॥ श्रीहरिः ॥
श्री सुन्दरकाण्ड

श्री सुन्दरकाण्ड

गोस्वामी तुलसीदास

📖 पुराण

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस का यह पाँचवाँ सोपान सम्पूर्ण विश्व में सर्वाधिक पठित भक्ति-काव्य है। इसमें हनुमान जी के समुद्र-लंघन, सीता-खोज, लंका-दहन और विभीषण-शरण की अद्वितीय वीर एवं भक्ति-रस कथा दोहा-चौपाई छन्द में वर्णित है।

श्री सुन्दरकाण्ड

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस का यह पाँचवाँ सोपान सम्पूर्ण विश्व में सर्वाधिक पठित भक्ति-काव्य है। इसमें हनुमान जी के समुद्र-लंघन, सीता-खोज, लंका-दहन और विभीषण-शरण की अद्वितीय वीर एवं भक्ति-रस कथा दोहा-चौपाई छन्द में वर्णित है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते ॥
॥ श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान: सुन्दरकाण्ड ॥
श्रीरामचरितमानस का पञ्चम सोपान 'सुन्दरकाण्ड' श्री हनुमान जी के असीम पराक्रम, बुद्धि, अनन्य रामभक्ति और सेवाभाव का परम पावन आख्यान है। इसका पाठ समस्त अमंगलों, संकटों और भयों का नाश कर सर्वसुख एवं विजय प्रदान करता है।
॥ १ ॥
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम्॥ १ ॥
अर्थ : जो शांत, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), पापरहित, मोक्ष रूपी परम शांति देने वाले, ब्रह्मा, शिव और शेषनाग द्वारा नित्य सेवित, वेदों के सार, सर्वव्यापी, राम नाम से प्रसिद्ध, जगत के स्वामी, देवताओं के पूज्य, माया से मनुष्य रूप धारण करने वाले, करुणा की खान, रघुकुल शिरोमणि और राजाओं के मुकुटमणि हैं — उन भगवान श्रीहरि की मैं वंदना करता हूँ।
॥ २ ॥
नान्यस्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ २ ॥
अर्थ : हे रघुपते! मेरे हृदय में आपके अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं है। मैं सर्वथा सत्य कहता हूँ और आप सबके अंतर्यामी हैं। हे रघुकुल श्रेष्ठ! मुझे अपनी अनन्य, अचल भक्ति प्रदान कीजिए और मेरे मन को काम, क्रोध आदि समस्त दोषों से सर्वथा मुक्त कीजिए।
॥ ३ ॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३ ॥
अर्थ : जो अतुलित बल के धाम हैं, जिनका शरीर सुवर्ण पर्वत (सुमेरु) के समान कांतिमान है, जो दैत्यों रूपी वन को भस्म करने के लिए दावानल के समान हैं, ज्ञानियों में अग्रगण्य हैं, समस्त सद्गुणों के भंडार हैं, वानरों के स्वामी हैं और श्रीरघुनाथजी के परम प्रिय भक्त हैं — उन पवनपुत्र श्रीहनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ ४ ॥
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥
अर्थ : जाम्बवान् के उत्साहवर्धक सुंदर वचन सुनकर हनुमान जी के हृदय को अत्यंत प्रसन्नता हुई। हनुमान जी ने सभी वानरों से कहा — हे भाइयो! जब तक मैं सीता जी को देखकर वापस न आऊँ, तब तक आप सभी कंद-मूल-फल खाकर और दुख सहकर यहीं मेरी प्रतीक्षा करें। कार्य अवश्य सिद्ध होगा, क्योंकि मेरे हृदय में बड़ा भारी उत्साह और हर्ष है।
॥ ५ ॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुं माथा। चलेउ हरषि हियं धरि रघुनाथा॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥ १ ॥
अर्थ : यह कहकर सबको मस्तक नवाकर और हृदय में श्रीरघुनाथ जी को धारण करके हनुमान जी हर्षित होकर चले। समुद्र के तट पर एक सुंदर पर्वत था, वे खेल ही खेल में कूदकर उसके ऊपर चढ़ गए।
॥ ६ ॥
बार बार रघुबीर संभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भांति चलेउ हनुमाना॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥
अर्थ : बारंबार श्रीरघुवीर का स्मरण करके पवनपुत्र हनुमान जी बड़े भारी बल से उछले। जिस पर्वत पर हनुमान जी ने अपने चरण रखे, वह तुरंत पाताल में धंस गया। जैसे श्रीरघुनाथ जी का अमोघ बाण चलता है, उसी प्रकार हनुमान जी आकाश मार्ग से उड़े। समुद्र ने उन्हें श्रीराम का दूत विचारकर मैनाक पर्वत से कहा कि तुम हनुमान जी की थकान दूर करने के लिए ऊपर उठो।
॥ ७ ॥
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हे बिनु मोहि कहां बिश्राम॥ २ ॥
अर्थ : हनुमान जी ने मैनाक पर्वत को केवल हाथ से छू दिया और प्रणाम करके कहा — जब तक श्रीराम जी का कार्य पूरा न हो जाए, तब तक मेरे लिए विश्राम कहाँ!
॥ ८ ॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुं बल बुद्धि बिसेषा॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥
राम काजु करि आवौं माई। तब बदना पैठिहउं आई॥
सत्य कहउं मोहि जान दे माई। सुनि न देइ सुरसा समुझाई॥
कवनहुं जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥
अर्थ : देवताओं ने पवनपुत्र को जाते देखा तो उनके विशेष बल-बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए सर्पों की माता सुरसा को भेजा। सुरसा ने आकर कहा — आज देवताओं ने मुझे यह आहार दिया है। यह सुनकर हनुमान जी ने कहा — हे माता! मैं श्रीराम का कार्य करके लौट आऊँ, तब आकर तुम्हारे मुख में प्रवेश कर जाऊँगा। अभी मुझे जाने दो। किन्तु जब सुरसा ने नहीं माना, तब हनुमान जी ने कहा — अच्छा, तो तुम मुझे ग्रस लो।
॥ ९ ॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तीस भयऊ॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
अर्थ : सुरसा ने एक योजन (चार कोस) का मुख फैलाया, तो हनुमान जी ने अपना शरीर दो योजन का कर लिया। उसने सोलह योजन का मुख किया, तो हनुमान जी बत्तीस योजन के हो गए। जैसे-जैसे सुरसा ने मुख बढ़ाया, हनुमान जी ने उससे दूना रूप दिखा दिया। जब उसने सौ योजन का मुख किया, तब हनुमान जी ने तुरंत अत्यंत सूक्ष्म रूप धारण किया और उसके मुख में प्रवेश कर तुरंत बाहर निकल आए और सिर नवाकर विदा मांगी।
॥ १० ॥
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ ३ ॥
अर्थ : सुरसा ने कहा — हे बल और बुद्धि के निधान! आप श्रीराम जी के समस्त कार्य सिद्ध करेंगे। ऐसा आशीर्वाद देकर वह चली गई और हनुमान जी हर्षित होकर आगे बढ़े।
॥ ११ ॥
सिंधु महुं एक जलचरि रहई। मगु नभ उड़ते खगन्हि गहाई॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहां जाइ देखी बहु सोभा। बन कुसुमित मन मुनि मन लोभा॥
कनक कोटि विचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चौहट सुहट सुबट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
अर्थ : समुद्र में सिंहिका नाम की एक जलचरी रहती थी, जो आकाश में उड़ते हुए जीवों की परछाईं पकड़कर उन्हें खींच लेती थी। बुद्धिमान वीर हनुमान जी ने उसका वध किया और समुद्र के पार पहुँच गए। वहाँ जाकर उन्होंने लंका की अनुपम शोभा देखी। वन पुष्पों से लदे थे। सोने का परकोटा, मणियों से जड़े सुंदर भवन, चौराहे, सुंदर गलियाँ और बाजारों से वह नगर अत्यंत सुसज्जित था।
॥ १२ ॥
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥ ४ ॥
अर्थ : नगर के बहुत से रक्षकों को देखकर हनुमान जी ने विचार किया कि रात्रि के समय अत्यंत छोटा रूप धारण करके नगर में प्रवेश करूँ।
॥ १३ ॥
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहां लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥
पुनि संभारि उठी सो लंका। जोरि पानि कर बिनय असंका॥
अर्थ : मच्छर के समान छोटा रूप धारण करके हनुमान जी भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए लंका की ओर चले। लंकिनी नाम की राक्षसी ने उन्हें रोका और कहा — तू मुझे अनादर करके कहाँ चला जा रहा है? क्या तू नहीं जानता कि यहाँ जितने चोर आते हैं, वे सब मेरा आहार बनते हैं? महाकपि हनुमान जी ने उसे एक घूंसा मारा, जिससे वह खून की उल्टी करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। फिर संभलकर उठकर उसने हाथ जोड़कर निर्भय होकर प्रार्थना की।
॥ १४ ॥
तात मोर अति पुन्य बहु देखउँ नयन तुम्हार।
होइ सुफल सब जनम मम लंका जितेहु हमार॥ ५ ॥
अर्थ : लंकिनी ने कहा — हे तात! मेरे बड़े भारी पुण्य हैं कि आज मैंने अपनी आँखों से आपके दर्शन किए। मुझे ब्रह्माजी ने पूर्वकाल में ही बता दिया था कि जब किसी वानर के प्रहार से तू व्याकुल हो जाए, तब राक्षसों का विनाश निकट जान लेना।
॥ १५ ॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयं राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥
अर्थ : अयोध्यापुरी के राजा श्रीराम को हृदय में धारण करके नगर में प्रवेश कीजिए और सब कार्य कीजिए। जिसके ऊपर श्रीराम कृपा करते हैं, उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र बन जाते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि शीतल हो जाती है और सुमेरु पर्वत धूल के कण के समान हो जाता है। हनुमान जी अति सूक्ष्म रूप धारण कर भगवान का स्मरण करते हुए नगर में प्रविष्ट हुए।
॥ १६ ॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहं तहं अगनित जोधा॥
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुं न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहं भिन्न बनावा॥
अर्थ : हनुमान जी ने एक-एक महल की खोज की, जहाँ-तहाँ अगणित योद्धा देखे। फिर वे रावण के महल में गए, जो अत्यंत विचित्र था। वहाँ उन्होंने रावण को सोए हुए देखा, किन्तु जानकी जी वहाँ दिखाई नहीं दीं। आगे बढ़ने पर उन्हें एक सुंदर भवन दिखाई दिया, जिसमें भगवान का एक अलग मंदिर बना हुआ था।
॥ १७ ॥
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहं देखि हरषि कपिराइ॥ ६ ॥
अर्थ : वह भवन श्रीराम के आयुधों (धनुष-बाण) के चिह्नों से अंकित था और उसकी शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता था। वहाँ नवीन तुलसी के पौधों का समूह देखकर कपिराज हनुमान जी अत्यंत हर्षित हुए।
॥ १८ ॥
लंका निसिचर निकर निवासा। इहां कहां सज्जन कर बासा॥
मन महुं तरक करैं कपि लागा। तेही समय बिभीषनु जागा॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउं पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषन उठि तहं आए॥
अर्थ : हनुमान जी विचार करने लगे कि यह लंका तो राक्षसों का निवास स्थान है, यहाँ किसी सज्जन का वास कैसे हो सकता है? उसी समय विभीषण जी जागे और उन्होंने 'राम-राम' का पावन स्मरण किया। हनुमान जी ने जान लिया कि यह कोई संत पुरुष हैं। उन्होंने सोचा कि इनसे परिचय करना चाहिए, क्योंकि संत से कभी कोई कार्य की हानि नहीं होती। हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण कर वचन कहे, जिसे सुनकर विभीषण जी उठकर वहाँ आए।
॥ १९ ॥
करि प्रनाम पूछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥
की तुम्ह हरि भक्तन्ह महं कोई। जेहिं महं प्रीति राम की होई॥
की तुम्ह दीनबंधु रघुराया। मोहि दीन पर कीन्हि कि दाया॥
तब हनुमंत कही सब रीती। दोऊ जन मिले प्रेम रस प्रीती॥
अर्थ : विभीषण जी ने प्रणाम करके कुशलता पूछी और कहा — हे विप्रवर! अपना परिचय देकर मेरी जिज्ञासा शांत कीजिए। क्या आप श्रीहरि के भक्तों में से कोई हैं अथवा क्या आप स्वयं दीनानाथ श्रीरघुनाथ जी हैं, जो मुझ दीन पर कृपा करने पधारे हैं? तब हनुमान जी ने अपना सारा वृत्तांत सुनाया और दोनों अनन्य रामभक्त परस्पर प्रेम से गले मिले।
॥ २० ॥
तात कबहुं मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा कृपा के नाथा॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥ ७ ॥
अर्थ : विभीषण जी ने कहा — हे तात! क्या कृपानिधान श्रीराम मुझ अनाथ को जानकर कभी कृपा करेंगे? मेरा तामसी शरीर है, साधना का कोई बल नहीं है और न मन में उनके चरणकमलों के प्रति पूर्ण प्रीति है।
॥ २१ ॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू। पर रघुबीर कीन्ह बैछोहू॥
कवन सो अधम जासु प्रभु नाहीं। कीन्ह कृपा सोइ जन मन माहीं॥
अर्थ : हनुमान जी ने कहा — हे विभीषण! सुनिए, प्रभु श्रीराम का तो ऐसा स्वभाव है कि वे अपने सेवक पर सदा स्नेह करते हैं। हमारा वानर कुल ऐसा है कि प्रातःकाल जो हमारा नाम ले, उसे उस दिन भोजन न मिले। जब मुझ जैसे अधम पर भी श्रीरघुनाथ जी ने ऐसी कृपा की है, तब आप तो उनके अनन्य भक्त हैं!
॥ २२ ॥
एहि बिधि सकल कथा समुझाई। पुनि बिभीषन जुगुति बताई॥
असोक बाटिका जाहु कपीसा। जहं बसति सिय जनकसुता ईसा॥
बिदा मागि पुनि चलेउ हनुमाना। गयउ जहां असोक बन ठाना॥
दीखि सियहि कृस तनु अनुमाना। संजोगिनि जिमि मन भगवाना॥
अर्थ : इस प्रकार सारी चर्चा करके विभीषण जी ने युक्ति बताई कि हे कपीश! आप अशोक वाटिका में जाइए, जहाँ जानकी जी रहती हैं। विभीषण जी से विदा लेकर हनुमान जी अशोक वाटिका पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि माता सीता अत्यंत कृश शरीर वाली हैं, उनका ध्यान निरंतर भगवान श्रीराम के चरणों में लीन है।
॥ २३ ॥
तरु पल्लव महुं रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई॥
तेही समय दसानन आवा। संग नारि बहु साजि बनावा॥ ८ ॥
अर्थ : हनुमान जी वृक्ष के पत्तों में छिपकर विचार करने लगे कि अब क्या करना चाहिए। उसी समय रावण बहुत सी स्त्रियों के साथ सज-धजकर वहाँ आया।
॥ २४ ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥
कह मंदोदरि आदि सब रानी। तव अनुचरीं करौं अनुमानी॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सुनि दसमुख खद्योत समाना। रघुपति बिरह बान बलवाना॥
सठ सूने हरि आनिहि मोही। अधम लाज नहिं आवति तोही॥
अर्थ : दुष्ट रावण ने सीता जी को साम, दान, भेद और भय दिखाकर बहुत प्रकार से समझाया और कहा कि मंदोदरी आदि सब रानियों को मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा। वैदेही जी ने एक तिनके की ओट लेकर परम स्नेही अवधपति श्रीराम का स्मरण करते हुए कहा — हे दशमुख! सुन, तू जुगनू के समान है और श्रीराम सूर्य के समान तेजस्वी हैं। तू मुझे सूने वन से चुरा लाया है, क्या तुझे लज्जा नहीं आती?
॥ २५ ॥
सुनि कठोर बचन दसानन। गहि करबाल बोलि अति दारुन॥
काटौं तोर सीस सुनि बानी। नहिं त मानु मम बचन सयानी॥
मास दिवस महुं कहा न माना। तौ मैं मारि काढ़िहउं प्राना॥
यह कहि गयउ भवन दससीसा। सीतहिं त्रास देखावहिं ईसा॥
अर्थ : सीता जी के कठोर वचन सुनकर रावण ने तलवार खींच ली और अत्यंत दारुण वचन कहे कि यदि एक महीने के भीतर तूने मेरी बात न मानी, तो मैं तेरा शीश काट डालूँगा। ऐसा कहकर रावण अपने महल को लौट गया और राक्षसियाँ माता सीता को भय दिखाने लगीं।
॥ २६ ॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ ९ ॥
अर्थ : उनमें त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी, जो श्रीराम के चरणों में प्रीति रखने वाली और विवेकशील थी। उसने सब राक्षसियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया कि मैंने देखा कि एक वानर ने लंका जला दी और रावण का सर्वनाश हो गया; अतः सीता जी की सेवा करके अपना कल्याण करो।
॥ २७ ॥
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुं बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥
अर्थ : त्रिजटा ने कहा — मैंने स्वप्न में देखा कि एक वानर ने लंका को जला दिया, समस्त राक्षस सेना मारी गई, रावण गधे पर सवार होकर मुंडे सिर दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है और विभीषण ने लंका का राज्य पा लिया है तथा नगर में श्रीरघुवीर की दुहाई फिर गई है।
॥ २८ ॥
यह सपना मैं कहउं पुकारी। होइहि सत्य गएं दिन चारी॥
तासु बचन सुनि सब डरपानीं। जनकसुता के चरनन्हि आनीं॥ १० ॥
अर्थ : त्रिजटा ने कहा — यह स्वप्न चार दिनों में अवश्य सत्य होगा। उसके वचन सुनकर सब राक्षसियाँ भयभीत हो गईं और सीता जी के चरणों में गिर पड़ीं।
॥ २९ ॥
त्रिजटा सन बोलीं बैदेही। मातु बिपति संगिनि भलि जेही॥
बार बार कह सीय सुबानी। पावहुं बेगि बिपिन महुं रानी॥
देखी कपि सिय परम दुखारी। अंसुअन्ह नयन भरी जल भारी॥
तब हनुमंत मधुर फल तोरे। मुद्रिका डारि दीन्हि कर जोरे॥
अर्थ : सीता जी ने त्रिजटा से कहा — हे माता! तुम ही इस विपत्ति में मेरी सच्ची संगिनी हो। अब मेरा यह दुख सहा नहीं जाता, तुम कोई उपाय करके मुझे चिता बनाकर अग्नि दे दो। त्रिजटा के चले जाने पर सीता जी को अत्यंत व्याकुल देखकर हनुमान जी ने वृक्ष के ऊपर से प्रभु श्रीराम की दी हुई पावन मुद्रिका (अंगूठी) नीचे गिरा दी।
॥ ३० ॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुंदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदय अकुलानी॥
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
कपि करि गूढ़ बचन मन भाए। राम चरित अति मधुर सुनाए॥
अर्थ : सीता जी ने उस मनोहर अंगूठी को देखा, जिस पर श्रीराम का सुंदर नाम अंकित था। वे आश्चर्यचकित होकर देखने लगीं। वे सोचने लगीं कि अजेय श्रीरघुनाथ जी को कौन जीत सकता है और माया से ऐसी अंगूठी बनाई नहीं जा सकती। उसी समय हनुमान जी ने वृक्ष की डाल पर बैठकर अत्यंत मधुर वाणी में श्रीराम जी के पावन चरित्र का गान करना प्रारंभ किया।
॥ ३१ ॥
स्रवनामृत सुनि कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होइ किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥ ११ ॥
अर्थ : कानों के लिए अमृत रूप इस कथा को सुनकर सीता जी ने कहा — यह सुंदर कथा कहने वाला जो कोई भी हो, वह मेरे सम्मुख प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान जी उनके सम्मुख आए। उन्हें वानर रूप में देखकर सीता जी विस्मित हो गईं।
॥ ३२ ॥
कपि रूप धरि बचन सुनाए। राम दूत मैं मातु पठाए॥
हरि रुख देखि बानरहिं संका। की कपि रूप कीन्हि खल लंका॥
राम दूत मैं मातु सत्य कहि। जानकी चरन कमल सिरु नहि॥
यह मुद्रिका मात मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहं सहिदानी॥
अर्थ : हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा — हे माता! मैं श्रीराम का दूत हूँ। सीता जी ने सोचा कि कहीं यह रावण की कोई नई माया तो नहीं है? हनुमान जी ने कहा — हे माता! मैं सत्य कहता हूँ कि मैं श्रीराम का ही दूत हूँ और प्रमाण के रूप में प्रभु ने यह मुद्रिका मुझे आपके लिए दी है।
॥ ३३ ॥
नर बानरहि संग कहु कैसे। कही कथा भइ संगति जैसे॥
कपि के बचन सप्रेम सुनीते। उपजी बिरह बिपति सब बीते॥
जानि राम प्रिय सेवक जानी। भयउ प्रेम अश्रु जल पानी॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुं बहुत रघुनायक छोहू॥
अर्थ : सीता जी ने पूछा — मनुष्यों और वानरों का साथ कैसे हुआ? तब हनुमान जी ने पूरी कथा सुनाई। हनुमान जी के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर सीता जी को विश्वास हो गया। उन्हें श्रीराम का प्रिय सेवक जानकर सीता जी के नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे। उन्होंने आशीर्वाद दिया — हे तात! तुम अजर, अमर और समस्त गुणों के निधान होओ तथा श्रीरघुनाथ जी तुम पर सदा अपार कृपा करें!
॥ ३४ ॥
करहुं कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥
बार बार नाइ पद सीसा। बोले बचन जोरि कर ईसा॥ १२ ॥
अर्थ : 'प्रभु तुम पर कृपा करें' — यह वचन सुनते ही हनुमान जी पूर्ण प्रेम में मग्न हो गए। वे बारंबार माता के चरणों में शीश नवाकर हाथ जोड़कर बोले।
॥ ३५ ॥
अब मोहि मातु कछु भय नाहीं। देखि पयोधि पार कपि माहीं॥
मातु भूख मोहि अतिसय लागी। फल खाऊँ रुचि अति अनुरागी॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। महाबली निसिचर अति भारी॥
तिन्ह कर भय नहिं मोहि महतारी। जौं तुम्ह देहु कृपा अनुहारी॥
अर्थ : हनुमान जी ने कहा — हे माता! अब मुझे किसी का भय नहीं है। मुझे बड़ी भूख लगी है, यदि आपकी आज्ञा हो तो इस अशोक वाटिका के सुंदर फल खा लूँ। सीता जी ने कहा — हे पुत्र! वन की रखवाली बड़े बलवान राक्षस करते हैं। हनुमान जी ने कहा — हे माता! यदि आपकी कृपा हो, तो मुझे उनका तनिक भी भय नहीं है।
॥ ३६ ॥
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदय धरि तात मधुर फल खाहु॥ १३ ॥
अर्थ : हनुमान जी को बल और बुद्धि में अत्यंत निपुण देखकर जानकी जी ने कहा — जाओ तात! श्रीरघुनाथ जी के चरणों को हृदय में धारण करके मीठे-मीठे फल खाओ।
॥ ३७ ॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहां बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥
नाथ एक आवा कपि भारी। असोक बाटिका उजारी॥
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
अर्थ : हनुमान जी प्रणाम करके अशोक वाटिका में प्रविष्ट हुए। उन्होंने फल खाए और वृक्षों को उखाड़ना शुरू कर दिया। जो राक्षस रखवाली कर रहे थे, उनमें से बहुतों को मार डाला और कुछ ने जाकर रावण से पुकार की कि एक विशाल वानर ने अशोक वाटिका उजाड़ दी है। यह सुनकर रावण ने अनेक योद्धा भेजे, जिन्हें देखकर हनुमान जी ने भीषण गर्जना की।
॥ ३८ ॥
सब मारि मारि कपि डारे। पुनि पुनि आयसु भट संहारे॥
पठयउ बहुरि अच्छकुमारा। आवा संग लै कटक अपारा॥
आवत देखि मारुतसुता। मारा गदा करि अति प्रभूता॥
पल महुं अच्छ मारि संहारा। गर्जेउ कपि भुवन उजियारा॥
अर्थ : हनुमान जी ने उन समस्त राक्षसों का संहार कर दिया। तब रावण ने अपने पराक्रमी पुत्र अक्षय कुमार को अपार सेना के साथ भेजा। आते ही हनुमान जी ने एक वृक्ष उखाड़कर उसके रथ पर दे मारा और क्षण भर में अक्षय कुमार का वध कर दिया।
॥ ३९ ॥
सुत बध सुनि दसकंधर लागा रिस अकुलाइ।
पठएसि मेघनाद कहुं बलवान गरुआई॥ १४ ॥
अर्थ : पुत्र का वध सुनकर रावण क्रोध से व्याकुल हो उठा और उसने अपने सबसे बड़े बलवान पुत्र मेघनाद को भेजा।
॥ ४० ॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु बध सुनि उपजा क्रोधा॥
कपि देखा दारुन भट आवा। कटक कटकि करि नाद सुनावा॥
ब्रह्म अस्त्र तेहिं सांधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
अर्थ : अतुलनीय योद्धा इंद्रजीत (मेघनाद) भाई के वध से क्रोधित होकर चला। दोनों में भीषण संग्राम हुआ। जब मेघनाद का कोई उपाय न चला, तब उसने ब्रह्मास्त्र का संधान किया। हनुमान जी ने विचार किया कि यदि मैं ब्रह्मास्त्र का मान नहीं रखूँगा, तो उसकी अपार महिमा नष्ट हो जाएगी; अतः वे उसके प्रभाव से मूर्छित होकर गिर पड़े।
॥ ४१ ॥
ब्रह्म बान कपि कहुं तेहिं बांधा। लंका लै गयउ दसकंधर कांधा॥
जातुधान सब कौतुक देखा। कपिहि देखि बिस्मय बिसेषा॥ १५ ॥
अर्थ : मेघनाद ने हनुमान जी को नागपाश में बाँध लिया और रावण की सभा में ले गया। समस्त राक्षस आश्चर्यचकित होकर इस महाबली वानर को देखने लगे।
॥ ४२ ॥
सभा माहिं कपि गयउ निहारी। दसमुख देखि रिस अति भारी॥
कह दसकंधर कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा॥
की तुम्ह कीन्हि न श्रवन हमारी। हम त्रिभुवन जयकारी भारी॥
हंसेउ कपि सुनि दसमुख बानी। कह सुनु रावन परम गियानी॥
अर्थ : हनुमान जी रावण की सभा में पहुँचे। रावण ने क्रोध से लाल होकर पूछा — रे वानर! तू कौन है? किसके बल पर तूने अशोक वाटिका उजाड़ी और मेरे पुत्र का वध किया? क्या तूने मेरा प्रताप नहीं सुना? रावण की बात सुनकर हनुमान जी हँसे और बोले — हे रावण! सुनो।
॥ ४३ ॥
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन लरी लराई॥
बालिहि संग भइ जो मिती। सब कछु जानउँ तोरि अनीती॥
अर्थ : हनुमान जी ने कहा — जिनके लेशमात्र बल से तुमने सम्पूर्ण चराचर जगत को जीता है और जिनकी प्रिय पत्नी का तुमने छल से हरण किया है, मैं उन्हीं प्रभु श्रीराम का दूत हूँ। मैं तुम्हारी शक्ति को भली-भाँति जानता हूँ, जब सहस्रबाहु और बालि से तुम्हारा पाला पड़ा था!
॥ ४४ ॥
सुनु रावन परिहरि अभिमाना। भजु रामहि करु कल्याना॥
सरन गएं प्रभु छाड़ि न काहू। कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू॥ १६ ॥
अर्थ : हे रावण! अहंकार त्यागकर श्रीराम की शरण में आ जाओ और अपना कल्याण करो। जो कोई भी श्रीराम की शरण में जाता है, चाहे उस पर करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का पाप ही क्यों न हो, प्रभु उसे क्षमा कर अभय कर देते हैं।
॥ ४५ ॥
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बोलि दसानन मंद मुसकाना॥
मारहु एहि न राखहु प्रानी। सुनत सचिव सब भए दुखानी॥
नीति बिरोध न मारहिं दूता। आन दंड कछु करिहु अनूता॥
कपि कै ममता पूंछ पर सबहि कहहु समुझाइ।
तेल बोरि पट बांधि पुनि पावक देहु लगाइ॥
अर्थ : हनुमान जी के वचन सुनकर रावण क्रोधित होकर बोला — इस वानर को तुरंत मार डालो। विभीषण आदि मंत्रियों ने नीति का विचार देकर कहा कि दूत को मारना अनुचित है, इसे कोई अन्य दंड दिया जाए। रावण ने कहा — वानरों की पूंछ पर अत्यंत ममता होती है; अतः इसकी पूंछ में कपड़ा लपेटकर, तेल डालकर आग लगा दो।
॥ ४६ ॥
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूंछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहं आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं उपहासी॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूंछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रूप तुरंता॥
अर्थ : हनुमान जी ने अपनी पूंछ इतनी बढ़ाई कि नगर में कपड़ा, घी और तेल कम पड़ गया। नगरवासी तमाशा देखने आए और पूंछ में आग लगा दी। आग लगते ही हनुमान जी ने तुरंत अत्यंत सूक्ष्म रूप धारण कर लिया और अपने बंधन खोलकर महलों की छतों पर कूदने लगे।
॥ ४७ ॥
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥ १७ ॥
अर्थ : भगवान की प्रेरणा से उसी समय उनचासों पवन प्रचंड वेग से चलने लगे। हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और उनका शरीर आकाश के समान विशाल हो गया।
॥ ४८ ॥
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ि धाई॥
जरी लंक जरि गए कनक गृह। हाहाकार महां पुर अति बह॥
तात मात हा सुत यहि ओरा। रक्षा कोउ न करै बह जोरा॥
एक बिभीषन कर गृह नाहीं। जारेउ सो हरि चरन महीं॥
अर्थ : विशाल किन्तु अत्यंत हल्का शरीर धारण करके वे एक महल से दूसरे महल पर कूदने लगे। सोने के भवन जलने लगे और पूरी लंका में हाहाकार मच गया। सब पुकारने लगे — रक्षा करो! केवल विभीषण जी का घर नहीं जला, क्योंकि वे श्रीहरि के अनन्य भक्त थे।
॥ ४९ ॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥ १८ ॥
अर्थ : हनुमान जी ने उलट-पलटकर पूरी लंका को भस्म कर दिया और फिर समुद्र में कूदकर अपनी पूंछ की अग्नि को शांत किया।
॥ ५० ॥
पुनि सीय पहिं गयउ हनुमाना। हाथ जोरि सिरु नाइ सुजाना॥
मातु मोहि दीजै कछु चीन्हा। जैसे रघुनायक कहं दीन्हा॥
चूड़ामनि उतारि तब दीन्हा। हरष समेत पवनसुत लीन्हा॥
कहहु संदेस मोर प्रभु पाहीं। तात कृपा करि बिलंब न लाहीं॥
अर्थ : इसके उपरांत हनुमान जी पुनः सीता जी के पास गए और प्रणाम करके कहा — हे माता! मुझे कोई ऐसी पहचान दीजिए, जिसे देखकर श्रीरघुनाथ जी को विश्वास हो। तब सीता जी ने अपने सिर से उतारकर दिव्य चूड़ामणि दी, जिसे हनुमान जी ने हर्षपूर्वक स्वीकार किया। सीता जी ने कहा — हे तात! प्रभु से मेरा संदेश कहना कि वे शीघ्र पधारकर मेरा उद्धार करें।
॥ ५१ ॥
सीता चरन नाइ सिरु चला सो हरषित गात।
सिंधु पार कपि आइ गयउ किलकिलाक किलकात॥ १९ ॥
अर्थ : माता सीता के चरणों में मस्तक नवाकर हनुमान जी अत्यंत हर्षित होकर चले और एक ही छलांग में समुद्र पार करके गर्जना करते हुए अपने वानर मित्रों के पास पहुँच गए।
॥ ५२ ॥
मिले सकल कपि हरषित भारी। लखि हनुमंत काजु भइ सारी॥
जामवंत अंगद सब आए। मधुबन महुं फल खाइ अघाए॥
चले सुग्रीव जहां रघुराई। जाइ चरन गहे सब भाई॥
कपिन्ह कही सब सुंदर बाता। सुनत राम पुलकित भए गाता॥
अर्थ : सब वानर हनुमान जी से मिलकर अत्यंत आनंदित हुए। सबने मधुवन में फल खाए और फिर किष्किंधा जाकर सुग्रीव तथा भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया। सबने हनुमान जी के सफल कार्य की कथा सुनाई, जिसे सुनकर प्रभु श्रीराम का रोम-रोम पुलकित हो उठा।
॥ ५३ ॥
हनूमान गहे चरन प्रभु प्रीति न हृदय समाइ।
उठाइ लिए रघुबीर तब हरषि लगाए कंठ॥ २० ॥
अर्थ : हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम के चरण पकड़ लिए, उनके हृदय में अपार प्रेम समा नहीं रहा था। तब श्रीरघुवीर ने उन्हें उठाकर हर्षपूर्वक अपने हृदय से लगा लिया।
॥ ५४ ॥
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ तजेउ अस संका॥
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोइ लंका जरि गई हमारी॥
सुनि प्रभु बचन पुलक अनुरागा। कपि चरनन्हि पर पुनि लागा॥
राम कृपा सम कछु जग नाहीं। जेहिं सुमिरत सब संकट जाहीं॥
अर्थ : श्रीराम ने पूछा — हे कपि! तुमने उस दुर्गम लंका को कैसे जलाया? हनुमान जी ने कहा — हे प्रभु! यह सब आपके प्रताप रूपी दावानल का प्रभाव था, जिसके आगे लंका तिनके के समान भस्म हो गई।
॥ ५५ ॥
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिचारि सुजान॥ २१ ॥
अर्थ : श्रीरघुनाथ जी के गुणों का गान सम्पूर्ण मंगलों को देने वाला है। जो बुद्धिमान मनुष्य आदरपूर्वक इसका श्रवण और पठन करते हैं, वे बिना किसी प्रयास के इस भवसागर को पार कर जाते हैं।
॥ इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः सुन्दरकाण्डः सम्पूर्णम् ॥