॥ श्रीहरिः ॥
सरस्वती चालीसा

सरस्वती चालीसा

परम्परागत

🪔 चालीसा

विद्या, बुद्धि, वाणी एवं संगीत की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती की वन्दना में रचित यह चालीसा विद्यार्थियों एवं साधकों हेतु परम कल्याणकारी है। इसमें वीणा-पुस्तक-धारिणी, हंस-वाहिनी माँ शारदा के वरदानी स्वरूप का स्तवन है।

सरस्वती चालीसा

विद्या, बुद्धि, वाणी एवं संगीत की अधिष्ठात्री भगवती सरस्वती की वन्दना में रचित यह चालीसा विद्यार्थियों एवं साधकों हेतु परम कल्याणकारी है। इसमें वीणा-पुस्तक-धारिणी, हंस-वाहिनी माँ शारदा के वरदानी स्वरूप का स्तवन है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः ॥
॥ १ ॥
जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि।
बन्दौ मातु सरस्वती, बुद्धि बल विद्या बारि॥
॥ २ ॥
श्री अम्बिका पद पंकज, निशदिन धरि उर ध्यान।
सरस्वती चालीसा कहूं, करहु जनम कल्यान॥
॥ ३ ॥
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
॥ ४ ॥
जय जय जय वीणाकर धारी। करत सदा भक्तन हितकारी॥
॥ ५ ॥
रूप चतुर्भुज मातु सुहावा। हंस बाहन अति मन भावा॥
॥ ६ ॥
वीणा पुस्तक माला कर में। विद्या ज्योति भरहिं उर भर में॥
॥ ७ ॥
श्वेत वस्त्र तन माहिं सुहाये। मुनि जन सुर सब शीश नवाये॥
॥ ८ ॥
वीणा वादिनि वीणा बाजे। मधुर स्वरन सब त्रिभुवन राजे॥
॥ ९ ॥
कमल नयन मुख चन्द्र समाना। महिमा अमित न जाइ बखाना॥
॥ १० ॥
आदि शक्ति माता कल्याणी। विद्या बुद्धि ज्ञान की खानी॥
॥ ११ ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश मनावे। वेद पुराणन यश गुण गावे॥
॥ १२ ॥
जो जन ध्यान लगावै मन में। बुद्धि ज्ञान प्रगटै क्षण क्षण में॥
॥ १३ ॥
जड़मति होत चतुर बलवाना। पावै विद्या यश विज्ञाना॥
॥ १४ ॥
कालिदास कहं ज्ञान सिखाया। ग्रन्थ अनेकन प्रगट कराया॥
॥ १५ ॥
तुलसी सूरदास रसखानी। तुम्हरी कृपा भई कल्याणी॥
॥ १६ ॥
वाल्मीकि ऋषि ज्ञान सुपाया। रामायण कीन्हो सुखदाया॥
॥ १७ ॥
जो जन विद्या चाहै भारी। करै सरस्वती सेवा सारी॥
॥ १८ ॥
विद्या बुद्धि विवेक विधाता। सब देवन की तुम सुख दाता॥
॥ १९ ॥
मातु कृपा जब होय तुम्हारी। दूर होय अज्ञान अंधियारी॥
॥ २० ॥
वाणी में रस सुधा बरसावे। सुर तालन की सिद्धि करावे॥
॥ २१ ॥
संगीतज्ञ सुकवि जेहि ध्यावे। अमर कीर्ति भुवन में पावे॥
॥ २२ ॥
ज्ञान दान दे मातु भवानी। करहु कृपा जगदम्ब कल्याणी॥
॥ २३ ॥
अस्तुति करौं केहि विधि तोरी। अति मन्दमति बुद्धि है मोरी॥
॥ २४ ॥
विद्या हीन दीन अज्ञाना। चरण कमल में शरण समाना॥
॥ २५ ॥
क्षमहु अपराध मातु विधाता। तुम ही सब जग की सुखदाता॥
॥ २६ ॥
जो यह पाठ करै चालीसा। ज्ञान बुद्धि देवे जगदीशा॥
॥ २७ ॥
माघ शुक्ल पंचमी सुहाई। बसंत पंचमी उत्सव आई॥
॥ २८ ॥
पूजन करि जो ध्यान लगावै। विद्या बुद्धि सब फल पावै॥
॥ २९ ॥
पुस्तक वीणा पूजन कीजै। श्वेत पुष्प फल अर्पण दीजै॥
॥ ३० ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावै। प्रेम सहित चालीसा गावै॥
॥ ३१ ॥
अज्ञानता सब दूर बहावै। ज्ञान ज्योति घट माहिं जगावै॥
॥ ३२ ॥
जय जय जय सरस्वती माता। सब गुण निधि सुख सम्पत्ति दाता॥
॥ ३३ ॥
संकट कष्ट नशै सब बाधा। पूरन होइ मनोरथ साधा॥
॥ ३४ ॥
विद्या विहीन लहै ज्ञाना। निर्बल पावै बल विज्ञाना॥
॥ ३५ ॥
मूक होय वाचाल विशाला। पावै पदवी मुनि गुणपाला॥
॥ ३६ ॥
दीन अनाथ शरण तव आयो। मातु कृपा कर दर्श दिखायो॥
॥ ३७ ॥
सदा बसहु मम जिह्वा माहीं। अमृत वचन मुखहि निकसाहीं॥
॥ ३८ ॥
जय जय जय वीणा वर दायिनि। संकट शोक भय विनाशिनी॥
॥ ३९ ॥
चारहु वेद तुम्हीं मुख गावे। ऋषि मुनि ध्यान निरंतर लावे॥
॥ ४० ॥
प्रेम सहित जो वन्दन करई। सो जन भव सागर निस्तरई॥
॥ ४१ ॥
दास जानि मोहि दीजै दाना। विद्या बुद्धि ज्ञान प्रधाना॥
॥ ४२ ॥
जय सरस्वती मातु भवानी। राखहु लाज देहु वरदानी॥
॥ ४३ ॥
मातु सरस्वती बुद्धि बल, देहु मोहि आधार।
अज्ञानता मम दूर करि, कीजै भव से पार॥