॥ श्रीहरिः ॥
श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम्

श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम्

भीष्म पितामह / वेदव्यास

🌸 स्तोत्र

महाभारत के अनुशासन पर्व में शरशय्या पर लेटे पितामह भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को उपदेशित भगवान विष्णु के एक सहस्र (१०००) पावन नामों का यह स्तोत्र सनातन धर्म के सर्वोत्कृष्ट एवं परम फलदायी स्तोत्रों का मुकुटमणि है।

श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम्

महाभारत के अनुशासन पर्व में शरशय्या पर लेटे पितामह भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को उपदेशित भगवान विष्णु के एक सहस्र (१०००) पावन नामों का यह स्तोत्र सनातन धर्म के सर्वोत्कृष्ट एवं परम फलदायी स्तोत्रों का मुकुटमणि है।

अथ श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य, श्री वेदव्यासो भगवान् ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता।
॥ अथ ध्यानम् ॥
॥ १ ॥
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ : जिनकी आकृति परम शान्त है, जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के भी ईश्वर और सम्पूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, जिनका वर्ण मेघ के समान श्याम है, जो सुन्दर अंगों वाले हैं, जो लक्ष्मी के कान्त (पति) तथा कमल-नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान द्वारा पाते हैं, उन सम्पूर्ण लोकों के एकमात्र स्वामी और संसार-भय का नाश करने वाले भगवान विष्णु की मैं वन्दना करता हूँ।
॥ २ ॥
मेघश्यामं पीतकौशेयवासं
श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम्।
पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं
विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ : जिनका स्वरूप सजल मेघ के समान श्यामवर्ण है, जो पीत रेशमी वस्त्र धारण करते हैं, जिनके वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का पावन चिह्न और कौस्तुभ मणि सुशोभित है, जो पुण्यों के पुंज तथा कमल के समान विशाल नेत्रों वाले हैं, उन सर्वलोकैकनाथ भगवान विष्णु की मैं वन्दना करता हूँ।
॥ पूर्वपीठिका ॥
॥ युधिष्ठिर उवाच ॥
॥ ३ ॥
किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम्॥
अर्थ : युधिष्ठिर बोले — हे पितामह! इस संसार में एकमात्र परम देव कौन हैं? एकमात्र परम आश्रय कौन हैं? किसकी स्तुति करने से और किसका पूजन करने से मनुष्य परम कल्याण को प्राप्त होते हैं?
॥ ४ ॥
को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥
अर्थ : समस्त धर्मों में आपके मत से कौन सा धर्म सर्वश्रेष्ठ है? तथा किस मन्त्र या नाम का जप करने से प्राणी जन्म-मरण रूपी संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है?
॥ भीष्म उवाच ॥
॥ ५ ॥
जगतप्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः॥
अर्थ : भीष्म पितामह बोले — जो सम्पूर्ण जगत के स्वामी, देवों के देव, अनन्त और पुरुषोत्तम हैं, उन भगवान विष्णु के सहस्र नामों द्वारा नित्य-निरन्तर स्तुति करने से मनुष्य समस्त दुःखों से पार हो जाता है।
॥ ६ ॥
तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्।
ध्यायन्स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च॥
अर्थ : उन अविनाशी पुरुषोत्तम का ही अनन्य भक्तिभाव से नित्य अर्चन, ध्यान, स्तुति, वन्दन और यजन करने से प्राणी परम गति को प्राप्त करता है।
॥ ७ ॥
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः।
यद भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा॥
अर्थ : मेरे मत से समस्त धर्मों में यही सर्वश्रेष्ठ धर्म है कि मनुष्य अनन्य भक्ति से कमल-नयन भगवान विष्णु का दिव्य स्तोत्रों द्वारा सदा पूजन करे।
॥ श्रीविष्णुसहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
॥ ८ ॥
ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥
अर्थ : विश्व (सम्पूर्ण प्रपञ्च रूप), विष्णु (सर्वव्यापक), वषट्कार (यज्ञ-स्वरूप), भूत-भव्य-भवत्-प्रभु (तीनों कालों के स्वामी), भूतकृत् (समस्त भूतों के स्रष्टा), भूतभृत् (समस्त जीवों के पोषक), भाव (सद्‌रूप), भूतात्मा (समस्त प्राणियों के अन्तरात्मा) और भूतभावन (समस्त प्राणियों की उत्पत्ति व वृद्धि करने वाले)।
॥ ९ ॥
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च॥
अर्थ : पूतात्मा (परम शुद्ध स्वरूप), परमात्मा (सर्वोच्च चेतना), मुक्तानां परमा गतिः (मुक्त पुरुषों की परम गति), अव्यय (अविनाशी), पुरुष (शरीर रूपी पुर में शयन करने वाले), साक्षी (सबके द्रष्टा), क्षेत्रज्ञ (शरीर को जानने वाले) और अक्षर (कदापि क्षय न होने वाले)।
॥ १० ॥
योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः॥
अर्थ : योग (समाधि-स्वरूप), योगविदां नेता (योगियों के मार्गदर्शक), प्रधान-पुरुषेश्वर (प्रकृति और जीवात्मा दोनों के स्वामी), नारसिंहवपु (नृसिंह रूप धारण करने वाले), श्रीमान् (सकल ऐश्वर्य सम्पन्न), केशव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव के मूल) और पुरुषोत्तम (सर्वश्रेष्ठ पुरुष)।
॥ ११ ॥
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः॥
अर्थ : सर्व (सर्वरूप), शर्व (संहारकर्ता), शिव (परम कल्याणकारी), स्थाणु (अचल-स्थिर), भूतादि (समस्त भूतों के आदि कारण), निधिरव्यय (अक्षय निधि), सम्भव (स्वेच्छा से प्रकट होने वाले), भावन (सबको फल देने वाले), भर्ता (भरण-पोषण करने वाले), प्रभव (दिव्य जन्मदाता), प्रभु (परम समर्थ) और ईश्वर (शासक)।
॥ १२ ॥
स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः॥
अर्थ : स्वयम्भू (स्वयं प्रकट होने वाले), शम्भु (सुख दाता), आदित्य (सूर्य रूप), पुष्कराक्ष (कमल-नेत्र), महास्वन (वेद रूपी गंभीर नाद वाले), अनादिनिधन (उत्पत्ति और विनाश से रहित), धाता (सबको धारण करने वाले), विधाता (कर्मफल दाता) और धातुरुत्तम (सर्वश्रेष्ठ धारक)।
॥ १३ ॥
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः॥
अर्थ : अप्रमेय (प्रमाणों से परे), हृषीकेश (इन्द्रियों के स्वामी), पद्मनाभ (नाभि में कमल धारण करने वाले), अमरप्रभु (देवताओं के प्रभु), विश्वकर्मा (सृष्टि के शिल्पी), मनु (संकल्प रूप), त्वष्टा (रूप संहारक), स्थविष्ठ (अति विशाल) और स्थविरो ध्रुव (पुरातन व अविचल)।
॥ १४ ॥
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्॥
अर्थ : अग्राह्य (इन्द्रियों द्वारा न ग्रहण होने योग्य), शाश्वत (सदा रहने वाले), कृष्ण (आनन्द स्वरूप), लोहिताक्ष (रक्त वर्ण नेत्रों वाले), प्रतर्दन (संहारकारी), प्रभूत (समृद्ध), त्रिककुब्धाम (तीनों दिशाओं के आश्रय), पवित्र (पावन) और मङ्गलं परम् (परम कल्याणकारी)।
॥ १५ ॥
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः॥
अर्थ : ईशान (शासक), प्राणद (प्राण शक्ति देने वाले), प्राण (प्राण स्वरूप), ज्येष्ठ (सबसे पुरातन), श्रेष्ठ (सर्वोत्कृष्ट), प्रजापति (प्रजा के स्वामी), हिरण्यगर्भ (ब्रह्माण्ड के जनक), भूगर्भ (पृथ्वी को गर्भ में धारण करने वाले), माधव (लक्ष्मी के पति) और मधुसूदन (मधु दैत्य का वध करने वाले)।
॥ १६ ॥
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥
अर्थ : ईश्वर (सर्वसमर्थ), विक्रमी (पराक्रमी), धन्वी (शारंग धनुष धारी), मेधावी (परम बुद्धिमान), विक्रम (त्रिविक्रम रूप), क्रम (सर्वव्यापी), अनुत्तम (जिनसे उत्तम कोई नहीं), दुराधर्ष (अपराजेय), कृतज्ञ (भक्ति का सत्कार करने वाले), कृति (कर्म रूप) और आत्मवान् (आत्म-प्रतिष्ठित)।
॥ १७ ॥
सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः॥
अर्थ : सुरेश (देवताओं के स्वामी), शरणं (परम आश्रय), शर्म (परम सुख), विश्वरेता (संसार के बीज रूप), प्रजाभव (प्रजा की उत्पत्ति का स्रोत), अहः (प्रकाशमय दिवस), संवत्सर (काल रूप), व्याल (अग्राह्य सर्प रूप), प्रत्यय (ज्ञान स्वरूप) और सर्वदर्शन (सब कुछ देखने वाले सर्वज्ञ)।
॥ १८ ॥
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः॥
अर्थ : अज (अजन्मा), सर्वेश्वर (सबके ईश्वर), सिद्ध (नित्य प्राप्त), सिद्धि (परम फल), सर्वादिरच्युत (सबके आदि एवं च्युत न होने वाले), वृषाकपि (धर्म एवं वराह रूप), अमेयात्मा (अनन्त स्वरूप) और सर्वयोगविनिःसृत (समस्त बन्धनों से मुक्त)।
॥ १९ ॥
वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मतः समः।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः॥
अर्थ : वसु (सबके निवास स्थान), वसुमना (विशुद्ध मन वाले), सत्य (सत्य स्वरूप), समात्मा (समदृष्टि), असम्मत (अनुपमेय), सम (पक्षपातरहित), अमोघ (सफल संकल्प वाले), पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन), वृषकर्मा (धर्ममय कर्म करने वाले) और वृषाकृति (धर्म स्वरूप)।
॥ २० ॥
रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः।
अमृतः शाश्वतः स्थाणुर्वरारोहो महातपाः॥
अर्थ : रुद्र (दुःख दूर करने वाले), बहुशिरा (सहस्रों मस्तक वाले), बभ्रु (लोकों के पोषक), विश्वयोनि (सृष्टि के उत्पत्ति स्थान), शुचिश्रवा (पवित्र नाम-कीर्ति वाले), अमृत (अमरणधर्मा), शाश्वत स्थाणु (सदा स्थिर), वरारोह (परम पद स्वरूप) और महातपा (महान तपस्वी)।
॥ २१ ॥
सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित्कविः॥
अर्थ : सर्वग (सर्वत्र जाने वाले), सर्ववित् (सर्वज्ञ), भानु (सूर्य रूप ज्योतिर्मय), विष्वक्सेन (जिनके समक्ष कोई सेना न टिक सके), जनार्दन (दुष्टों का दमन व भक्तों की याचना पूर्ण करने वाले), वेद (वेद स्वरूप), वेदविद् (वेदों को जानने वाले), अव्यङ्ग (सम्पूर्ण), वेदाङ्ग (वेदों के अंग) और वेदवित् कवि (वेदों के रहस्यदर्शी क्रान्तदर्शी)।
॥ २२ ॥
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः॥
अर्थ : लोकाध्यक्ष (लोकों के स्वामी), सुराध्यक्ष (देवताओं के अध्यक्ष), धर्माध्यक्ष (धर्म के संरक्षक), कृताकृत (व्यक्त और अव्यक्त रूप), चतुरात्मा (चारों अवस्थाओं के साक्षी), चतुर्व्यूह (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध रूप), चतुर्दंष्ट्र (चार दांतों वाले नृसिंह रूप) और चतुर्भुज (चार भुजाओं वाले)।
॥ २३ ॥
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः॥
अर्थ : भ्राजिष्णु (परम प्रकाशमान), भोजन (भोग्य वस्तु रूप), भोक्ता (अनुभवकर्ता), सहिष्णु (सहनशील), जगदादिज (संसार के आदि में प्रकट), अनघ (पापरहित), विजय (विजय स्वरूप), जेता (सदा विजयी), विश्वयोनि (संसार के कारण) और पुनर्वसु (बारम्बार शरीर में वास करने वाले)।
॥ २४ ॥
उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः॥
अर्थ : उपेन्द्र (इन्द्र के अनुज), वामन (लघु रूप), प्रांशु (त्रिविक्रम विराट रूप), अमोघ (निष्फल न होने वाले), शुचि (परम पवित्र), ऊर्जित (अनन्त बलशाली), अतीन्द्र (इन्द्रियों से अतीत), सङ्ग्रह (प्रलय में समेटने वाले), सर्ग (सृष्टि कर्ता), धृतात्मा (स्वयं में स्थित), नियम (नियमनकर्ता) और यम (नियन्त्रक)।
॥ २५ ॥
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः॥
अर्थ : वेद्य (जानने योग्य), वैद्य (भव-रोग के चिकित्सक), सदायोगी (नित्य योगयुक्त), वीरहा (दुष्ट असुरों के संहारक), माधव (विद्यापति), मधु (मधुर स्वरूप), अतीन्द्रिय (इन्द्रियों से परे), महामाय (माया के स्वामी), महोत्साह (सृष्टि रचना में उत्साही) और महाबल (अपार शक्तिमान)।
॥ २६ ॥
महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक्॥
अर्थ : महाबुद्धि (महान बुद्धि वाले), महावीर (अपार पराक्रमी), महाशक्ति (परम सामर्थ्यवान), महाद्युति (परम तेजस्वी), अनिर्देश्यवपु (वर्णन से परे दिव्य रूप), श्रीमान् (शोभा सम्पन्न), अमेयात्मा (अथाह स्वरूप) और महाद्रिधृक् (गोवर्धन व मन्दराचल पर्वत धारण करने वाले)।
॥ २७ ॥
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः॥
अर्थ : महेष्वास (महान धनुर्धर), महीभर्ता (पृथ्वी के पोषक), श्रीनिवास (जिनके वक्षःस्थल पर लक्ष्मी वास करती हैं), सतां गतिः (सत्पुरुषों के परम आश्रय), अनिरुद्ध (अप्रतिहत गति वाले), सुरानन्द (देवताओं को आनन्द देने वाले), गोविन्द (वेदों व वाणी द्वारा जाने जाने वाले) और गोविदां पतिः (ज्ञानियों के स्वामी)।
॥ २८ ॥
मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥
अर्थ : मरीचि (तेज स्वरूप), दमन (दुष्टों का दमन करने वाले), हंस (परमहंस रूप), सुपर्ण (सुन्दर पंखों वाले गरुड़ रूप), भुजगोत्तम (शेषनाग रूप), हिरण्यनाभ (सुवर्णमयी नाभि वाले), सुतपा (महान तपस्वी), पद्मनाभ (कमल-नाभि) और प्रजापति (प्रजा के जनक)।
॥ २९ ॥
अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा॥
अर्थ : अमृत्यु (मृत्यु से रहित), सर्वदृक् (सब देखने वाले), सिंह (नृसिंह रूप), सन्धाता (कर्मफल जोड़ने वाले), सन्धिमान् (फल भोगने वाले), स्थिर (अविचल), अज (अजन्मा), दुर्मर्षण (शत्रुओं के लिए असह्य), शास्ता (उपदेशक), विश्रुतात्मा (प्रसिद्ध स्वरूप) और सुरारिहा (देव-शत्रु असुरों के विनाशक)।
॥ ३० ॥
गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः॥
अर्थ : गुरु (सर्वविद्या गुरु), गुरुतम (सर्वश्रेष्ठ गुरु), धाम (परम आश्रय), सत्य (सत्य रूप), सत्यपराक्रम (सच्चे पराक्रम वाले), निमिष (प्रलय में नेत्र बन्द करने वाले), अनिमिष (सदा जाग्रत), स्रग्वी (वैजयन्ती माला धारी), वाचस्पति (वाणी के स्वामी) और उदारधी (उदार बुद्धि वाले)।
॥ ३१ ॥
अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥
अर्थ : अग्रणी (मोक्ष मार्ग में आगे ले जाने वाले), ग्रामणी (समस्त भूत-समूह के नायक), श्रीमान् (परम ऐश्वर्यवान), न्याय (न्याय स्वरूप), नेता (संसार चक्र के संचालक), समीरण (प्राण वायु रूप), सहस्रमूर्धा (सहस्रों मस्तक वाले), विश्वात्मा (विश्व के अन्तरात्मा), सहस्राक्ष (सहस्रों नेत्रों वाले) और सहस्रपात् (सहस्रों चरणों वाले)।
॥ ३२ ॥
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः।
अहःसंवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः॥
अर्थ : आवर्तन (संसार चक्र को घुमाने वाले), निवृत्तात्मा (विषयों से मुक्त), संवृत (माया से आच्छादित), सम्प्रमर्दन (दुष्टों का संहारक), अहःसंवर्तक (दिन-रात का चक्र चलाने वाले), वह्नि (अग्नि रूप), अनिल (वायु रूप) और धरणीधर (पृथ्वी को धारण करने वाले शेष व वराह रूप)।
॥ ३३ ॥
सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विभुः।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः॥
अर्थ : सुप्रसाद (परम कृपालु), प्रसन्नात्मा (सदा आनन्दमय), विश्वधृक् (विश्व को धारण करने वाले), विभु (सर्वव्यापी), सत्कर्ता (भक्तों का सत्कार करने वाले), सत्कृत (पूजित), साधु (सज्जन रूप), जह्नु (गंगा के जनक), नारायण (जल में शयन करने वाले) और नर (मार्गदर्शक अविनाशी आत्मा)।
॥ ३४ ॥
असंख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥
अर्थ : असंख्येय (अनन्त नाम-रूप वाले), अप्रमेयात्मा (माप से परे), विशिष्ट (सर्वोत्कृष्ट), शिष्टकृत् (शिष्ट आचरण सिखाने वाले), शुचि (परम पवित्र), सिद्धार्थ (सकल मनोरथ प्राप्त), सिद्धसङ्कल्प (सत्य सङ्कल्प वाले), सिद्धिद (सिद्धि दाता) और सिद्धिसाधन (सिद्धि के साधन स्वरूप)।
॥ ३५ ॥
वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः॥
अर्थ : वृषाही (धर्ममय दिवस), वृषभ (भक्तों पर कृपा बरसाने वाले), विष्णु (सर्वव्यापी), वृषपर्वा (धर्म रूपी सीढ़ी वाले), वृषोदर (धर्म को उदर में धारण करने वाले), वर्धन (भक्तों की वृद्धि करने वाले), वर्धमान (सदा बढ़ते रहने वाले), विविक्त (एकान्त शुद्ध) और श्रुतिसागर (वेदों के अगाध सागर)।
॥ ३६ ॥
सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः॥
अर्थ : सुभुज (सुन्दर भुजाओं वाले), दुर्धर (जिनका वेग रोकना असम्भव हो), वाग्मी (परम वक्ता), महेन्द्र (इन्द्र के भी स्वामी), वसुद (धन-ऐश्वर्य दाता), वसु (परम धन), नैकरूप (अनन्त रूपों वाले), बृहद्रूप (विराट् रूप), शिपिविष्ट (सूर्य की किरणों में वास करने वाले) और प्रकाशन (सबको प्रकाशित करने वाले)।
॥ ३७ ॥
ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥
अर्थ : ओजस्तेजोद्युतिधर (ओज, तेज और दीप्ति धारण करने वाले), प्रकाशात्मा (स्वयं प्रकाश स्वरूप), प्रतापन (संसार को तपाने वाले), ऋद्ध (परम समृद्ध), स्पष्टाक्षर (ॐकार मन्त्र स्वरूप), मन्त्र (वेदमन्त्र रूप), चन्द्रांशु (चन्द्रमा की शीतल किरणों वाले) और भास्करद्युति (सूर्य सदृश प्रकाशमान)।
॥ ३८ ॥
अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः॥
अर्थ : अमृतांशूद्भव (चन्द्रमा को उत्पन्न करने वाले), भानु (सूर्य रूप), शशबिन्दु (चन्द्रमा के सदृश पोषक), सुरेश्वर (देवों के देव), औषधं (भव-रोग की दिव्य औषधि), जगतः सेतुः (संसार पार कराने वाले सेतु) और सत्यधर्मपराक्रम (सत्य, धर्म और पराक्रम के पुंज)।
॥ ३९ ॥
भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः॥
अर्थ : भूतभव्यभवन्नाथ (तीनों कालों के स्वामी), पवन (वायु रूप), पावन (परम पवित्र करने वाले), अनल (अग्नि रूप), कामहा (कामनाओं का नाश करने वाले), कामकृत् (सत्कामनाओं को पूर्ण करने वाले), कान्त (परम सुन्दर), काम (परम पुरुषार्थ) और कामप्रद प्रभु (सबकी कामनाएं पूर्ण करने वाले)।
॥ ४० ॥
युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्॥
अर्थ : युगादिकृत् (युगों का आरम्भ करने वाले), युगावर्त (युगों का चक्र घुमाने वाले), नैकमाय (अनेक माया रूप वाले), महाशन (प्रलय में सबको ग्रास करने वाले), अदृश्य (चर्मचक्षुओं से परे), व्यक्तरूप (प्रत्यक्ष साकार रूप), सहस्रजित् (सहस्रों पर विजय पाने वाले) और अनन्तजित् (अनन्त को जीतने वाले)।
॥ ४१ ॥
इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः॥
अर्थ : इष्ट (सबके प्रिय), अविशिष्ट (सबमें सम), शिष्टेष्ट (सत्पुरुषों के परम प्रिय), शिखण्डी (मोरपंख धारी श्रीकृष्ण), नहुष (माया से मोहित करने वाले), वृष (धर्म रूप), क्रोधहा (क्रोध का नाश करने वाले), क्रोधकृत्कर्ता (दैत्यों पर क्रोध करने वाले), विश्वबाहु (सर्वत्र भुजाओं वाले) और महीधर (पृथ्वी को धारण करने वाले)।
॥ ४२ ॥
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः॥
अर्थ : अच्युत (अपने स्वरूप से कभी न डिगने वाले), प्रथित (सर्वत्र विख्यात), प्राण (जीवन शक्ति), प्राणद (प्राण दाता), वासवानुज (इन्द्र के अनुज वामन), अपांनिधि (समुद्र रूप), अधिष्ठान (सम्पूर्ण जगत के आधार), अप्रमत्त (सदा सावधान) और प्रतिष्ठित (स्वमहिमा में स्थित)।
॥ ४३ ॥
स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः॥
अर्थ : स्कन्द (अमृत रूप), स्कन्दधर (धर्म पथ पर चलाने वाले), धुर्य (सृष्टि का भार उठाने वाले), वरद (वरदान दाता), वायुवाहन (वायु को गति देने वाले), वासुदेव (सर्वत्र वास करने वाले श्रीहरि), बृहद्भानु (परम तेजस्वी सूर्य), आदिदेव (प्रथम देव) और पुरन्दर (असुरों के नगरों का ध्वंस करने वाले)।
॥ ४४ ॥
अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः॥
अर्थ : अशोक (शोक रहित), तारण (भवसागर से तारने वाले), तार (तारक मन्त्र ॐकार), शूर (परम पराक्रमी), शौरि (शूरसेन के पौत्र श्रीकृष्ण), जनेश्वर (जनता के ईश्वर), अनुकूल (भक्तों के अनुकूल), शतावर्त (सहस्रों रूपों में प्रकट), पद्मी (हाथ में कमल धारी) और पद्मनिभेक्षण (कमल सदृश सुन्दर नेत्रों वाले)।
॥ ४५ ॥
पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः॥
अर्थ : पद्मनाभ (कमल-नाभि), अरविन्दाक्ष (कमल-नयन), पद्मगर्भ (कमल के मध्य विराजित), शरीरभृत् (समस्त शरीरों का पोषण करने वाले), महर्द्धि (महान ऐश्वर्य वाले), ऋद्ध (सकल सम्पन्न), वृद्धात्मा (पुरातन आत्मा), महाक्ष (विशाल नेत्रों वाले) और गरुडध्वज (गरुड़ चिन्ह ध्वज वाले)।
॥ ४६ ॥
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः॥
अर्थ : अतुल (जिनकी कोई तुलना नहीं), शरभ (सबके नाशक), भीम (भयंकर पराक्रमी), समयज्ञ (समस्त काल व नियमों के ज्ञाता), हविर्हरि (यज्ञ की आहुति ग्रहण करने वाले), सर्वलक्षणलक्षण्य (समस्त शुभ लक्षणों से युक्त), लक्ष्मीवान् (सदा लक्ष्मीयुक्त) और समितिञ्जय (संग्राम में सदा विजयी)।
॥ ४७ ॥
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः॥
अर्थ : विक्षर (क्षय रहित), रोहित (मत्स्य रूप), मार्ग (मुक्ति का सच्चा मार्ग), हेतु (सृष्टि के परम कारण), दामोदर (जिनके उदर पर यशोदा ने दाम/रस्सी बांधी थी), सह (सबको सहन करने वाले), महीधर (पृथ्वी धर), महाभाग (परम सौभाग्यवान), वेगवान् (मन से भी तीव्र गति वाले) और अमिताशन (अनन्त ब्रह्माण्डों को आत्मसात करने वाले)।
॥ ४८ ॥
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः॥
अर्थ : उद्भव (सृष्टि के उद्गम), क्षोभण (प्रकृति में क्षोभ उत्पन्न करने वाले), देव (दिव्य क्रीड़ा करने वाले), श्रीगर्भ (सकल ऐश्वर्य को गर्भ में रखने वाले), परमेश्वर (सर्वोच्च प्रभु), करण (साधन), कारण (मूल कारण), कर्ता (सृष्टिकर्ता), विकर्ता (विविध रूपों के रचयिता), गहन (अथाह) और गुह (हृदय-गुहा में छिपे हुए)।
॥ ४९ ॥
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः॥
अर्थ : व्यवसाय (निश्चयात्मक ज्ञान), व्यवस्थान (सृष्टि की व्यवस्था करने वाले), संस्थान (अन्तिम लय स्थान), स्थानद (ध्रुव आदि को पद देने वाले), ध्रुव (अटल), परर्द्धि (सर्वोत्तम ऐश्वर्य), परमस्पष्ट (प्रत्यक्ष प्रकाशमान), तुष्ट (सदा सन्तुष्ट), पुष्ट (परम परिपूर्ण) और शुभेक्षण (जिनकी दृष्टि परम कल्याणकारी है)।
॥ ५० ॥
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः॥
अर्थ : राम (योगियों को आनन्द देने वाले श्री रघुनन्दन), विराम (विश्राम स्थल), विरज (रजोगुण रहित), मार्ग (सद्गति का मार्ग), नेय (ज्ञान द्वारा प्राप्य), नय (न्याय नीति), अनय (अशक्य), वीर (शूरवीर), शक्तिमतां श्रेष्ठ (समस्त शक्तिशालियों में श्रेष्ठ), धर्म (धर्म स्वरूप) और धर्मविदुत्तम (धर्म के परम ज्ञाता)।
॥ ५१ ॥
वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः॥
अर्थ : वैकुण्ठ (विकुण्ठा-पुत्र अथवा वैकुण्ठ धाम के स्वामी), पुरुष (अन्तर्यामी), प्राण (प्राण रूप), प्राणद (प्राण दाता), प्रणव (ॐकार), पृथु (विस्तृत रूप), हिरण्यगर्भ (ब्रह्माण्ड के जनक), शत्रुघ्न (शत्रुओं का नाश करने वाले), व्याप्त (सर्वत्र समाये हुए), वायु (पवन रूप) और अधोक्षज (इन्द्रियों के ज्ञान से परे)।
॥ ५२ ॥
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः॥
अर्थ : ऋतु (ऋतु रूप), सुदर्शन (शुभ दर्शन एवं सुदर्शन चक्रधारी), काल (समय रूप), परमेष्ठी (हृदय में स्थित), परिग्रह (सबको शरण देने वाले), उग्र (नृसिंह रूप प्रलयंकर), संवत्सर (वर्ष रूप), दक्ष (सर्वकार्य कुशल), विश्राम (शान्ति प्रदाता) और विश्वदक्षिण (समस्त कार्यों में परम समर्थ)।
॥ ५३ ॥
विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः॥
अर्थ : विस्तार (प्रपञ्च का विस्तार करने वाले), स्थावरस्थाणु (पर्वतादि में अचल), प्रमाण (स्वयंसिद्ध प्रमाण), बीजमव्यय (अविनाशी बीज), अर्थ (प्रयोजन रूप), अनर्थ (निष्काम), महाकोश (पंचकोशों के स्वामी), महाभोग (परम आनन्द) और महाधन (महान धन रूप)।
॥ ५४ ॥
अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः॥
अर्थ : अनिर्विण्ण (उदास न होने वाले), स्थविष्ठ (अति विशाल), अभू (अजन्मा), धर्मयूप (यज्ञ-खम्भ रूप धर्म), महामख (महायज्ञ रूप), नक्षत्रनेमि (ज्योतिष चक्र के केन्द्र), नक्षत्री (चन्द्रमा रूप), क्षम (सहनशील), क्षाम (प्रलय में सूक्ष्म) और समीहन (सकल चेष्टाओं के प्रेरक)।
॥ ५५ ॥
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्॥
अर्थ : यज्ञ (यज्ञ स्वरूप), इज्य (पूजनीय), महेज्य (महापूज्य), क्रतु (यज्ञ विशेष), सत्र (दीर्घ यज्ञ), सतां गतिः (सज्जनों के आश्रय), सर्वदर्शी (सबके द्रष्टा), विमुक्तात्मा (नित्य मुक्त), सर्वज्ञ (सब जानने वाले) और ज्ञानमुत्तमम् (सर्वोत्तम ज्ञान स्वरूप)।
॥ ५६ ॥
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः॥
अर्थ : सुव्रत (शुभ संकल्प वाले), सुमुख (प्रसन्न मुख), सूक्ष्म (अति सूक्ष्म), सुघोष (मेघ सदृश गम्भीर नाद वाले), सुखद (सुख दाता), सुहृत् (बिना स्वार्थ हितैषी), मनोहर (मन को हरने वाले), जितक्रोध (क्रोध को जीतने वाले), वीरबाहु (शक्तिशाली भुजाओं वाले) और विदारण (दैत्यों का विदारण करने वाले)।
॥ ५७ ॥
स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः॥
अर्थ : स्वापन (निद्रा रूप माया फैलाने वाले), स्ववश (स्वयं के वश में), व्यापी (सर्वव्यापक), नैकात्मा (अनेक रूपों वाले), नैककर्मकृत् (अनेक लीलाएं करने वाले), वत्सर (सबके निवास स्थान), वत्सल (भक्त-वत्सल), वत्सी (गौ-वत्सों के स्वामी श्रीकृष्ण), रत्नगर्भ (समुद्र रूप) और धनेश्वर (कुबेर के भी ईश्वर)।
॥ ५८ ॥
धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः॥
अर्थ : धर्मगुप् (धर्म की रक्षा करने वाले), धर्मकृत् (धर्म की स्थापना करने वाले), धर्मी (धर्म के अधिष्ठाता), सत् (प्रत्यक्ष सत्य), असत् (अप्रत्यक्ष), क्षर (विनाशी जगत), अक्षर (अविनाशी ब्रह्म), अविज्ञाता (जीवात्मा के बन्धनों से रहित), सहस्रांशु (सहस्रों किरणों वाले सूर्य), विधाता (सबके विधाता) और कृतलक्षण (वेदों के लक्षणों से युक्त)।
॥ ५९ ॥
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः॥
अर्थ : गभस्तिनेमि (किरणों के चक्रवर्ती), सत्त्वस्थ (सत्त्वगुण में स्थित), सिंह (नृसिंह रूप), भूतमहेश्वर (समस्त प्राणियों के महान ईश्वर), आदिदेव (प्रथम देव), महादेव (महान देव), देवेश (देवताओं के प्रभु) और देवभृद्गुरु (देवताओं के पोषक व गुरु)।
॥ ६० ॥
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः॥
अर्थ : उत्तर (संसार से तारने वाले), गोपति (वाणी व गौओं के स्वामी), गोप्ता (सबके रक्षक), ज्ञानगम्य (ज्ञान द्वारा प्राप्य), पुरातन (सनातन), शरीरभूतभृत् (शरीरों का भरण करने वाले), भोक्ता (यज्ञभोक्ता), कपीन्द्र (सुग्रीव/हनुमान के स्वामी श्रीराम अथवा वराह रूप) और भूरिदक्षिण (यज्ञों में प्रचुर दक्षिणा देने वाले)।
॥ ६१ ॥
सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्त्वतां पतिः॥
अर्थ : सोमप (यज्ञ में सोमरस पीने वाले), अमृतप (अमृत का पान करने वाले), सोम (चन्द्रमा रूप), पुरुजित् (अनेकों को जीतने वाले), पुरुसत्तम (सर्वश्रेष्ठ), विनय (दुष्टों को दण्ड देने वाले), जय (विजय स्वरूप), सत्यसन्ध (सत्य प्रतिज्ञ), दाशार्ह (यदुवंशी) और सात्त्वतां पतिः (यादवों व भक्तों के स्वामी)।
॥ ६२ ॥
जीवो विनयितासाक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः॥
अर्थ : जीव (प्राण धारण कराने वाले), विनयितासाक्षी (सबके आचरण के साक्षी), मुकुन्द (मोक्ष दाता), अमितविक्रम (अपार पराक्रमी), अम्भोनिधि (क्षीरसागर रूप), अनन्तात्मा (अनन्त स्वरूप), महोदधिशय (समुद्र में शयन करने वाले) और अन्तक (प्रलय में संहारक)।
॥ ६३ ॥
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः॥
अर्थ : अज (अजन्मा), महार्ह (महापूजा के योग्य), स्वाभाव्य (स्वाभाविक रूप से स्थित), जितामित्र (शत्रुओं को जीतने वाले), प्रमोदन (भक्तों को हर्षित करने वाले), आनन्द (आनन्द स्वरूप), नन्दन (सबको प्रसन्न करने वाले), नन्द (समस्त ऐश्वर्य सम्पन्न), सत्यधर्मा (सत्य धर्म वाले) और त्रिविक्रम (तीन पगों में तीनों लोक नापने वाले)।
॥ ६४ ॥
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्॥
अर्थ : महर्षि कपिलाचार्य (सांख्य शास्त्र के प्रणेता कपिल मुनि), कृतज्ञ (भक्ति का सम्मान करने वाले), मेदिनीपति (पृथ्वी के स्वामी), त्रिपद (तीन पदों वाले), त्रिदशाध्यक्ष (देवताओं के स्वामी), महाशृङ्ग (मत्स्य रूप में विशाल सींग वाले) और कृतान्तकृत् (यमराज का भी अन्त करने वाले)।
॥ ६५ ॥
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः॥
अर्थ : महावराह (वराह अवतार), गोविन्द (गोपाल श्रीकृष्ण), सुषेण (दिव्य सेना वाले), कनकाङ्गदी (स्वर्ण बाजूबन्द धारी), गुह्य (रहस्यमय), गभीर (गम्भीर), गहन (अगम्य), गुप्त (छिपे हुए) और चक्रगदाधर (शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी)।
॥ ६६ ॥
वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः॥
अर्थ : वेधा (विधाता), स्वाङ्ग (स्वयं साधन रूप), अजित (अजेय), कृष्ण (नीलमेघ श्याम), दृढ (स्थिर), सङ्कर्षण (प्रलय में खींचने वाले), अच्युत (अविनाशी), वरुण (संध्या समय के सूर्य), वारुण (वरुण के पुत्र), वृक्ष (अश्वत्थ वृक्ष रूप), पुष्कराक्ष (कमलनयन) और महामना (उदार मन वाले)।
॥ ६७ ॥
भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः॥
अर्थ : भगवान् (षडैश्वर्य सम्पन्न), भगहा (प्रलय में ऐश्वर्य समेटने वाले), आनन्दी (परमानन्दमय), वनमाली (वैजयन्ती वनमाला धारी), हलायुध (बलराम रूप हलधर), आदित्य (अदिति-पुत्र), ज्योतिरादित्य (सूर्य में प्रकाश रूप), सहिष्णु (सहनशील) और गतिसत्तम (सर्वोत्तम गति रूप)।
॥ ६८ ॥
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः।
दिवःस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः॥
अर्थ : सुधन्वा (शारंग धनुष धारी), खण्डपरशु (परशुराम रूप), दारुण (दुष्टों के लिए भयानक), द्रविणप्रद (धन दाता), दिवःस्पृक् (आकाश को छूने वाले विराट रूप), सर्वदृग्व्यास (वेदव्यास रूप), वाचस्पति (वाणी के पति) और अयोनिज (गर्भ से न जन्मे स्वयम्भू)।
॥ ६९ ॥
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्॥
अर्थ : त्रिसामा (तीन साम मन्त्रों से स्तुत्य), सामग (सामगान करने वाले), साम (सामवेद रूप), निर्वाण (मोक्ष स्वरूप), भेषजं (भव-रोग की औषधि), भिषक् (दिव्य वैद्य), संन्यासकृत् (संन्यास धर्म के प्रवर्तक), शम (मन का निग्रह), शान्त (परम शान्त), निष्ठा (अन्तिम स्थिति), शान्ति (परम शान्ति) और परायणम् (सर्वोच्च आश्रय)।
॥ ७० ॥
शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः॥
अर्थ : शुभाङ्ग (सुन्दर अंगों वाले), शान्तिद (शान्ति प्रदाता), स्रष्टा (सृष्टिकर्ता), कुमुद (पृथ्वी को आनन्द देने वाले), कुवलेशय (जल में शयन करने वाले), गोहित (गौओं व पृथ्वी का हित करने वाले), गोपति (गोपाल), गोप्ता (रक्षक), वृषभाक्ष (धर्ममय दृष्टि वाले) और वृषप्रिय (धर्म-प्रेमी)।
॥ ७१ ॥
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः॥
अर्थ : अनिवर्ती (युद्ध से न हटने वाले), निवृत्तात्मा (विषयों से विरक्त), संक्षेप्ता (प्रलय में समेटने वाले), क्षेमकृत् (कल्याण करने वाले), शिव (मङ्गलमय), श्रीवत्सवक्षा (वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह धारी), श्रीवास (लक्ष्मी के निवास), श्रीपति (लक्ष्मीपति) और श्रीमतां वरः (सकल श्रीमानों में श्रेष्ठ)।
॥ ७२ ॥
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः॥
अर्थ : श्रीद (भक्तों को लक्ष्मी देने वाले), श्रीश (लक्ष्मी के स्वामी), श्रीनिवास (लक्ष्मी के गृह), श्रीनिधि (सकल ऐश्वर्य के भण्डार), श्रीविभावन (ऐश्वर्य का विस्तार करने वाले), श्रीधर (लक्ष्मी को धारण करने वाले), श्रीकर (कल्याण करने वाले), श्रेय (परम श्रेयस रूप), श्रीमान् (ऐश्वर्यवान) और लोकत्रयाश्रय (तीनों लोकों के आश्रयदाता)।
॥ ७३ ॥
स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥
अर्थ : स्वक्ष (सुन्दर नेत्रों वाले), स्वङ्ग (सुन्दर अंगों वाले), शतानन्द (अनन्त आनन्द रूप), नन्दि (परम आनन्दित), ज्योतिर्गणेश्वर (समस्त नक्षत्र-तारामण्डलों के स्वामी), विजितात्मा (मन को वश में रखने वाले), अविधेयात्मा (किसी के अधीन न रहने वाले), सत्कीर्ति (सत्य कीर्ति वाले) और छिन्नसंशय (समस्त संशयों का छेदन करने वाले)।
॥ ७४ ॥
उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः॥
अर्थ : उदीर्ण (सर्वोत्कृष्ट), सर्वतश्चक्षु (सर्वत्र नेत्रों वाले), अनीश (जिनके ऊपर कोई दूसरा शासक नहीं), शाश्वतस्थिर (सदा अचल), भूशय (समुद्र तट पर शयन करने वाले श्रीराम), भूषण (संसार के आभूषण), भूति (परम ऐश्वर्य), विशोक (शोक रहित) और शोकनाशन (भक्तों का शोक हरने वाले)।
॥ ७५ ॥
अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः॥
अर्थ : अर्चिष्मान् (परम ज्योतिर्मय), अर्चित (सबके द्वारा पूजित), कुम्भ (सबको समेटने वाले), विशुद्धात्मा (परम निर्मल), विशोधन (सबको पावन करने वाले), अनिरुद्ध (अप्रतिरोध्य), अप्रतिरथ (जिनका कोई प्रतिस्पर्धी रथ न हो), प्रद्युम्न (परम धनवान) और अमितविक्रम (अनन्त पराक्रमी)।
॥ ७६ ॥
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः॥
अर्थ : कालनेमिनिहा (कालनेमि दैत्य का वध करने वाले), वीर (शूरवीर), शौरि (शूरसेन के वंशज), शूरजनेश्वर (शूरवीरों के स्वामी), त्रिलोकात्मा (तीनों लोकों के अन्तरात्मा), त्रिलोकेश (तीनों लोकों के स्वामी), केशव (किरणों व ब्रह्मा-शिव के अधिपति), केशिहा (केशी दैत्य का संहार करने वाले) और हरि (भक्तों के पाप व ताप हरने वाले)।
॥ ७७ ॥
कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः॥
अर्थ : कामदेव (पुरुषार्थ रूप), कामपाल (भक्तों की कामनाओं का पालन करने वाले), कामी (पूर्णकाम), कान्त (अतिशय सुन्दर), कृतागम (वेदों-शास्त्रों के रचयिता), अनिर्देश्यवपु (अवर्णनीय रूप), विष्णु (सर्वव्यापक), वीर (महापराक्रमी), अनन्त (असीम) और धनञ्जय (अर्जुन रूप धनञ्जय)।
॥ ७८ ॥
ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः।
ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः॥
अर्थ : ब्रह्मण्य (तपस्वियों व वेदों के हितैषी), ब्रह्मकृत् (तप-सृष्टि के कर्ता), ब्रह्मा (स्रष्टा रूप), ब्रह्म (सच्चिदानन्द परब्रह्म), ब्रह्मविवर्धन (तप व ज्ञान को बढ़ाने वाले), ब्रह्मविद् (ब्रह्म के ज्ञाता), ब्राह्मण (ब्राह्मण रूप), ब्रह्मी (ब्रह्मनिष्ठ), ब्रह्मज्ञ (ब्रह्म के रहस्य को जानने वाले) और ब्राह्मणप्रिय (ब्राह्मणों एवं सन्तों के परम प्रिय)।
॥ ७९ ॥
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः॥
अर्थ : महाक्रम (विशाल डग भरने वाले त्रिविक्रम), महाकर्मा (संसार रचना का महान कार्य करने वाले), महातेजा (महान तेजस्वी), महोरग (शेषनाग रूप विशाल सर्प), महाक्रतु (महायज्ञ रूप), महायज्वा (महायज्ञ करने वाले), महायज्ञ (जपयज्ञ आदि महायज्ञ) और महाहवि (परम आहुति रूप)।
॥ ८० ॥
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः॥
अर्थ : स्तव्य (स्तुति करने योग्य), स्तवप्रिय (भक्तिपूर्ण स्तुतियों से प्रसन्न होने वाले), स्तोत्र (स्तोत्र स्वरूप), स्तुति (प्रशंसा रूप), स्तोता (स्तुति करने वाले रूप), रणप्रिय (धर्मयुद्ध के प्रेमी), पूर्ण (सदा परिपूर्ण), पूरयिता (सबको पूर्ण करने वाले), पुण्य (पवित्र), पुण्यकीर्ति (जिनकी कीर्ति पुण्यदायिनी है) और अनामय (समस्त रोगों व कष्टों से रहित)।
॥ ८१ ॥
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः॥
अर्थ : मनोजव (मन के समान वेग वाले), तीर्थकर (तीर्थों के रचयिता व विद्या प्रवर्तक), वसुरेता (स्वर्णमय तेज वाले), वसुप्रद (मोक्ष व धन दाता), वासुदेव (सर्वत्र वास करने वाले श्रीहरि), वसु (निवास स्थान), वसुमना (विशुद्ध मन वाले) और हवि (यज्ञ की आहुति रूप)।
॥ ८२ ॥
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः॥
अर्थ : सद्गति (सत्पुरुषों की उत्तम गति), सत्कृति (सृष्टि की शुभ रचना), सत्ता (परम अस्तित्व), सद्भूति (उत्कृष्ट ऐश्वर्य), सत्परायण (सत्य परायण), शूरसेन (शूरसेन सेनापति रूप), यदुश्रेष्ठ (यादवों में शिरोमणि श्रीकृष्ण), सन्निवास (सज्जनों के निवास) और सुयामुन (यमुना तट पर रास रचाने वाले)।
॥ ८३ ॥
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः॥
अर्थ : भूतावास (समस्त प्राणियों के निवास), वासुदेव (सर्वव्यापी प्रभु), सर्वासुनिलय (समस्त प्राणों के आधार), अनल (अग्नि रूप), दर्पहा (दुष्टों का घमण्ड तोड़ने वाले), दर्पद (धर्मियों को मान देने वाले), दृप्त (परमानन्द मग्न), दुर्धर (अजेय वेग वाले) और अपराजित (कदापि पराजित न होने वाले)।
॥ ८४ ॥
विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः॥
अर्थ : विश्वमूर्ति (सम्पूर्ण विश्व रूप), महामूर्ति (विशाल रूप), दीप्तमूर्ति (प्रकाशमय रूप), अमूर्तिमान् (निराकार), अनेकमूर्ति (असंख्य रूपों वाले), अव्यक्त (अप्रकट), शतमूर्ति (सैकड़ों रूपों वाले) और शतानन (सैकड़ों मुखों वाले)।
॥ ८५ ॥
एको नैकः सवः कः किं यत्तत्पदमनुत्तमम्।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः॥
अर्थ : एक (अद्वितीय), नैक (अनेकरूप), सव (यज्ञ रूप), क (सुख स्वरूप), किम् (विचारणीय परमतत्व), यत्-तत् (जो और वह सब कुछ), पदमनुत्तमम् (सर्वश्रेष्ठ परम पद), लोकबन्धु (सम्पूर्ण संसार के बन्धु), लोकनाथ (संसार के स्वामी), माधव (लक्ष्मीपति) और भक्तवत्सल (भक्तों पर वात्सल्य बरसाने वाले)।
॥ ८६ ॥
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः॥
अर्थ : सुवर्णवर्ण (सोने के समान कान्ति वाले), हेमाङ्ग (स्वर्णमय अंगों वाले), वराङ्ग (सुन्दर अंगों वाले), चन्दनाङ्गदी (चन्दन लिप्त व बाजूबन्द धारी), वीरहा (दैत्य वीरों के संहारक), विषम (अनुपम), शून्य (प्रपञ्च रहित), घृताशी (आहुति ग्रहण करने वाले), अचल (स्थिर) और चल (वायु रूप गतिशील)।
॥ ८७ ॥
अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः॥
अर्थ : अमानी (निरभिमान), मानद (दूसरों को मान देने वाले), मान्य (पूजनीय), लोकस्वामी (लोकों के स्वामी), त्रिलोकधृक् (तीनों लोकों को धारण करने वाले), सुमेधा (उत्तम बुद्धि वाले), मेधज (यज्ञ से प्रकट), धन्य (कृतार्थ), सत्यमेधा (सत्य बुद्धि वाले) और धराधर (पृथ्वी को धारण करने वाले)।
॥ ८८ ॥
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः॥
अर्थ : तेजोवृष (तेज की वर्षा करने वाले), द्युतिधर (दीप्तिमान), सर्वशस्त्रभृतां वरः (समस्त शस्त्रधारियों में सर्वश्रेष्ठ), प्रग्रह (इन्द्रियों को वश में करने वाले), निग्रह (सबका नियमन करने वाले), व्यग्र (भक्तों के कार्य में तत्पर), नैकशृङ्ग (अनेक सींगों वाले) और गदाग्रज (गद के बड़े भाई श्रीकृष्ण)।
॥ ८९ ॥
चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्॥
अर्थ : चतुर्मूर्ति (चार रूपों वाले), चतुर्बाहु (चार भुजाओं वाले), चतुर्व्यूह (चार व्यूह रूप), चतुर्गति (चारों वर्णों व आश्रमों की गति), चतुरात्मा (विशुद्ध अन्तःकरण वाले), चतुर्भाव (चारों पुरुषार्थों के दाता), चतुर्वेदविद् (चारों वेदों के ज्ञाता) और एकपात् (एक पाद से समस्त जगत को व्याप्त करने वाले)।
॥ ९० ॥
समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा॥
अर्थ : समावर्त (संसार चक्र को कुशलता से घुमाने वाले), अनिवृत्तात्मा (सर्वत्र व्याप्त), दुर्जय (जिनको जीतना असम्भव हो), दुरतिक्रम (जिनकी आज्ञा कोई न लांघ सके), दुर्लभ (भक्ति बिना अप्राप्य), दुर्गम (कठिनता से जानने योग्य), दुर्ग (अभेद दुर्ग रूप), दुरावास (कुटिल मन में न रहने वाले) और दुरारिहा (दुष्ट शत्रुओं का नाश करने वाले)।
॥ ९१ ॥
शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः॥
अर्थ : शुभाङ्ग (दिव्य सुन्दर अंगों वाले), लोकसारङ्ग (संसार के सारग्राही), सुतन्तु (सुन्दर सृष्टि रूप तन्तु वाले), तन्तुवर्धन (संसार रूपी ताने-बाने को बढ़ाने वाले), इन्द्रकर्मा (इन्द्र सदृश ऐश्वर्यशाली कर्म वाले), महाकर्मा (महान कर्मकर्ता), कृतकर्मा (सफल कार्य करने वाले) और कृतागम (वेदों के रचयिता)।
॥ ९२ ॥
उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी॥
अर्थ : उद्भव (उत्पत्ति के स्रोत), सुन्दर (परम मनोहर), सुन्द (दयार्द्र), रत्ननाभ (रत्न सदृश नाभि वाले), सुलोचन (सुन्दर नेत्रों वाले), अर्क (पूजनीय सूर्य रूप), वाजसन (अन्न दाता), शृङ्गी (मत्स्य रूप सींग वाले), जयन्त (विजयी) और सर्वविज्जयी (सर्वज्ञ व सदा विजयी)।
॥ ९३ ॥
सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः॥
अर्थ : सुवर्णबिन्दु (स्वर्ण सदृश सुन्दर अक्षरों वाले), अक्षोभ्य (सदा शान्त-अक्षुब्ध), सर्ववागीश्वरेश्वर (ब्रह्मा व सरस्वती आदि समस्त वाणीश्वरों के ईश्वर), महाह्रद (आनन्द के अगाध सरोवर), महागर्त (माया के अथाह गर्त), महाभूत (परम सत्य) और महानिधि (अक्षय भण्डार)।
॥ ९४ ॥
कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः॥
अर्थ : कुमुद (पृथ्वी को प्रसन्न करने वाले), कुन्दर (कुन्द पुष्प सदृश शुद्ध फल दाता), कुन्द (कुन्द पुष्प जैसे श्वेत-निर्मल), पर्जन्य (मेघ सदृश कृपा बरसाने वाले), पावन (पवित्रकर्ता), अनिल (वायु रूप), अमृताश (अमृत का पान करने वाले), अमृतवपु (अविनाशी दिव्य शरीर वाले), सर्वज्ञ (सब जानने वाले) और सर्वतोमुख (सर्वत्र मुख वाले)।
॥ ९५ ॥
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः।
न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः॥
अर्थ : सुलभ (अनन्य भक्ति से सरलता से मिलने वाले), सुव्रत (सत्यव्रती), सिद्ध (नित्य प्राप्त), शत्रुजित् (शत्रुओं को जीतने वाले), शत्रुतापन (शत्रुओं को सन्ताप देने वाले), न्यग्रोध (वटवृक्ष रूप), उदुम्बर (गूलर रूप), अश्वत्थ (पीपल वृक्ष रूप) और चाणूरान्ध्रनिषूदन (चाणूर मल्ल का वध करने वाले श्रीकृष्ण)।
॥ ९६ ॥
सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः॥
अर्थ : सहस्रार्चि (सहस्रों किरणों वाले सूर्य), सप्तजिह्व (अग्नि की सात जिह्वा रूप), सप्तैधा (सात समिधाओं से प्रज्वलित), सप्तवाहन (सात घोड़ों वाले सूर्य), अमूर्ति (आकार रहित), अनघ (पापरहित), अचिन्त्य (मन-बुद्धि से परे), भयकृत् (दुष्टों को भय देने वाले) और भयनाशन (भक्तों का भय हरने वाले)।
॥ ९७ ॥
अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः॥
अर्थ : अणु (अति सूक्ष्म), बृहत् (अति विशाल), कृश (सूक्ष्म), स्थूल (विराट्), गुणभृत् (सत्त्व-रज-तम का पोषण करने वाले), निर्गुण (त्रिगुणातीत), महान् (सर्वश्रेष्ठ), अधृत (किसी के द्वारा न रोके जाने वाले), स्वधृत (स्वयं पर स्थित), स्वास्य (सुन्दर मुख वाले), प्राग्वंश (सृष्टि के प्रथम वंश रूप) और वंशवर्धन (वंश की वृद्धि करने वाले)।
॥ ९८ ॥
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः॥
अर्थ : भारभृत् (पृथ्वी का भार हरने वाले), कथित (वेदों में वर्णित), योगी (समाधियुक्त), योगीश (योगियों के ईश्वर), सर्वकामद (समस्त कामनाएं पूर्ण करने वाले), आश्रम (सकल जीवों के विश्राम स्थल), श्रमण (अज्ञानियों को थकाने वाले), क्षाम (प्रलय में क्षीण), सुपर्ण (सुन्दर वेदमय पंखों वाले) और वायुवाहन (वायु को गति देने वाले)।
॥ ९९ ॥
धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ता नियमो यमः॥
अर्थ : धनुर्धर (श्रीराम रूप धनुर्धारी), धनुर्वेद (धनुर्विद्या के जनक), दण्ड (दण्ड शक्ति), दमयिता (दण्ड देने वाले यमराज आदि के नियन्ता), दम (इन्द्रिय दमन), अपराजित (सदा अजेय), सर्वसह (सब कुछ सहने वाले), नियन्ता (सबके नियामक), नियम (नियम रूप) और यम (नियन्त्रक)।
॥ १०० ॥
सत्त्ववान्सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत्प्रीतिवर्धनः॥
अर्थ : सत्त्ववान् (अनन्त सामर्थ्यशाली), सात्त्विक (सत्त्वगुण सम्पन्न), सत्य (सत्य स्वरूप), सत्यधर्मपरायण (सत्य और धर्म में तत्पर), अभिप्राय (सकल मनोरथों के लक्ष्य), प्रियार्ह (प्रेम के एकमात्र पात्र), अर्ह (परम पूज्य), प्रियकृत् (भक्तों का प्रिय करने वाले) और प्रीतिवर्धन (प्रेम को बढ़ाने वाले)।
॥ १०१ ॥
विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः॥
अर्थ : विहायसगति (आकाश में गरुड़ पर विचरण करने वाले), ज्योति (स्वयं प्रकाश), सुरुचि (सुन्दर दीप्ति वाले), हुतभुक् (यज्ञ की आहुति भोगने वाले), विभु (सर्वव्यापी), रवि (रस का हरण करने वाले), विरोचन (विशेष रूप से प्रकाशित), सूर्य (जगत को प्रेरित करने वाले), सविता (सृष्टि के उत्पादक) और रविलोचन (सूर्य रूप नेत्रों वाले)।
॥ १०२ ॥
अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः॥
अर्थ : अनन्त (असीम), हुतभुक् (हविष्य भोक्ता), भोक्ता (समस्त भोगों के स्वामी), सुखद (परम सुख दाता), नैकज (अनेक बार अवतार लेने वाले), अग्रज (सृष्टि में सबसे पहले प्रकट), अनिर्विण्ण (सदा अप्रमत्त), सदामर्षी (भक्तों के अपराध क्षमा करने वाले), लोकाधिष्ठान (सम्पूर्ण लोकों के आधार) और अद्भुत (परम आश्चर्यमय)।
॥ १०३ ॥
सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः॥
अर्थ : सनात् (पुरातन काल रूप), सनातनतम (अनादि सनातन), कपिल (कपिल मुनि रूप), कपि (सूर्य अथवा वराह रूप), अव्यय (अविनाशी), स्वस्तिद (कल्याण दाता), स्वस्तिकृत् (कल्याण करने वाले), स्वस्ति (कल्याण स्वरूप), स्वस्तिभुक् (कल्याण का उपभोग करने वाले) और स्वस्तिदक्षिण (कल्याणकारी फल देने में समर्थ)।
॥ १०४ ॥
अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः॥
अर्थ : अरौद्र (परम शान्त), कुण्डली (मकर कुण्डल धारी), चक्री (सुदर्शन चक्रधारी), विक्रमी (महापराक्रमी), ऊर्जितशासन (अमोघ आज्ञा वाले), शब्दातिग (वाणी से अतीत), शब्दसह (वेदों के शब्दों को ग्रहण करने वाले), शिशिर (चन्द्रमा सदृश शीतल) और शर्वरीकर (रात्रि को उत्पन्न करने वाले)।
॥ १०५ ॥
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः॥
अर्थ : अक्रूर (अत्यन्त कोमल स्वभाव वाले), पेशल (मनोहर-सुन्दर), दक्ष (सर्वसमर्थ), दक्षिण (उदार), क्षमिणां वरः (क्षमाशीलों में सर्वश्रेष्ठ), विद्वत्तम (सर्वज्ञानी), वीतभय (भयरहित) और पुण्यश्रवणकीर्तन (जिनके नाम का श्रवण व कीर्तन परम पुण्यदायी है)।
॥ १०६ ॥
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः॥
अर्थ : उत्तारण (भवसागर से पार लगाने वाले), दुष्कृतिहा (पापों का नाश करने वाले), पुण्य (पवित्र स्वरूप), दुःस्वप्ननाशन (बुरे स्वप्नों का निवारण करने वाले), वीरहा (दैत्य वीरों के संहारक), रक्षण (सबके रक्षक), सन्त (सत्पुरुष रूप), जीवन (समस्त जीवों के प्राण) और पर्यवस्थित (सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त)।
॥ १०७ ॥
अनेकरूपो धनदः शतानन्दो जनार्दनः।
वेदङ्गो वेदविद्विद्वानव्यङ्गः शाश्वतो ध्रुवः॥
अर्थ : अनेकरूप (अनन्त रूपों वाले), धनद (कुबेर व लक्ष्मी दाता), शतानन्द (अपार आनन्द रूप), जनार्दन (भक्तों की रक्षा करने वाले), वेदाङ्ग (वेदों के अंग), वेदविद् (वेदों के ज्ञाता), विद्वान् (सर्वज्ञ), अव्यङ्ग (दोषरहित), शाश्वत (नित्य) और ध्रुव (अटल)।
॥ १०८ ॥
सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति।
वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी।
श्रीमान्नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु॥
अर्थ : सर्वप्रहरणायुध (समस्त अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाले श्रीहरि को बारम्बार नमस्कार है)। वनमाला, कौमोदकी गदा, शार्ङ्ग धनुष, पाञ्चजन्य शंख, सुदर्शन चक्र और नन्दक खड्ग धारण करने वाले श्रीमान् नारायण, सर्वव्यापी भगवान विष्णु और वासुदेव हम सबकी सर्वदा सब ओर से रक्षा करें!
॥ अथ फलश्रुतिः ॥
॥ १०९ ॥
इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम्॥
अर्थ : इस प्रकार परम कीर्तनीय, महात्मा भगवान केशव के इन एक सहस्र दिव्य नामों का सम्पूर्ण रूप से गान किया गया।
॥ ११० ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः॥
अर्थ : जो मनुष्य इस विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र का नित्य नियमपूर्वक श्रवण करता है अथवा पाठ करता है, वह इस लोक में तथा परलोक में कभी किसी अशुभ या अमङ्गल को प्राप्त नहीं होता।
॥ १११ ॥
वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत्।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात्॥
अर्थ : इसके पाठ से ब्राह्मण वेदान्त का पारगामी पण्डित होता है, क्षत्रिय युद्ध में विजयी होता है, वैश्य धन-धान्य से समृद्ध होता है और शूद्र परम सुख को प्राप्त करता है।
॥ ११२ ॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात्।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम्॥
अर्थ : धर्म की इच्छा रखने वाला धर्म प्राप्त करता है, अर्थ की इच्छा वाला अपार धन-वैभव पाता है, कामना वाला समस्त उत्तम भोग पाता है और सन्तान की इच्छा वाला उत्तम सन्तान प्राप्त करता है।
॥ ११३ ॥
भक्तिमान्यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत्॥
अर्थ : जो मनुष्य भक्तिभाव से प्रातःकाल उठकर, पवित्र होकर, एकाग्रचित्त से भगवान वासुदेव के इस सहस्रनाम का कीर्तन करता है—
॥ ११४ ॥
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम्॥
अर्थ : वह विपुल यश, अपने कुल में प्रधानता, अविचल लक्ष्मी तथा सर्वोत्तम परम श्रेयस (कल्याण) को प्राप्त करता है।
॥ ११५ ॥
न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति।
भवत्यरोगो द्युतिमान् बलरूपगुणान्वितः॥
अर्थ : उसे कहीं भी किसी से भय नहीं होता, वह महान वीर्य और तेज को प्राप्त करता है, वह नीरोग, कान्तिमान तथा बल, रूप और दिव्य सद्गुणों से सम्पन्न हो जाता है।
॥ इति श्रीमहाभारते शतसहस्रिकायां संहितायां वैयासिक्यामनुशासनपर्वणि भीष्मयुधिष्ठिरसंवादे श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥