॥ श्रीहरिः ॥
आरती श्री विश्वकर्मा जी की

आरती श्री विश्वकर्मा जी की

सनातन परम्परा

🪔 आरती

भगवान श्री विश्वकर्मा की नित्य एवं कन्या संक्रान्ति (विश्वकर्मा जयन्ती) पर की जाने वाली पावन महाआरती। इसमें आदि स्रष्टा के दिव्य नगर-निर्माण, अमोघ अस्त्र-सृजन एवं पञ्च ऋषियों के प्राकट्य का गुणगान है।

आरती श्री विश्वकर्मा जी की

भगवान श्री विश्वकर्मा की नित्य एवं कन्या संक्रान्ति (विश्वकर्मा जयन्ती) पर की जाने वाली पावन महाआरती। इसमें आदि स्रष्टा के दिव्य नगर-निर्माण, अमोघ अस्त्र-सृजन एवं पञ्च ऋषियों के प्राकट्य का गुणगान है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ आरती भगवान श्री विश्वकर्मा जी की ॥
॥ १ ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
सकल सृष्टि के कर्ता, रक्षक श्रुति धर्मा॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
अर्थ : हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के आदि शिल्पकार, परम कृपालु भगवान श्री विश्वकर्मा! आपकी जय हो, जय हो! आप सकल चराचर सृष्टि के रचयिता, स्थापति तथा वेदों और धर्म के परम संरक्षक हैं। हम अनन्य भाव से आपकी मंगल आरती करते हैं।
॥ २ ॥
आदि सृष्टि के आदि विधाता, शिल्पी तुम अनुपम।
त्रिभुवन के तुम निर्माता, पावन रूप परम॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
अर्थ : सृष्टि के आरम्भ में आपने ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रूप-विधान की रचना की। आप तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्त्य एवं पाताल) के अनुपम स्थापति हैं। आपका दिव्य स्वरूप सर्वत्र शिल्प, रचना और चेतना के रूप में प्रकाशमान है।
॥ ३ ॥
अमरावती स्वर्गपुरी रची, लंका कनक सुहाई।
द्वारिका नगरी अति प्यारी, सिन्धु तीर बसाई॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
अर्थ : देवराज इन्द्र की शोभायमान अमरावती पुरी, रावण की स्वर्णमयी त्रिकूट लंका, और भगवान श्रीकृष्ण की सिन्धु-तटवर्ती अति रमणीय द्वारिकापुरी की विस्मयकारी रचना आपके ही दिव्य कौशल से सम्पन्न हुई।
॥ ४ ॥
सुदर्शन चक्र विष्णु कर साजा, शिव को दिया त्रिशूल।
पुष्पक विमान यम-दण्ड गढ़े, हर लिए सुरों के शूल॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
अर्थ : पुत्री संज्ञा के पति भगवान सूर्य के असह्य तेज को तराश कर आपने भगवान श्रीहरि विष्णु के लिए अमोघ सुदर्शन चक्र, देवाधिदेव महादेव शिव के लिए पिनाक व त्रिशूल, कुबेर के लिए पुष्पक विमान और धर्मराज यम के लिए कालदण्ड का निर्माण किया तथा देवताओं के समस्त संकट हर लिए।
॥ ५ ॥
सत्ययुग त्रेता द्वापर कलियुग, चारों जुग यश गावे।
मनु मय त्वष्टा शिल्पी दैवज्ञ, ध्यान चरण चित लावे॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
अर्थ : सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि — चारों युगों में आपका पावन यश गूंजता है। आपके पाँचों मुखों से प्रकट हुए पंच ब्रह्म ऋषि — मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ — नित्य आपके श्रीचरणों का ध्यान करते हैं और संसार को विभिन्न शिल्पों का ज्ञान प्रदान करते हैं।
॥ ६ ॥
दारु-ब्रह्म जगन्नाथ प्रभू की, मूरत दिव्य बनाई।
पुरी धाम में पावन महिमा, भुवन-विदित ठहराई॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
अर्थ : श्री पुरुषोत्तम क्षेत्र (जगन्नाथ पुरी) में राजा इन्द्रद्युम्न की भक्ति से प्रसन्न होकर आपने वृद्ध शिल्पी का रूप धारण कर दारु-ब्रह्म से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा की अलौकिक मूर्तियों को गढ़ा, जिनकी कीर्ति सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अमर है।
॥ ७ ॥
छेनी हथौड़ी रन्दा आरी, यन्त्र-कलह सब पूजें।
कन्या संक्रान्ति पावन दिन, मंगल जय-ध्वनि गूंजें॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
अर्थ : संसार के समस्त शिल्पकार, श्रमिक, यन्त्र-निर्माता और शिल्पी अपने औजारों, मशीनों और कल-कारखानों की आपके स्वरूप के रूप में पूजा करते हैं। भाद्रपद की कन्या संक्रान्ति के पावन पर्व पर सम्पूर्ण राष्ट्र में आपकी जय-ध्वनि गूंजती है।
॥ ८ ॥
जो जन आरती प्रेम से गावे, विश्वकर्मा सुखकारी।
ज्ञान बुद्धि कौशल धन पावे, कटे सकल भव भारी॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
अर्थ : जो भी भक्त अथवा साधक इस परम कल्याणकारी आरती का नित्य या पर्व-दिनों में श्रद्धापूर्वक गान करता है, भगवान विश्वकर्मा उसे बुद्धि, तकनीकी कौशल, व्यापार में सिद्धि, धन-धान्य तथा संसार के सभी क्लेशों से मुक्ति प्रदान करते हैं।
॥ ९ ॥
कर जोड़ि सब सुर नर मुनि, शीश नवाय बारंबार।
विश्वकर्मा प्रभु राखियो, निज दासन का भार॥
ॐ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥