॥ श्रीहरिः ॥
शनि चालीसा

शनि चालीसा

परम्परागत

🪔 चालीसा

कर्मफलदाता भगवान सूर्य-पुत्र शनिदेव की कृपा-प्राप्ति, साढ़ेसाती, ढैय्या एवं कष्ट-निवारण हेतु शनिवार को श्रद्धापूर्वक पठनीय पावन स्तुति। इसमें शनिदेव के न्यायप्रिय, दण्डधर एवं भक्तवत्सल रूप की वन्दना है।

शनि चालीसा

कर्मफलदाता भगवान सूर्य-पुत्र शनिदेव की कृपा-प्राप्ति, साढ़ेसाती, ढैय्या एवं कष्ट-निवारण हेतु शनिवार को श्रद्धापूर्वक पठनीय पावन स्तुति। इसमें शनिदेव के न्यायप्रिय, दण्डधर एवं भक्तवत्सल रूप की वन्दना है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥
॥ १ ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीना के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥
॥ २ ॥
रवि सुत के पद कंज रज, निसिदिन धरि उर ध्यान।
श्याम चालीसा कहत हैं, करहु जनम कल्यान॥
॥ ३ ॥
जय जय श्री शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
॥ ४ ॥
चारि भुजा तन श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥
॥ ५ ॥
परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥
॥ ६ ॥
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय में माल मुक्तन की दमके॥
॥ ७ ॥
कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल में करैं अरिहं संहारा॥
॥ ८ ॥
पिंगल मन्द रौद्र यम नामा। भेदा मन्द शनि सुख धामा॥
॥ ९ ॥
सूर्य सुवन छाया के जाया। रवि सम तेज प्रताप सुहाया॥
॥ १० ॥
बाहन प्रभु के नव सुखकारी। गज गर्दभ मृग महिष विचारी॥
॥ ११ ॥
जम्बुक सिंह आदि सब बाहन। सोहत शनि कहं रूप सुपावन॥
॥ १२ ॥
गज पर बैठि शनि जब आवैं। धन वैभव सम्पति पहुँचावैं॥
॥ १३ ॥
गर्दभ बाहन हानि करावैं। व्याकुल भये चित्त भरमावैं॥
॥ १४ ॥
महिष बाहन जब शनि आवैं। दुःख विपत्ति भय उपज पावैं॥
॥ १५ ॥
सिंह बाहन जब प्रभु सिधरावैं। विजय विभूति शत्रु नशावैं॥
॥ १६ ॥
काक बाहन जब शनि पग धारैं। कलह क्लेश गृह माहिं पसारैं॥
॥ १७ ॥
हंस बाहन जब आवैं देवा। सब सुख लहै सुफल कर सेवा॥
॥ १८ ॥
मयूर बाहन आवे जब राऊ। सुखी रहै जन सर्व प्रभाऊ॥
॥ १९ ॥
मृग बाहन जब शनि पग आवैं। राज योग सुख भोग करावैं॥
॥ २० ॥
नाव बाहन पर शनि जब ध्यावै। संकट पार उतर सुख पावै॥
॥ २१ ॥
रूप भयंकर लखि भय पावैं। जो जन ध्यान हृदय नहिं लावैं॥
॥ २२ ॥
साढ़े सात बरस जब आवैं। राजा रंक समान बनावैं॥
॥ २३ ॥
विक्रमादित्य राजा पर धाए। चंदन घिसवाकर बिकवाए॥
॥ २४ ॥
हरिश्चन्द्र नृप बिके बिकाने। रोहिताश्व सुत मरे पराने॥
॥ २५ ॥
नल राजा पर जब शनि धाये। भुंजे मीन जलहिं उतराये॥
॥ २६ ॥
श्री रघुवर बनवास सिधारे। सीता हरण कष्ट बिस्तारे॥
॥ २७ ॥
रावण की जब मति भरमाई। लंका जरि के क्षार कराई॥
॥ २८ ॥
जो जन ध्यान लगावै मन में। शनि देव कृपा करैं क्षण में॥
॥ २९ ॥
तेल तिल अरु उड़द चढ़ावै। नीले पुष्प सुगन्ध सुहावै॥
॥ ३० ॥
दीप जलाय शनि के द्वारे। धूप दशांग दशा विस्तारे॥
॥ ३१ ॥
शनि चालीसा जो नित गावै। सब संकट तेहि दूर नसावै॥
॥ ३२ ॥
शनि की दशा न ताकहं व्यापे। संकट कष्ट दूर सब कापे॥
॥ ३३ ॥
अंध कोढ़ी निर्धन कल्याना। सब जन सुखी करहिं भगवाना॥
॥ ३४ ॥
रोग दोष सब मिटहिं शरीरा। जपत नाम शनि देव गम्भीरा॥
॥ ३५ ॥
जय जय जय शनिदेव सुखदाता। संकट हरन सुबुद्धि विधाता॥
॥ ३६ ॥
दीन जनन के तुम रखवारे। भय नाशन सब संकट टारे॥
॥ ३७ ॥
शनिवार व्रत करै जो कोई। ताकहं कष्ट कभी नहिं होई॥
॥ ३८ ॥
पीपल तर जो दीप जलावै। शनि देव के दर्शन पावै॥
॥ ३९ ॥
लोहा का जो दान करावै। परम पदम पर धाम सिधावै॥
॥ ४० ॥
श्याम चरण की शरण सुहावै। सो नर निश्चय परम पद पावै॥
॥ ४१ ॥
दास शरण आयो कर जोरी। राखहु लाज प्रभुजी मोरी॥
॥ ४२ ॥
जय जय शनि महाराज दयाला। करहु सदा भक्तन प्रतिपाला॥
॥ ४३ ॥
पाठ शनैश्चर देव को, कीन्हो विमल तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥