॥ श्रीहरिः ॥
श्री सूक्तम्

श्री सूक्तम्

ऋग्वेद खिलभाग

🔥 वेद

ऋग्वेद के खिल-भाग का यह परम प्राचीन मन्त्र-सूक्त ऐश्वर्य, कान्ति, कीर्ति और धन-धान्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी का वैदिक आह्वान है। इसके षोडश मन्त्र स्वर्णमयी, पद्म-स्थिता माँ श्री की अनुकम्पा से दारिद्र्य का समूल नाश करते हैं।

श्री सूक्तम्

ऋग्वेद के खिल-भाग का यह परम प्राचीन मन्त्र-सूक्त ऐश्वर्य, कान्ति, कीर्ति और धन-धान्य की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी का वैदिक आह्वान है। इसके षोडश मन्त्र स्वर्णमयी, पद्म-स्थिता माँ श्री की अनुकम्पा से दारिद्र्य का समूल नाश करते हैं।

॥ श्रीमहागणपतये नमः ॥
॥ अथ श्री सूक्तम् ॥
ॐ अस्य श्रीसूक्तस्य आनन्द-कर्दम-चिक्लीत-इन्दिरासुता ऋषयः, श्रीर्महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती देवता, गायत्री-अनुष्टुप्-त्रिष्टुप्-बृहती छन्दांसि, श्रीमहाविष्णुवक्षःस्थलस्थितायाः भगवत्याः महालक्ष्म्याः प्रीत्यर्थे जपे पाठे च विनियोगः।
॥ ध्यानम् ॥
॥ १ ॥
पद्मानने पद्मविपद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।
विश्वप्रिये विष्णुमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥
अर्थ : हे कमलानने! कमल के समान मुख वाली, कमल के समान कोमल अंगों वाली, कमलों से प्रेम करने वाली, कमल की पंखुड़ियों के समान विशाल नेत्रों वाली, सम्पूर्ण विश्व की प्रियतमा और भगवान् श्रीहरि विष्णु के मन के अनुकूल रहने वाली हे भगवती लक्ष्मी! अपने पावन चरणकमलों को मेरे हृदय में स्थापित कीजिए।
॥ २ ॥
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥ १ ॥
अर्थ : हे जातवेदा (सर्वज्ञ अग्निदेव)! सुवर्ण के समान कान्ति वाली, पीतवर्ण वाली, सोने और चाँदी के हार धारण करने वाली, चन्द्रमा के समान शीतल एवं आनन्ददायिनी, सुवर्णमयी भगवती लक्ष्मी को मेरे लिए यहाँ आवाहन कीजिए।
॥ ३ ॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥ २ ॥
अर्थ : हे अग्निदेव! आप मेरे लिए उस कभी न नष्ट होने वाली और कभी छोड़कर न जाने वाली (अनपगामिनी) लक्ष्मी का आवाहन कीजिए; जिनके आगमन से मैं प्रचुर सुवर्ण, गौएं, घोड़े, सम्बन्धी एवं सेवक-पुत्र आदि को प्राप्त कर सकूँ।
॥ ४ ॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥ ३ ॥
अर्थ : जिनके आगे-आगे अश्व दौड़ते हैं, जो दिव्य रथ के मध्य में विराजती हैं, और हाथियों के तुमुल चिंघाड़ से जिनकी अगवानी होती है — उन परम ऐश्वर्यमयी श्रीलक्ष्मी देवी का मैं आवाहन करता हूँ; वे भगवती मुझ पर कृपापूर्वक प्रसन्न हों।
॥ ५ ॥
कांसोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥ ४ ॥
अर्थ : जो मन्द-मन्द मुस्कान वाली हैं, सुवर्णमयी परकोटे (प्राकार) से घिरी हैं, करुणामृत से आर्द्र (कोमल हृदय वाली) हैं, तेज से देदीप्यमान हैं, भक्तों के मनोरथ पूर्ण कर स्वयं तृप्त रहने वाली और दूसरों को तृप्त करने वाली हैं; जो कमल पर विराजमान हैं और कमल के ही समान वर्ण वाली हैं — उन श्रीलक्ष्मी देवी को मैं यहाँ सादर बुलाता हूँ।
॥ ६ ॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥ ५ ॥
अर्थ : जो चन्द्रमा के समान आह्लादकारिणी, परम दीप्तिमान्, अपने अनुपम यश से प्रकाशित, इस लोक में देवताओं द्वारा पूजिता और परम उदार हैं; उन कमलरूपा भगवती लक्ष्मी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ। हे देवि! आपका वरण करने से मेरी अलक्ष्मी (दरिद्रता व दुःख) सर्वथा नष्ट हो जाए।
॥ ७ ॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥ ६ ॥
अर्थ : हे सूर्य के समान कान्ति वाली भगवती! आपके तपोबल से वनस्पतियों में श्रेष्ठ 'बिल्व' (बेल का वृक्ष) उत्पन्न हुआ है; उस बिल्व वृक्ष के फल आपके अनुग्रह से मेरे आन्तरिक अज्ञानजनित दोषों (काम, क्रोध आदि) को तथा बाह्य दरिद्रता व क्लेशों को दूर करें।
॥ ८ ॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे॥ ७ ॥
अर्थ : देवताओं के सखा कुबेर और उनके साथ यश तथा चिन्तामणि मणिरूपी ऐश्वर्य मुझे प्राप्त हों; मैं इस राष्ट्र में जन्म लेकर प्रतिष्ठित हुआ हूँ, अतः हे देवि! आप मुझे विपुल कीर्ति और ऐश्वर्य (ऋद्धि-सिद्धि) प्रदान कीजिए।
॥ ९ ॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वान् निर्णुद मे गृहात्॥ ८ ॥
अर्थ : भूख और प्यास रूपी मल से युक्त, आपकी जेठी बहिन 'अलक्ष्मी' (दरिद्रता) का मैं सर्वथा नाश करता हूँ; हे देवि! आप मेरे घर से सम्पूर्ण ऐश्वर्यहीनता और असमृद्धि को पूर्णतः बाहर निकाल दीजिए।
॥ १० ॥
गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्॥ ९ ॥
अर्थ : जो दिव्य सुगन्ध के द्वारा अनुभव में आती हैं, जिनका अनादर कोई नहीं कर सकता (दुराधर्षा), जो धन-धान्य और पशुओं से सदा परिपूर्ण हैं, गोमय से युक्त भूमि की अधिष्ठात्री हैं, और सम्पूर्ण प्राणियों की परम स्वामिनी हैं — उन श्रीलक्ष्मी देवी का मैं यहाँ सादर आवाहन करता हूँ।
॥ ११ ॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः॥ १० ॥
अर्थ : मेरे मन की पवित्र कामनाएँ और संकल्प सिद्ध हों; मेरी वाणी में सत्य की शक्ति का वास हो; गौ आदि पशुओं का, विविध अन्नों का और ऐश्वर्य तथा यश का आश्रय सदा मेरे घर में बना रहे।
॥ १२ ॥
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥ ११ ॥
अर्थ : हे कर्दम ऋषि! आपके द्वारा भगवती लक्ष्मी प्रकट हुईं (पुत्री रूप में); हे कर्दम! आप मेरे यहाँ प्रसन्नतापूर्वक निवास कीजिए, और कमलों की माला धारण करने वाली जगन्माता महालक्ष्मी को मेरे कुल में सदा के लिए प्रतिष्ठित कर दीजिए।
॥ १३ ॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
निच देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले॥ १२ ॥
अर्थ : जल स्निग्ध और मनोहर पदार्थों की सृष्टि करे; हे लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत! आप मेरे घर में वास कीजिए, और अपनी माता भगवती श्रीलक्ष्मी देवी को मेरे सम्पूर्ण कुल में चिरकाल के लिए स्थापित कीजिए।
॥ १४ ॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥ १३ ॥
अर्थ : हे अग्निदेव! जो कृपा से आर्द्र हैं, पुष्टि देने वाली हैं, पीताभ (सुवर्ण) वर्ण वाली हैं, कमलों की माला धारण करने वाली हैं, चन्द्रमा के समान प्रकाशमयी और सुवर्णरूपा हैं — उन भगवती लक्ष्मी का मेरे लिए यहाँ आवाहन कीजिए।
॥ १५ ॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥ १४ ॥
अर्थ : हे अग्निदेव! जो प्रजा पर दयार्द्र होकर समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हैं, दण्डनीति और धर्म की आधारभूता हैं, सुवर्णमयी माला से अलंकृत हैं, सूर्य के समान प्रचण्ड तेजस्विनी और हिरण्मयी हैं — उन श्रीलक्ष्मी को मेरे यहाँ बुलाइए।
॥ १६ ॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम्॥ १५ ॥
अर्थ : हे जातवेदा अग्निदेव! आप मेरे लिए उन स्थिर रहने वाली लक्ष्मी को बुलाइए, जिनके निवास से मैं विपुल सुवर्ण, गौएं, दासियाँ, उत्तम घोड़े और आज्ञाकारी पुत्र-पौत्रादि पुरुषों को प्राप्त कर सकूँ।
॥ फलश्रुति ॥
॥ १७ ॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्॥
अर्थ : जो मनुष्य पवित्र और संयमित होकर प्रतिदिन घृत की आहुति देता है, तथा ऐश्वर्य और कल्याण की कामना से इस पन्द्रह ऋचाओं वाले 'श्रीसूक्त' का निरन्तर जप करता है, वह परम समृद्धि को प्राप्त होता है।
॥ १८ ॥
पद्मानने पद्मऊरु पद्माक्षी पद्मसम्भवे।
तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्॥
श्रियै जातः श्रिय आनिर्याय श्रियं वयो जरितृभ्यो दधातु।
श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ॥
अर्थ : हे कमलमुखि! हे कमल के समान जंघाओं और नयनों वाली! हे कमलोद्भवे! मुझ पर ऐसी कृपा-दृष्टि कीजिए जिससे मैं अक्षय सुख व शान्ति को प्राप्त कर सकूँ। श्रीलक्ष्मी की कृपा से उत्पन्न पुरुष परमानन्द, अमरत्व और यश को प्राप्त करते हैं।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
इति ऋग्वेदखिलभागे श्रीसूक्तं सम्पूर्णम्॥