शिव ताण्डव स्तोत्रम्
रावण
लङ्काधिपति रावण द्वारा भगवान शिव के ताण्डव नृत्य एवं दिव्य स्वरूप की स्तुति में रचित यह परम ओजस्वी स्तोत्र संस्कृत साहित्य का अद्वितीय रत्न है। यह पञ्चचामर छन्द की द्रुत लय, अनुप्रास एवं अनन्य शिव-भक्ति से परिपूर्ण है।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ अथ रावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रम् ॥
॥ अथ रावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रम् ॥
भगवान शिव के परम भक्त लङ्काधिपति रावण द्वारा विरचित यह स्तोत्र भगवान शंकर के अलौकिक ताण्डव नृत्य, जटाजूट, चन्द्रकला और दिव्य स्वरूप की अनुपम महिमा का गुणगान करता है।
॥ १ ॥
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
अर्थ :
जिनके सघन जटारूपी वन से निकलती हुई गङ्गाजी की पावन धाराएं उनके कण्ठस्थल को पवित्र कर रही हैं, जिनके गले में बड़े-बड़े सर्पों की मालाएं लटक रही हैं और जो डमरू के 'डम-डम' शब्दों से मङ्गलमय प्रचण्ड ताण्डव नृत्य कर रहे हैं, वे भगवान शिव हमारा परम कल्याण करें।
॥ २ ॥
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
अर्थ :
जिनके जटाजूटरूपी कड़ाह में वेग से घूमती हुई देवनदी गङ्गा की चंचल लहरें मस्तक पर सुशोभित हो रही हैं, जिनके ललाट के पटल पर 'धगद्-धगद्' करती हुई प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित हो रही है और जिनके मस्तक पर बालचन्द्रमा विराजित हैं, उन देवाधिदेव शिव में मेरा प्रतिक्षण अनुराग रहे।
॥ ३ ॥
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
अर्थ :
पर्वतराज हिमालय की कन्या श्रीपार्वतीजी के विलासमय कटाक्षों से जिनका मन निरन्तर आनन्दित रहता है, जिनकी कृपादृष्टि की अटूट धारा भक्तों की घोर विपत्तियों को दूर करने वाली है, उन दिगम्बर भगवान शिव में मेरा मन आनन्द प्राप्त करे।
॥ ४ ॥
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
अर्थ :
जिनके जटाओं में लिपटे हुए सर्पों के फणों की मणियों का पीला-लाल प्रकाश दिशाओं के मुख पर कुङ्कुम के लेप की भांति चमक रहा है और जो मदोन्मत्त हाथी के चमड़े का उत्तरीय वस्त्र धारण किए हुए हैं, उन समस्त जीवों के पोषक भगवान भूतनाथ में मेरा मन अद्भुत आनन्द प्राप्त करे।
॥ ५ ॥
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥
अर्थ :
इन्द्र आदि समस्त देवताओं के मुकुटों में लगे पुष्पों के पराग से जिनकी चरण-पीठिका निरन्तर धूसरित रहती है, जिन्होंने नागराज की माला से अपने जटाजूट को बांध रखा है और जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित हैं, वे भगवान शिव हमें चिरकाल के लिए दिव्य सम्पदा प्रदान करें।
॥ ६ ॥
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥
अर्थ :
जिन्होंने अपने ललाट-मण्डल की प्रज्वलित अग्नि की चिनगारियों से कामदेव को भस्म कर दिया था, जिन्हें समस्त देवगण नतमस्तक होकर प्रणाम करते हैं और जिनके शीश पर अमृतमयी चन्द्रकला सुशोभित है, वे विशाल कपालधारी जटाजूट शिव हमारी समृद्धि के निमित्त सिद्ध हों।
॥ ७ ॥
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्-
धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
अर्थ :
जिन्होंने अपने विकराल ललाट पटल पर 'धगद्-धगद्' जलती हुई अग्नि में कामदेव की आहुति दे दी थी तथा जो गिरिराजकुमारी पार्वती के स्तनों के अग्रभाग पर विविध पत्र-रचना करने वाले एकमात्र अद्वितीय शिल्पी हैं, उन त्रिनेत्रधारी भगवान शिव में मेरी अनन्य प्रीति हो।
॥ ८ ॥
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥
अर्थ :
जिनका कण्ठ नवीन मेघमाला से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के गहन अन्धकार की भांति नीलिमामय है, जो गङ्गाजी को धारण करने वाले, गजचर्मधारी, चन्द्रकला से सुशोभित और संसार का भार वहन करने वाले हैं, वे भगवान शिव हमें परम कल्याण एवं श्री प्रदान करें।
॥ ९ ॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
विडम्बिकण्ठकन्दलारुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥
अर्थ :
जिनके कण्ठ की कान्ति खिले हुए नीलकमल के समूह की श्यामता को भी लज्जित करती है, जो कामदेव का नाश करने वाले, त्रिपुरहन्ता, भवबन्धनहारी, दक्षयज्ञ-विध्वंसक, गजासुर-संहारक, अन्धकासुर का वध करने वाले और स्वयं यमराज को भी पराजित करने वाले हैं, उन भगवान शिव का मैं भजन करता हूँ।
॥ १० ॥
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥
अर्थ :
जो माता पार्वती की समस्त मङ्गलमयी कलाओं की कदम्ब-मञ्जरी के रस-प्रवाह का आस्वादन करने के लिए भौंरे के समान हैं, जो काम, त्रिपुर, भव-भय, दक्ष-यज्ञ, गजासुर, अन्धकासुर और काल के भी नाशक हैं, उन देवाधिदेव का मैं निरन्तर भजन करता हूँ।
॥ ११ ॥
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्-
विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥
अर्थ :
आकाश में वेग से चक्कर काटते हुए सर्पों की फुंकारों से जिनके ललाट की भीषण अग्नि निरन्तर धधक रही है तथा 'धिमिद्-धिमिद्' बजते हुए मृदङ्ग की गम्भीर मङ्गल ध्वनि के ताल पर जिनका प्रचण्ड ताण्डव नृत्य चल रहा है, उन भगवान शिव की जय हो।
॥ १२ ॥
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥
अर्थ :
कठोर पत्थर और विचित्र कोमल शय्या में, सर्प और मोतियों की माला में, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, तृण और कमल-नयनों में, साधारण प्रजा और पृथ्वीपति राजा में समान दृष्टि रखता हुआ मैं कब भगवान सदाशिव का भजन कर सकूँगा?
॥ १३ ॥
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥
अर्थ :
गंगाजी के तटवर्ती निकुञ्जों की गुफा में रहता हुआ, समस्त कुविचारों को त्यागकर, मस्तक पर हाथ जोड़े हुए, चंचल नेत्रों और पाप-वासनाओं से मुक्त होकर, ललाट पर तिलक लगाए भगवान शिव के मङ्गल नाम का उच्चारण करता हुआ मैं कब परम आनन्द एवं सुख को प्राप्त करूँगा?
॥ १४ ॥
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति संततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥
अर्थ :
जो मनुष्य इस सर्वोत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण या श्रवण करता है, वह सदा परम पवित्र रहता है और भगवान शिव तथा सद्गुरु में उसकी सुदृढ़ भक्ति उत्पन्न होती है। भगवान शंकर का यह दिव्य चिन्तन अज्ञान और मोह को दूर करने वाला है।
॥ १५ ॥
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥
अर्थ :
प्रदोष काल में शिवपूजा के उपरान्त जो भक्त दशमुख रावण द्वारा रचित इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे भगवान शिव रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त स्थिर लक्ष्मी और सर्वदा उत्तम ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
॥ इति श्रीरावणविरचितं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥