-रामजी के चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त होता है और संसार के नश्वर भोगों से सहज ही वैराग्य हो जाता है।
॥ इति श्रीरामचरितमानसे अयोध्याकाण्डे चित्रकूटप्रसङ्गः समाप्तः ॥
॥ जय रघुनन्दन जय सियाराम ॥