विदुर नीति
महात्मा विदुर
महाभारत के उद्योग पर्व में महात्मा विदुर द्वारा राजा धृतराष्ट्र को संकट के समय दिया गया यह मन्त्रणा-उपदेश राजनीति, न्याय, सदाचार और सत्य का अमर भण्डार है। इसमें पण्डित और मूर्ख के लक्षण तथा राज्य-सञ्चालन के शाश्वत नियम वर्णित हैं।
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
॥ अथ विदुरनीतिः ॥
॥ महाभारत उद्योगपर्व (प्रजागर पर्व) ॥
॥ अथ विदुरनीतिः ॥
॥ महाभारत उद्योगपर्व (प्रजागर पर्व) ॥
॥ धृतराष्ट्र उवाच ॥
॥ १ ॥
जाग्रतो दह्यमानस्य श्रेयो यदभिपश्यसि।
तद्ब्रूहि विदुर प्रज्ञ धर्मार्थसहितं वचः॥
अर्थ :
सञ्जय के पाण्डवों के दूत के रूप में लौट आने पर चिन्ता से व्याकुल और अनिद्रा से पीड़ित महाराज धृतराष्ट्र ने कहा — 'हे परम बुद्धिमान विदुर! चिन्ता की आग में जलते हुए मुझ अनिद्रित के लिए जो भी परम कल्याणकारी हो, वह धर्म और नीति से युक्त वचन मुझे सुनाइए।'
॥ विदुर उवाच ॥
॥ पण्डित-लक्षणम् — बुद्धिमान मनुष्य के गुण ॥
॥ २ ॥
आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
अर्थ :
महात्मा विदुर बोले — 'हे राजन्! आत्म-ज्ञान, किसी शुभ कार्य को आरम्भ करने का उत्साह, सुख-दुःख सहने की सहनशीलता (तितिक्षा), और धर्म में निरन्तर निष्ठा — ये जिसके पुरुषार्थ को अपने लक्ष्य से विचलित नहीं करते, वही वास्तव में "पण्डित" (ज्ञानी) कहलाता है।'
॥ ३ ॥
निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।
अनास्तिकः श्रद्दधान एतत् पण्डितलक्षणम्॥
अर्थ :
'जो सदा श्रेष्ठ और धर्मसम्मत कार्यों का सेवन करता है, निन्दित व पाप कर्मों से सदा दूर रहता है, जो नास्तिक नहीं है और ईश्वर तथा सत्शास्त्रों पर दृढ़ श्रद्धा रखता है — यही ज्ञानी पण्डित का लक्षण है।'
॥ ४ ॥
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
अर्थ :
'अत्यधिक क्रोध, उच्छृङ्खल हर्ष, घमण्ड, अनुचित संकोच, जड़ता और स्वयं को अत्यधिक पूज्य मानने का अहंकार — ये दुर्गुण जिसके कर्तव्य-मार्ग से उसे भ्रष्ट नहीं कर पाते, वही सच्चा पण्डित है।'
॥ ५ ॥
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे।
कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
अर्थ :
'जिसके गुप्त विचार, मन्त्रणा और भावी योजनाओं को दूसरे लोग कार्य पूर्ण हो जाने से पहले नहीं जान पाते, केवल कार्य सिद्ध हो जाने पर ही जान पाते हैं — वही नीति-विशारद पण्डित कहलाता है।'
॥ मूढ़-लक्षणम् — मूर्ख मनुष्य के लक्षण ॥
॥ ६ ॥
अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः।
अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः॥
अर्थ :
'जो विद्या-हीन होकर भी घमण्ड से फूला रहता है, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े झूठे आडम्बर रचता है, और बिना पुरुषार्थ किए ही धन-सम्पदा पाने की इच्छा रखता है — उसे ज्ञानियों ने "मूढ़" (मूर्ख) कहा है।'
॥ ७ ॥
अनाहूतः प्रविशति ह्यपृष्टो बहु भाषते।
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥
अर्थ :
'जो बिना बुलाए किसी के घर या सभा में पहुँच जाता है, बिना पूछे बहुत अधिक बोलता है, और जो अविश्वासी कपटी मनुष्य पर भी आँख मूँदकर विश्वास कर लेता है — वह मूढ़चित्त नराधम होता है।'
॥ ८ ॥
एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः।
भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते॥
अर्थ :
'संसार में पाप तो अकेला मनुष्य करता है, और उसके द्वारा जुटाए गए भोगों का उपभोग बहुत से सम्बन्धी करते हैं। अन्त में उपभोग करने वाले तो बच निकलते हैं, किन्तु पाप कर्म करने वाला अकेला ही उस घोर दोष का फल भोगता है।'
॥ अष्टगुण एवं सदाचार-महिमा ॥
॥ ९ ॥
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
अर्थ :
'ये आठ गुण मनुष्य के यश और चरित्र को प्रकाशित करते हैं — १. तीव्र प्रज्ञा (बुद्धि), २. कुलीन आचरण, ३. इन्द्रिय-निग्रह (दम), ४. शास्त्रों का सम्यक् ज्ञान, ५. धर्मयुक्त पराक्रम, ६. मितभाषिता (कम और नाप-तौल कर बोलना), ७. यथाशक्ति दान, और ८. दूसरों के उपकार को मानने की कृतज्ञता।'
॥ १० ॥
अक्रोधेन जयेत्क्रोधमसाधुं साधुना जयेत्।
जयेत्कदर्यं दानेन जयेत्सत्येन चानृतम्॥
अर्थ :
'मनुष्य को चाहिए कि वह क्रोध को शान्ति और क्षमा से जीते; दुर्जन को अपनी सज्जनता से जीते; कृपण (कंजूस) को उदारतापूर्वक दान देकर जीते; और असत्य को सदा सत्य के बल से जीते।'
॥ ११ ॥
सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥
अर्थ :
'हे महाराज धृतराष्ट्र! सदा मीठी और चाटुकारिता-युक्त बातें बोलने वाले मनुष्य तो संसार में सरलता से मिल जाते हैं; किन्तु जो सुनने में कटु हो परन्तु परिणाम में परम कल्याणकारी (पथ्य) हो — ऐसे सत्य वचन को बोलने वाला वक्ता और धैर्य से सुनने वाला श्रोता, दोनों ही संसार में अत्यन्त दुर्लभ हैं।'
॥ १२ ॥
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम्।
नासौ धर्मो यत्र न सत्यमस्ति न तत्सत्यं यच्छलेनानुविद्धम्॥
अर्थ :
'वह सभा नहीं है जिसमें अनुभवी वृद्धजन उपस्थित न हों; वे वृद्ध नहीं हैं जो धर्म का निर्भीक पक्ष न लें; वह धर्म नहीं है जिसमें सत्य न हो; और वह सत्य नहीं है जो छल-कपट से दूषित हो।'
॥ १३ ॥
धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेण परिपालयेत्।
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते॥
अर्थ :
'राजा को चाहिए कि वह धर्मपूर्वक राज्य प्राप्त करे और धर्मपूर्वक ही प्रजा का पालन करे; क्योंकि जो ऐश्वर्य धर्म की दृढ़ नींव पर स्थित होता है, वह राजा न कभी विनष्ट होता है और न वह कभी अपने ऐश्वर्य से हीन होता है।'
॥ इति महाभारते उद्योगपर्वे प्रजागरपर्वे विदुरनीतिसारः समाप्तः ॥