॥ श्रीहरिः ॥
श्रीरुद्राष्टकम्

श्रीरुद्राष्टकम्

गोस्वामी तुलसीदास (श्रीरामचरितमानस)

🌸 स्तोत्र

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि के गुरु द्वारा शिव-क्रोध के शमन हेतु भुजङ्गप्रयात छन्द में रचित यह रुद्राष्टकम् अद्वैत ज्ञान, भक्ति और शिव-कृपा का अलौकिक संगम है।

श्रीरुद्राष्टकम्

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में काकभुशुण्डि के गुरु द्वारा शिव-क्रोध के शमन हेतु भुजङ्गप्रयात छन्द में रचित यह रुद्राष्टकम् अद्वैत ज्ञान, भक्ति और शिव-कृपा का अलौकिक संगम है।

॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ अथ श्रीरुद्राष्टकम् ॥
(श्रीरामचरितमानस, उत्तरकाण्ड — लोमश-काकभुशुण्डि उपाख्यान, विप्रकृत शिव स्तुति)
ॐ अस्य श्रीरुद्राष्टकस्तोत्रस्य गोस्वामी तुलसीदास ऋषिः, श्रीसदाशिवो रुद्रो देवता, भुजङ्गप्रयात छन्दः, श्रीसाम्बसदाशिव-प्रीत्यर्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ १ ॥
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं।
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम्॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥ १ ॥
अर्थ : हे ईश! हे ईशान! मोक्षस्वरूप, सर्वसमर्थ, सर्वव्यापी, परब्रह्म और साक्षात् वेदों के स्वरूप आपको मेरा प्रणाम है! अपने स्वरूप में स्थित, तीनों गुणों से अतीत, भेदरहित, सर्वथा निष्काम, ज्ञानमय आकाशरूप और आकाश के समान ही दिगम्बर (सर्वव्यापी) भगवान् शिव का मैं भजन करता हूँ।
॥ २ ॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं।
गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशम्॥
करालं महाकाल कालं कृपालं।
गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥ २ ॥
अर्थ : आकाररहित, ओंकार के मूल, तीनों अवस्थाओं से अतीत (तुरीय पद), वाणी, बुद्धि और इन्द्रियों की पहुँच से परे, कैलासपति गिरीश, दुष्टों के लिए भयानक, महाकाल के भी काल, परम कृपालु, समस्त सद्गुणों के धाम और संसार-सागर से पार उतारने वाले परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
॥ ३ ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं।
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा।
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा॥ ३ ॥
अर्थ : हिमालय पर्वत के समान श्वेत वर्ण वाले, गम्भीर, करोड़ों कामदेवों के समान कान्तियुक्त दिव्य शरीर वाले, जिनके मस्तक पर चंचल तरंगों वाली सुन्दर देवनदी गंगा विराजमान हैं, जिनके भाल (ललाट) पर बालचन्द्रमा सुशोभित है और कण्ठ में सर्पमाला शोभित है।
॥ ४ ॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं।
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम्॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं।
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि॥ ४ ॥
अर्थ : कानों में हिलते हुए कुण्डलों वाले, सुन्दर भौंहों और विशाल नेत्रों वाले, प्रसन्न मुख वाले, नीलकण्ठ, परम दयालु, बाघम्बर वस्त्र धारण करने वाले, मुण्डों की माला पहनने वाले, सबके प्रिय, सबका कल्याण करने वाले और सबके नाथ भगवान् शंकर का मैं भजन करता हूँ।
॥ ५ ॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं।
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्॥
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं।
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥ ५ ॥
अर्थ : प्रचण्ड तेज वाले, श्रेष्ठ, पराक्रमी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान, तीनों तापों (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) का समूल नाश करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले और केवल शुद्ध प्रेमभाव से जानने योग्य भगवती भवानी के पति भगवान् शिव का मैं भजन करता हूँ।
॥ ६ ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी।
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी॥
चिदानन्द संदोह मोहापहारी।
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥ ६ ॥
अर्थ : सोलह कलाओं से अतीत, नित्य कल्याणकारी, प्रलयकाल में सृष्टि का संहार करने वाले, सदा सज्जनों को आनन्द देने वाले, त्रिपुरासुर का वध करने वाले, सच्चिदानन्दघन, अज्ञानरूपी मोह को हरने वाले और कामदेव के नाशक हे प्रभो! आप मुझ पर प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए!
॥ ७ ॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं।
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्॥
न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं।
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम्॥ ७ ॥
अर्थ : जब तक मनुष्य इस लोक में अथवा परलोक में भगवती पार्वती के स्वामी भगवान् शिव के चरणकमलों का भजन नहीं करते, तब तक उन्हें न तो सुख मिलता है, न शान्ति मिलती है और न उनके दुःखों का नाश होता है। अतः हे सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले महादेव! मुझ पर प्रसन्न होइए!
॥ ८ ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां।
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्॥
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं।
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो॥ ८ ॥
अर्थ : हे शम्भो! मैं न तो योग जानता हूँ, न जप जानता हूँ और न पूजा की विधि ही जानता हूँ। हे महादेव! मैं सदा-सर्वदा केवल आपके चरणों में सिर झुकाता हूँ। बुढ़ापे, जन्म-मृत्यु और अनेक दुःखों के ताप से जलते हुए मुझ विपत्तिग्रस्त शरणागत की रक्षा कीजिए! हे प्रभो! हे ईश! हे शम्भो! मुझ पर कृपा कीजिए!
॥ ९ ॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥
अर्थ : भगवान् शिव को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण द्वारा कहा गया यह 'रुद्राष्टक' जो भी मनुष्य भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर देवाधिदेव भगवान् शम्भु सदा प्रसन्न रहते हैं।
॥ इति श्रीमद्रामचरितमानसे उत्तरकाण्डे श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥