तैत्तिरीयोपनिषद्
कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय आरण्यक)
कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा का यह उपनिषद् शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली में विभक्त है। इसमें मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, पञ्चकोश विवेक तथा रसो वै सः (आनन्द ही ब्रह्म है) का उदात्त प्रतिपादन है।
॥ श्रीहरिः ॥
॥ अथ तैत्तिरीयोपनिषद् ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
॥ अथ तैत्तिरीयोपनिषद् ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः।
शं नो भवत्वर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः।
नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि।
ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि।
तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु।
अवतु माम्। अवतु वक्तारम्॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
शं नो भवत्वर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः।
शं नो विष्णुरुरुक्रमः।
नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो।
त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि।
ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि।
तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु।
अवतु माम्। अवतु वक्तारम्॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
अर्थ :
मित्रदेव हमारे लिए कल्याणकारी हों, वरुणदेव हमारे लिए कल्याणप्रद हों, सूर्यदेव (अर्यमा) हमारे लिए मंगलकारी हों, देवराज इन्द्र और बृहस्पति हमारे लिए कल्याणकारी हों, और विशाल डग भरने वाले वामन-रूप भगवान विष्णु हमारे लिए कल्याणकारी हों। परब्रह्म को नमस्कार! हे सर्वव्यापक वायुदेव! आपको नमस्कार! आप ही साक्षात् प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। मैं आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा। मैं वास्तविक धर्म (ऋत) कहूँगा, मैं यथार्थ सत्य कहूँगा। वह परब्रह्म मेरी रक्षा करे, वह आचार्य की रक्षा करे। मेरी रक्षा करे, गुरु की रक्षा करे। त्रिविध तापों की शान्ति हो।
॥ प्रथमा शीक्षावल्ली — एकादशोऽनुवाकः ॥
॥ कालजयी दीक्षान्त उपदेश : सत्यं वद, धर्मं चर ॥
॥ कालजयी दीक्षान्त उपदेश : सत्यं वद, धर्मं चर ॥
॥ १ ॥
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति —
सत्यं वद।
धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः।
सत्यान्न प्रमदितव्यम्।
धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्।
भूत्यै न प्रमदितव्यम्।
स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्॥
अर्थ :
वेद का विधिवत् अध्ययन करा चुकने के पश्चात् आचार्य अपने शिष्य को समावर्तन (दीक्षान्त) के समय यह अन्तिम जीवनोपदेश देता है — 'सदा सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय (सद्ग्रन्थों के अध्ययन) में कभी प्रमाद (आलस्य) मत करो। आचार्य के लिए उनकी प्रिय गुरुदक्षिणा अर्पित करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर वंश-परम्परा को मत तोड़ो। सत्य से कभी विचलित मत हो। धर्म के पालन में कभी असावधानी मत करो। अपनी रक्षा और आत्म-कल्याण में कभी प्रमाद मत करो। ऐश्वर्य और शुभ समृद्धि की वृद्धि में कभी प्रमाद मत करो। स्वाध्याय और ज्ञान के प्रचार-प्रवचन में कभी प्रमाद मत करो।'
॥ २ ॥
मातृदेवो भव।
पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।
यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि।
यान्यस्माकꣳ सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि॥
अर्थ :
'माता को देवता के समान पूज्य मानो (मातृदेवो भव)। पिता को देवता के समान मानो (पितृदेवो भव)। गुरु को देवता के समान मानो (आचार्यदेवो भव)। अतिथि को देवता के समान पूज्य मानो (अतिथिदेवो भव)। जो शास्त्रसम्मत अनिन्द्य (दोषरहित) श्रेष्ठ कर्म हैं, केवल उन्हीं का सेवन करना चाहिए, अन्य निन्दित कर्मों का कभी नहीं। हमारे (गुरुओं के) जो शुभ और श्रेष्ठ आचरण हैं, केवल उन्हीं का तुम्हें अनुकरण करना चाहिए, अन्य का नहीं।'
॥ ३ ॥
श्रद्धया देयम्।
अश्रद्धयाऽदेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्।
एष आदेशः।
एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्।
एवमुपासितव्यम्।
एवमु चैतदुपास्यम्॥
अर्थ :
'दान सदा श्रद्धापूर्वक देना चाहिए, बिना श्रद्धा के कभी नहीं देना चाहिए। अपनी सामर्थ्य और सम्पन्नता के अनुरूप उदारता से देना चाहिए। नम्रता और संकोच के साथ देना चाहिए। ईश्वर के भय (सदाचार के आदर) से देना चाहिए। और पूर्ण सहानुभूति व मित्रता के भाव से देना चाहिए। यही वेदों की आज्ञा है, यही गुरु का उपदेश है, यही वेदों का गुह्य रहस्य (उपनिषद्) है, और यही ईश्वर का शासन है। जीवन-भर इसी प्रकार का श्रेष्ठ आचरण करना चाहिए — हाँ, इसी प्रकार आचरण करना चाहिए।'
॥ द्वितीया ब्रह्मानन्दवल्ली ॥
॥ पञ्चकोश विवेक एवं ब्रह्मानन्द की मीमांसा ॥
॥ पञ्चकोश विवेक एवं ब्रह्मानन्द की मीमांसा ॥
॥ ४ ॥
ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम्।
तदेषाऽभ्युक्ता।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।
यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्।
सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति॥
अर्थ :
ब्रह्म को यथार्थ रूप से जानने वाला साधक परम पद (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। इस विषय में यह पावन ऋचा कही गई है — 'सत्य, ज्ञान और अनन्त — यही परब्रह्म का लक्षण है। जो साधक अपने हृदय-गुहा के परम व्योम में विराजमान इस ब्रह्म को जान लेता है, वह उस सर्वज्ञ परब्रह्म के साथ एकीभूत होकर सम्पूर्ण दिव्य आनन्दों का एक साथ उपभोग करता है।'
॥ ५ ॥
तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः।
आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः।
अग्नेरापः।
अद्भ्यः पृथिवी। पृथिव्या ओषधयः। ओषधीभ्योऽन्नम्।
अन्नात्पुरुषः।
स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः॥
अर्थ :
उस परम आत्मा से सर्वप्रथम आकाश उत्पन्न हुआ; आकाश से वायु उत्पन्न हुई; वायु से अग्नि प्रकट हुई; अग्नि से जल उत्पन्न हुआ; जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई; पृथ्वी से समस्त औषधियाँ और वनस्पतियाँ हुईं; औषधियों से अन्न हुआ; और अन्न से यह मनुष्य-शरीर उत्पन्न हुआ। अतः यह दृश्यमान मनुष्य-शरीर वास्तव में अन्न के सार से बना हुआ 'अन्नमय पुरुष' (अन्नमय कोश) है।
॥ ६ ॥
तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात्।
अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः। तेनैष पूर्णः...
तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयात्।
अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः...
तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात्।
अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः...
तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात्।
अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः। तेनैष पूर्णः॥
अर्थ :
इस स्थूल अन्नमय शरीर के भीतर उससे भिन्न एक सूक्ष्म 'प्राणमय आत्मा' (प्राणमय कोश) है, जिससे यह अन्नमय देह परिपूर्ण है। उस प्राणमय के भीतर उससे भी सूक्ष्म 'मनोमय आत्मा' (मनोमय कोश) है। उस मनोमय के भीतर उससे भी श्रेष्ठ और सूक्ष्म 'विज्ञानमय आत्मा' (बुद्धि/विज्ञानमय कोश) है। और उस विज्ञानमय के भी भीतर समस्त कोशों का अन्तर्वर्ती परम 'आनन्दमय आत्मा' (आनन्दमय कोश) है, जिससे यह सम्पूर्ण सत्ता ओतप्रोत है।
॥ ७ ॥
असन्नेव स भवति।
असद्ब्रह्मेति वेद चेत्।
अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद।
सन्तमेनं ततो विदुरिति॥
अर्थ :
यदि कोई मनुष्य ऐसा मानता है कि 'ब्रह्म नहीं है (असत् है)', तो वह स्वयं भी असत् (नष्टप्राय) हो जाता है। किन्तु यदि वह यह दृढ़तापूर्वक जानता है कि 'ब्रह्म है (सत्-स्वरूप है)', तो तत्त्वज्ञानी जन उस साधक को सन्मार्ग पर प्रतिष्ठित और सत्पुरुष मानते हैं।
॥ ८ ॥
रसो वै सः।
रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।
को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्।
यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्।
एष ह्येवानन्दयाति॥
अर्थ :
वह परब्रह्म साक्षात् 'रस' (परमानन्द का दिव्य स्रोत) ही है। इस दिव्य रस को प्राप्त करके ही यह जीवात्मा परमानन्द से परिपूर्ण होता है। यदि इस हृदयाकाश में यह परब्रह्म आनन्द-स्वरूप न होता, तो भला कौन जीवित रह सकता था और कौन श्वास ले सकता था? निश्चय ही यही परमात्मा सम्पूर्ण जगत को आनन्दित करता है।
॥ ९ ॥
यतो वाचो निवर्तन्ते।
अप्राप्य मनसा सह।
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्।
न बिभेति कुतश्चनेति॥
अर्थ :
जिस परब्रह्म को न पाकर मन के साथ सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और वाणी लौट आती हैं — उस परब्रह्म के अनिर्वचनीय आनन्द को जो साधक जान लेता है, वह कभी किसी से भी भयभीत नहीं होता।
॥ तृतीया भृगुवल्ली ॥
॥ महर्षि भृगु की तपस्या एवं 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' ॥
॥ महर्षि भृगु की तपस्या एवं 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' ॥
॥ १० ॥
भृगुर्वै वारुणिः।
वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति।
तस्मा एतत्प्रोवाच — अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति।
तं होवाच — यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।
येन जातानि जीवन्ति।
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
तद्विजिज्ञासस्व। तद्ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा॥
अर्थ :
महर्षि वरुण के पुत्र भृगु अपने पिता वरुण के पास पहुँचे और बोले — 'हे पूज्य पिताजी! मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए।' पिता ने उनसे कहा — 'अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी — ये सब ब्रह्म की उपलब्धियों के द्वार हैं।' फिर उन्होंने ब्रह्म का परम लक्षण बतलाया — 'जिससे ये सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं, और प्रलयकाल में जिस परब्रह्म में पुनः विलीन हो जाते हैं — तू उसी को विशेष रूप से जानने की इच्छा कर; वही परब्रह्म है।' भृगु ने यह सुनकर गहन तप (विचार-मन्थन) किया।
॥ ११ ॥
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्... प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्... मनो ब्रह्मेति व्यजानात्... विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्...
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्।
आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।
आनन्देन जातानि जीवन्ति।
आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति॥
अर्थ :
भृगु ने क्रमशः तपस्या करके जाना — पहले अन्न को ब्रह्म जाना, फिर प्राण को ब्रह्म जाना, फिर मन को ब्रह्म जाना, फिर बुद्धि (विज्ञान) को ब्रह्म जाना; और अन्ततः परमोच्च तप द्वारा साक्षात् अनुभव किया कि — 'आनन्द ही साक्षात् परब्रह्म है!' क्योंकि इस आनन्द-स्वरूप ब्रह्म से ही सम्पूर्ण चर-अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनन्द से ही जीवित रहते हैं, और अन्त में उस आनन्दमय परब्रह्म में ही सदा के लिए विलीन हो जाते हैं।
॥ १२ ॥
अन्नं न निन्द्यात्।
तद्व्रतम्। प्राणो वा अन्नम्। शरीरमन्नादम्...
अन्नं न परिचक्षीत।
तद्व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्...
अन्नं बहु कुर्वीत।
तद्व्रतम्। पृथिवी वा अन्नम्। आकाशोऽन्नादम्...
तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात्।
अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते॥
अर्थ :
साधक को यह व्रत लेना चाहिए कि वह अन्न की कभी निन्दा न करे; अन्न का कभी तिरस्कार न करे; और विपुल अन्न का उत्पादन करे। जो कोई भी अतिथि द्वार पर आए, उसके लिए कभी 'ना' न कहे, अपितु किसी भी उपाय से विपुल अन्न संग्रह करके कहे — 'यहाँ आपके लिए अन्न प्रस्तुत है।' जो उदार भाव से सर्वप्रथम अन्न देता है, उसे अन्न की कभी कमी नहीं होती।
॥ १३ ॥
हा३वु हा३वु हा३वु।
अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्।
अहमन्नादो३ऽहमन्नादो३ऽहमन्नादः।
अहꣳ श्लोककृदहꣳ श्लोककृदहꣳ श्लोककृत्।
अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य।
पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भायि।
यो मा ददाति स इदेव मा३ऽऽवाः।
अहमन्नमन्नमदन्तमद्मि।
अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म्।
सुवर्न ज्योतीः। य एवं वेद॥
अर्थ :
उस सर्वात्मभाव (अद्वैत) को प्राप्त हुआ मुक्त महापुरुष परमानन्द में भरकर यह सामगान गाता है — 'अहो! अहो! अहो! यह सम्पूर्ण भोग्य अन्न भी मैं ही हूँ, मैं ही हूँ, मैं ही हूँ! इस अन्न का उपभोग करने वाला भोक्ता भी मैं ही हूँ, मैं ही हूँ, मैं ही हूँ! इन दोनों का समन्वय करने वाली चेतना भी मैं ही हूँ! मैं सृष्टि के सत्य विधान से पूर्व प्रकट हुआ प्रथम तत्त्व हूँ; देवों से भी पूर्व अमृत की परम नाभि हूँ। जो मुझे दान रूप में अन्न देता है, वह मेरी ही रक्षा करता है। और जो केवल स्वयं खाता है, उस अन्न-भोजी को मैं स्वयं खा जाता हूँ। मैंने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपनी चेतना से आच्छादित कर लिया है; मैं सूर्य के समान परम दिव्य ज्योतिर्मय हूँ!' जो साधक इस अद्वैत रहस्य को जान लेता है, वह इसी अमर आनन्द को प्राप्त होता है।
॥ इति कृष्णयजुर्वेदीया तैत्तिरीयोपनिषद् सम्पूर्णा ॥