॥ श्रीहरिः ॥
शिव चालीसा

शिव चालीसा

अयोध्यादास

🪔 चालीसा

भगवान शिव की अहैतुकी कृपा, दारिद्र्य-निवारण एवं मनोकामना सिद्धि हेतु रचित यह अत्यन्त लोकप्रिय स्तुति है। इसमें देवाधिदेव महादेव के पावन मस्तक पर गंगा, चन्द्रमा, नीलकण्ठ स्वरूप तथा त्रिपुरारी लीलाओं का भावपूर्ण गुणगान है।

शिव चालीसा

भगवान शिव की अहैतुकी कृपा, दारिद्र्य-निवारण एवं मनोकामना सिद्धि हेतु रचित यह अत्यन्त लोकप्रिय स्तुति है। इसमें देवाधिदेव महादेव के पावन मस्तक पर गंगा, चन्द्रमा, नीलकण्ठ स्वरूप तथा त्रिपुरारी लीलाओं का भावपूर्ण गुणगान है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
॥ १ ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
॥ २ ॥
जय गिरिजापति दीन दयाला। सदा करत संतन प्रतिपाला॥
॥ ३ ॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
॥ ४ ॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाये॥
॥ ५ ॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहै। छवि को देखि नाग मुनि मोहै॥
॥ ६ ॥
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
॥ ७ ॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
॥ ८ ॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
॥ ९ ॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
॥ १० ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही तुम प्रभु कष्ट निवारा॥
॥ ११ ॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
॥ १२ ॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
॥ १३ ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
॥ १४ ॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा करि लीन बचाई॥
॥ १५ ॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
॥ १६ ॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
॥ १७ ॥
वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
॥ १८ ॥
प्रगटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भये विहाला॥
॥ १९ ॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
॥ २० ॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
॥ २१ ॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
॥ २२ ॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
॥ २३ ॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
॥ २४ ॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
॥ २५ ॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
॥ २६ ॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
॥ २७ ॥
ले त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
॥ २८ ॥
मात-पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
॥ २९ ॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
॥ ३० ॥
धन निर्धन को देत सदा ही। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
॥ ३१ ॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
॥ ३२ ॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
॥ ३३ ॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
॥ ३४ ॥
नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
॥ ३५ ॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत शम्भु सहाई॥
॥ ३६ ॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावनहारी॥
॥ ३७ ॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
॥ ३८ ॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
॥ ३९ ॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
॥ ४० ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावै। शंकर सम्मुख पाठ सुनावै॥
॥ ४१ ॥
जन्म जन्म के पाप नसावै। अन्त धाम शिवपुर में पावै॥
॥ ४२ ॥
कहैं अयोध्यादास सब, आस रूप शिव धार।
लाज राखि शिव शम्भु अब, करहु भवन से पार॥
॥ ४३ ॥
नित नेम करि प्रातः ही, पाठ करौ चालीस।
तुम मेरी मनकामना, पूर्ण करो जगदीश॥