॥ श्रीहरिः ॥
सूर्य चालीसा

सूर्य चालीसा

परम्परागत

🪔 चालीसा

प्रत्यक्ष देवता भुवन-भास्कर भगवान सूर्य नारायण की वन्दना में रचित यह चालीसा आरोग्य, तेज, यश और दीर्घायु प्रदान करने वाली है। इसमें सप्तरथ-सवार, दिनकर-दिवाकर प्रभु के विश्व-पोषक स्वरूप की स्तुति है।

सूर्य चालीसा

प्रत्यक्ष देवता भुवन-भास्कर भगवान सूर्य नारायण की वन्दना में रचित यह चालीसा आरोग्य, तेज, यश और दीर्घायु प्रदान करने वाली है। इसमें सप्तरथ-सवार, दिनकर-दिवाकर प्रभु के विश्व-पोषक स्वरूप की स्तुति है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ ॐ घृणिः सूर्याय नमः ॥
॥ १ ॥
कनक बदन कुण्डल मकर, मुकुट माल गल भाल।
पद्मासन पद्माभरण, जय जय रवि दयाल॥
॥ २ ॥
अरुण सारथी रथ चढ़े, सप्त तुरंग सुहाय।
सकल तिमिर नाशक प्रभु, रवि जय जय सुखदाय॥
॥ ३ ॥
जय जय जय रवि देव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥
॥ ४ ॥
भास्कर भानु आदि सुख धामा। दिनकर दिवाकर रवि नामा॥
॥ ५ ॥
प्रभाकर मार्तण्ड सुहावन। सकल जगत के जीवन पावन॥
॥ ६ ॥
तपन विवस्वान ज्योति स्वरूपा। कोटि भानु छवि लखत अनूपा॥
॥ ७ ॥
सप्त अश्व रथ सोहत भारी। अरुण सारथी छवि अति न्यारी॥
॥ ८ ॥
कर में पद्म सुशोभित पावन। भक्तन के संकट नशावन॥
॥ ९ ॥
तिमिर विनाशक ज्ञान विधाता। सकल चराचर के तुम त्राता॥
॥ १० ॥
उदय होत जब पूरब लाला। मिटत जगत का सब अंधियारा॥
॥ ११ ॥
पक्षी कलरव गान सुनावैं। सुर नर मुनि सब शीश नवावैं॥
॥ १२ ॥
गायत्री मन्त्र में तुम भासो। सविता रूप जगत उज्यासो॥
॥ १३ ॥
जो जन सूर्य नमस्कार करई। सब रोगों से सो नर तरई॥
॥ १४ ॥
नेत्र ज्योति अरु काया सुहाई। सूर्य कृपा ते सब सुख पाई॥
॥ १५ ॥
हृदय रोग अरु कोढ़ नसावै। जो जन तांबे जल चढ़ावै॥
॥ १६ ॥
अर्घ्य देय जो प्रातः कल्याणा। सूर्य देव करहिं भगवाना॥
॥ १७ ॥
रविवार व्रत करै जो कोई। ताकहं कष्ट कभी नहिं होई॥
॥ १८ ॥
लाल पुष्प चन्दन अछत लाये। धूप दीप नैवेद्य चढ़ाये॥
॥ १९ ॥
सूर्य चालीसा जो नित गावै। सकल मनोरथ सिद्ध सो पावै॥
॥ २० ॥
यश कीर्ति अरु मान बढ़ावै। शत्रु नाश बल विक्रम पावै॥
॥ २१ ॥
राजा जनक जप्यो सुख पायो। रामचन्द्र जब लंक चढ़ायो॥
॥ २२ ॥
आदित्य हृदय स्तोत्र सुसुनायो। रावण मारि विजय पद पायो॥
॥ २३ ॥
युधिष्ठिर जब वन कहं धाये। अक्षय पात्र सूर्य ते पाये॥
॥ २४ ॥
कर्ण महादानी भये वीरा। सूर्य सुवन सब जग गंभीरा॥
॥ २५ ॥
जो जन शरण तुम्हारी आवै। सो नर निश्चय सब सुख पावै॥
॥ २६ ॥
दीन अनाथ पर कृपा तुम्हारी। आय हरहु मम विपद अपारी॥
॥ २७ ॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। अति मन्दमति बुद्धि हमारी॥
॥ २८ ॥
क्षमहु नाथ अपराध हमारा। देहु तेज आरोग्य उदारा॥
॥ २९ ॥
द्वादश रूप तुम्हारे सोहैं। देखि देव मुनि जन मन मोहैं॥
॥ ३० ॥
इन्द्र धाता पर्जन्य त्वष्टा। पूषा अर्यमा भग विधाता॥
॥ ३१ ॥
सविता मित्र वरुण विवस्वान। अंशुमान द्वादश बलवान॥
॥ ३२ ॥
जो जन बारह नाम सुनावै। कोटि जन्म के पाप नसावै॥
॥ ३३ ॥
जय जय जय दिनकर सुखदाता। भुवन प्रकाशक भाग्य विधाता॥
॥ ३४ ॥
आरोग्यं धनं देहि प्रतापा। हरहु सकल संताप त्रितापा॥
॥ ३५ ॥
पुत्र हीन पावै सुत ज्ञानी। धन हीनहिं धन मिलै सुखानी॥
॥ ३६ ॥
अंधहि आंख कोढ़िहि काया। सूर्य देव की ऐसी माया॥
॥ ३७ ॥
सदा सहाय रहहु रवि देवा। करहुं सदा तुम्हारी सेवा॥
॥ ३८ ॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावैं। प्रेम सहित चालीसा गावैं॥
॥ ३९ ॥
अंत समय सुरपुर सिधरावै। सूर्य लोक में वास सो पावै॥
॥ ४० ॥
दास जानि मोहि दीजै दाना। चरण कमल में ध्यान समाना॥
॥ ४१ ॥
जय जय रवि महाराज दयाला। करहु सदा भक्तन प्रतिपाला॥
॥ ४२ ॥
सकल मनोरथ पूर्ण कीजै। तेज प्रताप आरोग्य दीजै॥
॥ ४३ ॥
जो यह सूर्य चालीसा, पढ़े प्रेम चित लाय।
रोग शोक संकट मिटे, सब सुख संपत्ति पाय॥